SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 498
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ४४८ पपुराणे विपुलेति महादेवी तस्यासीत् विपुलेक्षणा । परमश्रीरपि प्राप्ता या मध्येन दरिद्रताम् ॥५३॥ तस्य जनकनामाभूत्तनयो नयकोविदः । हितं यः सततं चक्रे प्रजानां जनको यथा ॥५४॥ एवं जनकसंभतिः कथिता ते नराधिप । शृणु संप्रति यदवंशे नृपो दशरथोऽभवत् ॥५५॥ इक्ष्वाकूणां कुले रम्ये निवृते नामिजे जिने । भरते भास्करे सोमे व्यतीते वंशभूषणे ॥५६॥ संख्यातीतेन कालेन कुले तत्र नराधिपाः । अतिक्रामन्ति कुर्वन्तस्तपः परमदुश्वरम् ॥५७॥ क्रीडन्ति भोगनिर्मग्नाः शुष्यन्त्यकृतपुण्यकाः । लभन्ते कर्मणः स्वस्य विपाकमश्रधारिणः ॥५८॥ चक्रवत्परिवर्तन्ते व्यसनानि महोत्सवैः । शनैर्मायादयो दोषाः प्रयान्ति परिवर्द्धनम् ॥५९॥ क्लिश्यन्ते द्रव्यनिर्मुक्ता म्रियन्ते बालतासु च । पूर्वोपात्तायुषि क्षीणे हेतुना चोपसंहृते ॥६॥ नाना भवन्ति तिष्ठन्ति निघ्नते शोचयन्ति च । रुदन्त्यदन्ति बाधन्ते विवदन्ति पठन्ति च ॥६१॥ ध्यायन्ति यान्ति वलान्ति प्रभवन्ति वहन्ति च । गायन्त्युपासतेऽइनन्ति दरिद्रति नदन्ति च ॥१२॥ जयन्ति रान्ति मुञ्चन्ति राजन्ते विलसन्ति च । तुष्यन्ति शासति शान्ति स्पृहयन्ति हरन्ति च ॥३॥ पन्ते द्रान्ति सज्जन्ति दूयन्ते कूटयन्ति च । मार्गयन्तेऽभिधावन्ते कुहयन्ते सृजन्ति च ॥६॥ उसकी विपुला नामकी पट्टरानी थी। वह विपुला, विपुल अर्थात् दीर्घ नेत्रोंको धारण करनेवाली थी और उत्कृष्ट लक्ष्मीकी धारक होकर भी मध्यभागसे दरिद्रताको प्राप्त थी अर्थात् उसकी कमर अत्यन्त कृश थी ॥५३॥ उन दोनोंके नीतिनिपुण जनक नामका पुत्र हुआ। वह जनक, जनक अर्थात् पिताके समान ही निरन्तर प्रजाका हित करता था ॥५४|| गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! इस तरह मैंने तेरे लिए राजा जनककी उत्पत्ति कही। अब जिस वंशमें राजा दशरथ हुए उसका कथन करता हूँ सो सुन ॥५५॥ ____ अथानन्तर इक्ष्वाकुओंके रमणीय कुलमें जब भगवान् ऋषभदेव निर्वाणको प्राप्त हो गये और उनके बाद चक्रवर्ती भरत, अर्ककीर्ति तथा वंशके अलंकारभूत सोम आदि राजा व्यतीत हो चुके तब असंख्यात कालके भीतर उस वंशमें अनेक राजा हुए। उनमें कितने ही राजा अत्यन्त कठिन तपश्चरण कर निर्वाणको प्राप्त हुए, कितने ही स्वर्गमें जाकर भोगोंमें निमग्न हो क्रीड़ा करने लगे, और कितने ही पुण्यका संचय नहीं करनेसे शुष्क हो गये अर्थात् नरकादि गतियोंमें जाकर रोते हुए अपने कर्मोंका फल भोगने लगे ॥५६-५८॥ हे श्रेणिक ! इस संसारमें जो व्यसनकष्ट हैं वे चक्रकी नाईं बदलते रहते हैं अर्थात् कभी व्यसन महोत्सवरूप हो जाते हैं और कभी महोत्सव व्यसनरूप हो जाते हैं, कभी इस जीवमें धीरे-धीरे माया आदि दोष वृद्धिको प्राप्त हो जाते हैं ॥५२॥ कभी ये जीव निधन होकर क्लेश उठाते हैं और कभी पूर्वबद्ध आयुके क्षीण हो जाने अथवा किसी कारणवश कम हो जानेसे बाल्य अवस्थामें ही मर जाते हैं ॥६०॥ कभी ये जीव नाना रूपताको धारण करते हैं, कभी ज्यों-के-त्यों स्थिर रह जाते हैं, कभी एक दूसरेको मारते हैं, कभी शोक करते हैं, कभी रोते हैं, कभी खाते हैं, कभी बाधा पहुंचाते हैं, कभी विवाद करते हैं, कभी गमन करते हैं, कभी चलते हैं, कभी प्रभावशील होते हैं, अर्थात् स्वामी बनते हैं, कभी भार ढोते हैं, कभी गाते हैं, कभी उपासना करते हैं, कभी भोजन करते हैं, कभी दरिद्रताको प्राप्त करते हैं, कभी शब्द करते हैं ॥६१-६२।। कभी जीतते हैं, कभी देते हैं, कभी कुछ छोड़ते हैं, कभी विराजमान होते हैं, कभी अनेक विलास धारण करते हैं, कभी सन्तोष धारण करते हैं, कभी शासन करते हैं, कभी शान्ति अर्थात् क्षमाकी अभिलाषा करते हैं, कभी शान्तिका हरण करते हैं ॥३॥ कभी लज्जित होते हैं, कभी कुत्सित चाल चलते हैं, कभी किसीको सताते हैं, कभी सन्तप्त होते हैं, कभी कपट धारण करते हैं, कभी याचना करते हैं, कभी सम्मुख दौड़ते हैं, कभी १. पन्ति ख.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy