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________________ द्वाविंशतितम पर्व ४६५ पश्य श्रेणिक संसारे संमोहस्य विचेष्टितम् । यत्राभीष्टस्य पुत्रस्य माता गात्राणि खादति ॥१३॥ किमतोऽन्यत्परं कष्टं यजन्मान्तरमोहिताः । बान्धवा एव गच्छन्ति वैरितां पापकारिणः ॥१४॥ ततो मेरुस्थिरस्यास्य शुक्लध्यानावगाहिनः। उत्पन्नं केवलज्ञानं देहमुक्तेरनन्तरम् ॥१५॥ आगत्य'च सहेन्द्रेण प्रमोदेन सुरासुराः । चक्रुर्देहार्चनं तस्य दिव्यपुष्पादिसंपदा ॥१६॥ व्याघ्री कीर्तिधरेणापि सुवाक्यैर्बोधिता सती । संन्यासेन शुभ कालं कृत्वा स्वर्गमुपागता ॥९७॥ ततः कीर्तिधरस्यापि केवलज्ञानमुद्गतम् । यात्रा सैकैव देवानां जाता महिमकारिणाम् ॥९८॥ महिमानं परं कृत्वा केवलस्य सुरासुराः। पादौ केवलिनोर्नस्वा ययुः स्थानं यथायथम् ॥१९॥ सुकोशलस्य माहात्म्यमधीते यः पुमानिति । उपसर्गविनिर्मक्तः सखं जीवत्यसौ चिरम् ॥१०॥ देवी विचित्रमालाथ संपूर्णे समये सुखम् । प्रसूता तनयं चारुलक्षणाङ्कितविग्रहम् ॥१०१॥ हिरण्यरुचिरा माता तस्मिन् गर्भस्थितेऽभवत् । यतो हिरण्यगर्भाख्यामतोऽसौ सुन्दरोऽगमत् ॥१०२॥ नाभेयसमयस्तेन गुणः पुनरिवाहृतः । हरेः स तनयां लेभे नाम्नामृतवतीं शुमाम् ॥१०३॥ सुहृद्बान्धवसंपन्नः सर्वशास्त्रार्थपारगः । अक्षीणद्रविणः श्रीमान् हेमपर्वतसंनिमः ॥१०॥ पराननुभवन् मोगानन्यदासौ महामनाः । मध्ये भृङ्गाभकेशानां पलिताङ्करमैक्षत ॥१०५॥ दर्पणस्य स्थितं मध्ये दृष्ट्वा तं पलिताङ्कुरम् । मृत्योर्दूतसमाहूतमात्मानं शोकमाप्तवान् ॥१०६॥ गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! मोहकी चेष्टा तो देखो जहां माता ही प्रिय पुत्रके शरीरको खाती है ॥९३।। इससे बढ़कर और क्या कष्टकी बात होगी कि दूसरे जन्मसे मोहित हो बान्धवजन ही अनर्थकारी शत्रुताको प्राप्त हो जाते हैं ॥१४॥ तदनन्तर मेरुके समान स्थिर और शुक्ल ध्यानको धारण करनेवाले सुकोशल मुनिको शरीर छूटनेके पहले ही केवलज्ञान उत्पन्न हो गया ॥९५॥ सुर और असुरोंने इन्द्रके साथ आकर बड़े हर्षसे दिव्य पुष्पादि सम्पदाके द्वारा उनके शरीरको पूजा की ॥९६॥ सुकोशलके पिता कीर्तिधर मुनिराजने भी उस व्याघ्रीको मधुर शब्दोंसे सम्बोधा जिससे संन्यास ग्रहण कर वह स्वर्ग गयी ॥९७॥ तदनन्तर उसी समय कीर्तिधर मुनिराजको भी केवलज्ञान उत्पन्न हुआ सो महिमा को करनेवाले देवोंकी वही एक यात्रा पिता और पुत्र दोनोंका केवलज्ञान महोत्सव करनेवाली हई॥९८॥ सर और असर केवलज्ञानको परम महिमा फैलाकर तथा दोनों केवलियोंके चरणोंको नमस्कार कर यथायोग्य अपने-अपने स्थानपर गये ॥९९॥ गौतमस्वामी कहते हैं कि जो पुरुष सुकोशलस्वामीके माहात्म्यको पढ़ता है वह उपसर्गसे रहित हो चिरकाल तक सुखसे जीवित रहता है ॥१०॥ अथानन्तर सुकोशलकी स्त्री विचित्रमालाने गर्भका समय पूर्ण होनेपर सुन्दर लक्षणोंसे चिह्नित शरीरको धारण करनेवाला पुत्र उत्पन्न किया ॥१०१॥ चूंकि उस बालकके गर्भमें स्थित रहनेपर माता सुवर्णके समान सुन्दर हो गयी थी इसलिए वह बालक हिरण्यगर्भ नामको प्राप्त हुआ ॥१०२॥ आगे चलकर हिरण्यगर्भ ऐसा राजा हुआ कि उसने अपने गुणोंके द्वारा भगवान् ऋषभदेवका समय ही मानो पुनः वापस लाया था। उसने राजा हरिकी अमृतवती नामकी शुभ पुत्रीके साथ विवाह किया ॥१०३।। राजा हिरण्यगर्भ समस्त मित्र तथा बान्धवजनोंसे सहित था, सर्व शास्त्रोंका पारगामी था, अखण्ड धनका स्वामी था, श्रीमान् था, सुमेरु पर्वतके समान सुन्दर था, और उदार हृदय था। वह उत्कृष्ट भोगोंको भोगता हुआ समय बिताता था कि एक दिन उसने अपने भ्रमरके समान काले केशोंके बीच एक सफ़ेद बाल देखा ।।१०४-१०५|| दर्पणके मध्यमें स्थित उस सफेद बालको देखकर वह ऐसा शोकको प्राप्त हुआ मानो अपने आपको बुलानेके १. चमरेन्द्रेण ख., च महेन्द्रेण ज.। २. भवेत् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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