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________________ एकविंशतितमं पर्व शासनाचारवृत्त्यर्थ भुक्तिश्च विभुना कृता । प्राप्तो वृषमदत्तश्च पञ्चातिशयपूजनम् ॥३९॥ अधश्चम्पकवृक्षस्य शुक्लध्यानमुपेयुषः । उत्पन्नं घातिकर्मान्ते केवलं परमेष्ठिनः ॥४०॥ ततो देवाः समागत्य सेन्द्राः स्तुस्वा प्रणम्य च । संजातगणिनस्तस्माच्छुश्रुवुर्धर्ममुत्तमम् ॥४१॥ सागारं च निरागारं बहुभेदं यथाविधि । श्रुत्वा ते विमलं धर्म नत्वा जग्मुर्यथायथम् ॥४२॥ मुनिसुव्रतनाथोऽपि धर्मतीर्थप्रवर्तनम् । कृत्वा सुरासुरैर्नम्रः स्तूयमानः प्रमोदिमिः ॥४३॥ गणनाथैर्महासत्वैर्गणपालनकारिभिः । अन्यैश्च साधुमियुक्तो विहृत्य वसुधातलम् ॥४॥ सम्मेदगिरिमूर्धानं समारुह्य चतुर्विधम् । विधूय कर्म संप्राप लोकचूडामणिस्थितम् ॥४५॥ मुनिसुव्रतमाहात्म्यमिदं येऽधीयते जनाः । शृण्वन्ति वा सुमाग्न तेषां नश्यति दुष्कृतिः ॥४६॥ भूयश्च बोधिमागत्य ततः कृत्वा सुनिर्मलम् । गच्छन्ति परमं स्थानं यतो नागमनं पुनः ॥४७॥ अथासौ सुव्रतः कृत्वा चिरं राज्यं सुनिश्चलम् । दक्षं तत्र विनिक्षिप्य प्रव्रज्यावाप निवृतिम् ॥४८॥ दक्षात् सममवत् सूनुरिलावर्द्धनसंज्ञितः । ततः श्रीवर्द्धनो जज्ञे श्रीवृक्षाख्यस्ततोऽभवत् ॥४९॥ सञ्जयन्तो बभूवास्मादुदभूत्कुणिमस्ततः । महारथः पुलोमा चेत्येवमाद्या नरेश्वराः ॥५०॥ सहस्रशः समुत्पन्ना हरीणामन्वये शुभे । संप्रापुर्निवृति केचित् केचिन्नाकनिवासिताम् ॥५१॥ एवं क्रमात् प्रयातेषु पार्थिवेषु च भूरिषु । नृपो वासवकेत्वाख्यः कुलेऽस्मिन्मैथिलो ऽभवत् ॥५२॥ वृषभदत्तने उन्हें परमान्न अर्थात् खीरसे भक्तिपूर्वक पारणा करायी ॥३८॥ जिनशासनमें आचारको वृत्ति किस तरह है यह बतलानेके लिए ही भगवान्ने आहार ग्रहण किया था। आहारदानके प्रभावसे वृषभदत्त पंचातिशयको प्राप्त हुआ ॥३९॥ तदनन्तर चम्पक वृक्षके नीचे शुक्ल-ध्यानसे विराजमान भगवान्को घातिया कोका क्षय होनेके उपरान्त केवलज्ञान उत्पन्न हआ ॥४०॥ तदनन्तर इन्द्रों सहित देवोंने आकर स्तति की. प्रणाम किया तथा उत्तम गणधरोंसे युक्त उन मुनिसुव्रतनाथ भगवानसे उत्तम धर्मका उपदेश सुना ॥४१।। भगवान्ने सागार और अनगारके भेदसे अनेक प्रकारके धर्मका निरूपण किया सो उस निर्मल धर्मको विधिपूर्वक सुनकर वे सब यथायोग्य अपने-अपने स्थानपर गये ॥४२॥ हर्षसे भरे नम्रीभूत सुरासुर जिनकी स्तुति करते थे ऐसे भगवान् मुनिसुव्रतनाथने भी धर्मतीर्थको प्रवृत्ति कर महाधैर्यके धारक तथा गणकी रक्षा करनेवाले गणधरों एवं अन्यान्य साधुओंके साथ पृथिवीतलपर विहार किया ।।४३-४४॥ तदनन्तर सम्मेदाचलके शिखरपर आरूढ़ होकर तथा चार अधातिया कर्मोंका क्षय कर वे लोकके चूड़ामणि हो गये अर्थात् सिद्धालयमें जाकर विराजमान हो गये ॥४५॥ जो मनुष्य उत्तम भावसे मुनिसुव्रत भगवान्के इस माहात्म्यको पढ़ते अथवा सुनते हैं उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ॥४६।। वे पुनः आकर रत्नत्रयको निर्मल कर उस परम स्थानको प्राप्त होते हैं जहाँसे कि फिर आना नहीं होता ॥४७॥ तदनन्तर मुनिसुव्रतनाथके पुत्र सुव्रतने भी चिरकाल तक निश्चल राज्य कर अन्तमें अपने पुत्र दक्षके लिए राज्य सौंप दिया और स्वयं दीक्षा लेकर निर्वाण प्राप्त किया ।।४८|| राजा दक्षके इलावर्धन, इलावधनके श्रीवर्धन, श्रीवर्धनके श्रीवृक्ष, श्रीवृक्षके संजयन्त, संजयन्तके कुणिम, कुणिमके महारथ और महारथके पुलोमा इत्यादि हजारों राजा हरिवंशमें उत्पन्न हुए। इनमेंसे कितने ही राजा निर्वाणको प्राप्त हुए और कितने ही स्वर्ग गये ॥४९-५१।। इस प्रकार क्रमसे अनेक राजाओंके हो चुकनेपर इसी वंशमें मिथिलाका राजा वासवकेतु हुआ ॥५२॥. २. -राध्यं म.। ३. एतन्नामानं पुत्रम । ४. प्रव्रज्य प्राप म.। ५. मिथिलाया १. असमाचार- म., ब.। अधिपो मैथिलः। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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