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________________ ४४६ पद्मपुराणे दधता परमं तेन मोगमिन्द्रेण कलितम् । अहमिन्द्रसुखं दूरमधरीकृतमूर्जितम् ॥२६॥ हाहाहूहूश्रुती तस्य तुम्बुरू नारदस्तथा । विश्वावसुश्च गायन्ति किन्नोऽप्सरसो वराः ॥२७॥ वीणावेण्वादिवायेन तस्कृतेन सुचारुणा । स्नानादिविधिमाप्नोति देवीजनितवर्तनम् ॥२८॥ स्मितलजितदम्भाप्रसादादिसुविभ्रमाः । यौवनेरमयद्रामाः सोऽभिरामो यथेप्सितम् ॥२९॥ शरदम्भोदविलयं स दृष्ट्वा प्रतिबुद्धवान् । स्तुतो लौकान्तिकैर्देवैः प्रविव्रजिषयान्वितः ॥३०॥ दत्त्वा सुव्रतसंज्ञाय राज्यं पुत्राय निस्पृहः। प्रणताशेषसामन्तमण्डलं सुखपालनम् ॥३१॥ निर्गतः सौरमव्याप्तदशदिक्चक्रवालतः । दिव्यानुलेपनोदारसुकान्तमकरन्दतः ॥३२॥ सौरमाकृष्टसंभ्रान्तभ्रमरीपृथुवृन्दतः । हरिन्मणिविमाचक्रपालाशचयसंकुलात् ॥३३॥ दन्तपङ्क्तिसितच्छायाविसजालसमाकुलात् । नानाविभूषणध्वानविहगारावपूरितात् ॥३४॥ वलीतरङ्गसंपृक्तात् स्तनचक्राह्वशोमितात् । राजहंसः सितः कीर्त्या दिव्यस्त्रीपनखण्डतः ॥३५॥ देवमानवराजोढां शिविकामपराजिताम् । आरुह्य विपुलोद्यानं ययौ चूडामणिर्नृणाम् ॥३६॥ अवतीर्य ततो राज्ञां सहस्रर्बहुभिः समम् । दधौ जैनेश्वरी दीक्षा हरिवंशविभूषणः ॥३७॥ षष्ठोपवासयुक्ताय तस्मै राजगृहे ददौ । भक्त्या वृषभदत्ताख्यः परमान्नेन पारणम् ॥३०॥ अंजनागिरिके समान श्यामवर्ण थे तथापि उन्होंने अपने तेजसे सूर्यको जीत लिया था ॥२५॥ इन्द्रके द्वारा कल्पित ( रचित ) उत्तम भोगोंको धारण करते हुए उन्होंने अहमिन्द्रका भारी सुख दूरसे ही तिरस्कृत कर दिया था ॥२६॥ हा-हा, हू-हू, तुम्बुरू, नारद और विश्वावसु आदि गन्धर्वदेव सदा उनके समीप गाते रहते थे तथा किन्नर देवियां और अनेक अप्सराएँ वीणा, बांसुरी आदि बाजोंके साथ नृत्य करती रहती थीं। अनेक देवियां उबटन आदि लगाकर उन्हें स्नान कराती थीं ॥२७-२८।। सुन्दर शरीरको धारण करनेवाले भगवान्ने यौवन अवस्थामें मन्द मुसकान, लज्जा, दम्भ, ईर्ष्या, प्रसाद आदि सुन्दर विभ्रमोंसे युक्त स्त्रियोंको इच्छानुसार रमण कराया था।॥२९॥ __अथानन्तर एक बार शरदऋतुके मेघको विलीन होता देख वे प्रतिबोधको प्राप्त हो गये जिससे दीक्षा लेनेकी इच्छा उनके मनमें जाग उठी। उसी समय लौकान्तिक देवोंने आकर उनकी स्तुति की ॥३०॥ तदनन्तर जिसमें समस्त सामन्तोंके समूह नम्रीभूत थे तथा सुखसे जिसका पालन होता था ऐसा राज्य उन्होंने अपने सुव्रत नामक पुत्रके लिए देकर सब प्रकारकी इच्छा छोड़ दी ॥३१॥ तत्पश्चात् जिसने अपनी सुगन्धिसे दशों दिशाओंको व्याप्त कर रखा था, जिसमें शरीरपर लगा हुआ दिव्य विलेपन ही सुन्दर मकरन्द था, जिसने अपनी सुगन्धिसे आतुर भ्रमरियोंके भारी समूहको अपनी ओर खींच रखा था, जो हरे मणियोंकी कान्तिरूपी पत्तोंके समूहसे व्याप्त था, जो दांतोंकी पंक्तिकी सफेद कान्तिरूपी मृणालके समूहसे युक्त था, जो नाना प्रकारके आभूषणोंकी ध्वनिरूपी पक्षियोंकी कलकूजनसे परिपूर्ण था, बलिरूपी तरंगोंसे युक्त था और जो स्तनरूपी चक्रवाक पक्षियोंसे सुशोभित था ऐसी उत्तम स्त्रियोंरूपी कमल-वनसे वे कीर्तिधवल राजहंस ( श्रेष्ठ राजा भगवान् मुनिसुव्रतनाथ) इस प्रकार बाहर निकले जिस प्रकार कि किसी कमल-वनसे राजहंस (हंस विशेष ) निकलता है ॥३२-३५॥ तदनन्तर मनुष्योंके चूड़ामणि भगवान् मुनिसुव्रतनाथ, देवों तथा राजाओंके द्वारा उठायी हुई अपराजिता नामकी पालकीमें सवार होकर विपुल नामक उद्यानमें गये ॥३६॥ तदनन्तर पालकीसे उतरकर हरिवंशके आभूषणस्वरूप भगवान् मुनिसुव्रतनाथने कई हजार राजाओंके साथ जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली ॥३७॥ भगवान्ने दीक्षा लेते समय दो दिनका उपवास किया था। उपवास समाप्त होनेपर राजगृह नगरमें १. वादेन म., ज.। २. नर्तनम् ब. ज. । तर्जनम् ख., वर्तनः म. । ३. स्वन म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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