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________________ ४५२ पद्मपुराणे अन्तर्विरक्तमज्ञात्वा तमाहोदयसुन्दरः । परिहासानुरागेण दन्तांशुच्छुरिताधरः ॥१०॥ दीक्षामिमां वृणीषे चेत्ततोऽहमपि ते सखा । अहो विराजसेऽत्यर्थ कुमार श्रमणश्रिया ॥१०८॥ अस्त्वेवमिति भाषित्वा युक्तो वीवाहभूषणैः । अवारोहदसौ नागादारोहद्धरणीधरम् ॥१०९॥ ततो वराङ्गनास्तारं रुरुदुरुरुलोचनाः । छिन्नमुक्तकलापाभस्थूलनेत्रास्त्रविन्दवः ॥११०॥ व्यज्ञापयत् सवाष्पाक्षस्तमथोदयसुन्दरः । प्रसीद देव नर्मेदं कृतं किमनुतिष्ठसि ॥१११॥ उवाच वज्रबाहुस्तं मधुरं परिसान्त्वयन् । कल्याणाशयकूपेऽहं पतन्नुत्तारितस्त्वया ॥११२॥ भवता सदृशं मित्रं नास्ति मे भुवनत्रये । जातस्य सुन्दरावश्यं मृत्युः प्रेतस्य संभवः ॥११३॥ मृत्युजन्मघटीयन्त्रमेतदुभ्राम्यत्यनारतम् । विद्युत्तरङ्ग दुष्टाहिरसनेभ्योऽपिचञ्चलम् ॥११४॥ जगतो दःखमग्नस्य किं न पश्यसि जीवितम् । स्वप्नभोगोपमा मोगा जीवितं बुदबुदोपमम् ॥११५॥ सन्ध्यारागोपमः स्नेहस्तारुण्यं कुसुमोपमम् । परिहासोऽपि ते भद्र मम जातोऽमृतोपमः ।।११६॥ परिहासेन किं पीतं नौषधं हरते रुजम् । स त्वमेकोऽद्य मे बन्धुर्यः सुश्रेयःप्रवृत्तये ॥११॥ संसाराचारसक्तस्य प्रतिपन्नोऽसि हेतुताम् । एषोऽहं प्रव्रजाम्यद्य कुरु त्वं स्वमनीषितम् ॥११८॥ गुणसागरनामानं तमुपेत्य तपोधनम् । प्रणम्य चरणावूचे विनीतो रचिताञ्जलिः ॥५१९।। स्वामिन् भवत्प्रसादेन पवित्रीकृतमानसः। अद्य निष्क्रमितं भीमादिच्छामि भवचारकात् ।।१२०॥ भाव है सो तो कहो ॥१०६।। उसे अन्तरसे विरक्त न जानकर उदयसुन्दरने परिहासके अनुरागवश दाँतोंकी किरणोंसे ओठोंको व्याप्त करते हुए कहा कि ॥१०७|| यदि आप इस दीक्षाको स्वीकृत करते हैं तो मैं भी आपका सखा अर्थात् साथी होऊँगा। अहो कुमार! आप इस मुनि द दीक्षासे अत्यधिक सुशोभित होओगे ॥१०८।। 'ऐसा हो' इस प्रकार कहकर विवाहक आभूषणोंसे युक्त वज्रबाहु हाथीसे उतरा और पर्वतपर चढ़ गया ॥१०९॥ तब विशाल नेत्रोंको धारण करनेवाली स्त्रियां जोर-जोरसे रोने लगीं। उनके नेत्रोंसे टूटे हुए मोतियोंके हारके समान आँसुओंकी बड़ी-बड़ी बँदें गिरने लगीं ॥११०॥ उदयसुन्दरने भी आँखोंमें आँसू भरकर कहा कि हे देव ! प्रसन्न होओ, यह क्या कर रहे हो ? मैंने तो हँसी की थी ।।१११॥ तदनन्तर मधुर शब्दोंमें सान्त्वना देते हुए वज्रबाहने उदयसुन्दरसे कहा कि हे उत्तम अभिप्रायके धारक ! मैं कुएँ में गिर रहा था सो तुमने निकाला है ॥११२।। तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान मेरा दूसरा मित्र नहीं है। हे सुन्दर ! संसारमें जो उत्पन्न होता है उसका मरण अवश्य होता है और जो मरता है उसका जन्म अवश्यंभावी है ॥११३।। यह जन्म-मरणरूपी घटीयन्त्र बिजली, लहर तथा दुष्ट सर्पकी जिह्वासे भी अधिक चंचल है तथा निरन्तर घूमता रहता है ।।११४।। दुःखमें फंसे हुए संसारके जीवनकी ओर तुम क्यों नहीं देख रहे हो? ये भोग स्वप्नोंके भोगोंके समान हैं, जीवन बुद्बुदके तुल्य है, स्नेह सन्ध्याकी लालिमाके समान है और यौवन फूलके समान है। हे भद्र ! तेरी हंसी भी मेरे लिए अमृतके समान हो गयी ॥११५-११६।। क्या हंसी में पो गयी औषधि रोगको नहीं हरती? चूंकि तुमने मेरी कल्याणकी ओर प्रवृत्ति करायी है इसलिए आज तुम्ही एक मेरे बन्धु हो॥११७।। मैं संसारके आचारमें लीन था सो आज तुम उससे विरक्तिके कारण हो गये। लो, अब मैं दीक्षा लेता हूँ। तुम अपने अभिप्रायके अनुसार कार्य करो ॥११८॥ इतना कहकर वह गुणसागर नामक मुनिराजके पास गया और उनके चरणोंमें प्रणाम कर बड़ी विनयसे हाथ जोड़ता हुआ बोला कि हे स्वामिन् ! आपके प्रसादसे मेरा मन पवित्र हो गया है सो आज मैं इस भयंकर संसाररूपी कारागृहसे निकलना चाहता हूँ ॥११९-१२०॥ १. यज्ञत्वात्तमाहो-म., ज.। -मन्यत्वात्त-ब.। २. कुमारः म.। ३. वैवाह-म.। ४. पीतमौषधं म. । ५. विषम् म, । ६. स त्वमेषोद्यमे बन्धु -म. । ७. चरणानूचे म. । ८. संसारकारागृहात् । भवतारकात् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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