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________________ ४३२ पद्मपुराणे पञ्चाशच्चापहान्यातः प्रत्येकं परिकीर्तितम् । शीतलात् प्राजिनेन्द्राणां नवतिः शीतलस्य च ॥११३॥ ततो धर्मजिनात् पूर्व दशचापपरिक्षयः । प्रत्येकं धर्ममाथस्य चत्वारिंशस्सपञ्चिकाः ॥११॥ ततः पार्वजिनात् पूर्व प्रत्येकं पञ्चभिः क्षयः । नवारनिमितः पाश्वो महावीरो द्विवर्जितः ॥११५॥ पल्योपमस्य दशमो भाग आद्यस्य कीर्तितम् । मिस्या कुलकरस्यायुलोकालोकावलोकिमिः ॥११६॥ दशमो दशमो भागः पौरस्त्यस्य ततः स्मृतः । प्रमाणमायुषो राजन् शेषाणां कुलकारिणाम् ॥११७॥ चतुर्भिरधिकाशीतिः पूर्वलक्षाः प्रकीर्तिताः । प्रथमस्य जिनेन्द्र स्य द्वितीयस्य द्विसप्ततिः ॥११॥ पष्टिश्च पञ्चसु ज्ञेयः क्रमेण दशभिः क्षयः । विज्ञेये पूर्वलक्षे द्वे तथैकं परिकीर्तितम् ॥११९॥ चतुर्भिरधिकाशीतिरब्दी लक्षा द्विसप्ततिः । षष्टिस्त्रिंशद्दशैका च समा लक्षाः प्रकीर्तिताः ॥१२०॥ नवतिः पञ्चमिः सार्धमशीतिश्चतुरुत्तराः । पञ्चाशत्पञ्चभिर्युक्तास्त्रिंशदश च कीर्तितः ॥१२॥ बाद शीतलनाथके पहले-पहले तक अर्थात् पुष्पदन्त भगवान् तक प्रत्येककी पचास-पचास धनुष कम होती गयी है। शीतलनाथ भगवान्की ऊंचाई नब्बे धनुष है। उसके आगे धर्मनाथके पहले-पहले तक प्रत्येककी दश-दश धनुष कम होती गयी है। धर्मनाथकी पैंतालीस धनुष प्रमाण है। उनके आगे पाश्वनाथके पहले-पहले तक प्रत्येककी पाँच-पाँच धनुष कम होती गयी है। पाश्वं वधमान स्वामीके उनसे दो हाथ कम अर्थात् सात हाथकी ऊंचाई है। भावार्थ-१ ऋषभनाथकी ५०० धनुष, २ अजितनाथकी ४५० धनुष, ३ सम्भवनाथकी ४०० धनुष, ४ अभिनन्दननाथकी ३५० धनुष, ५ सुमतिनाथकी ३०० धनुष, ६ पद्मप्रभकी २५० धनुष, ७ सुपार्श्वनाथको २०० धनुष, ८ चन्द्रप्रभकी १५० धनुष, ९ पुष्पदन्तकी १०० धनुष, १० शीतलनाथको ९० धनुष, ११ श्रेयान्सनाथकी ८० धनुष, १२ वासुपूज्यको ७० धनुष, १३ विमलनाथको ६० धनुष, १४ अनन्तनाथको ५० धनुष, १५ धर्मनाथकी ४५ धनुष, १६ शान्तिनाथकी ४० धनुष, १७ कुन्थुनाथकी ३५ धनुष, १८ अरनाथकी ३० धनुष, १९ मल्लिनाथकी २५ धनुष, २० मुनिसुव्रतनाथको २० धनुष, २१ नमिनाथकी १५ धनुष, २२ नेमिनाथको १० धनुष, २३ पार्श्वनाथकी ९ हाथ और २४ वर्धमान स्वामीको ७ हाथको ऊँचाई है ॥११३-११५॥ अब कुलकर तथा तीर्थंकरोंकी आयुका वर्णन करता हूँ-हे राजन् ! लोक तथा अलोकके देखनेवाले सर्वज्ञदेवने प्रथम कुलकरकी आयु पल्यके दशवें भाग बतलायो है। उसके आगे प्रत्येक कुलकरकी आयु दशवें-दशवें भाग बतलायी गयी हैं अर्थात् प्रथम कुलकरकी आयुमें दशका भाग देनेपर जो लब्ध आये वह द्वितीय कुलकरको आयु है और उसमें दशका भाग देनेपर जो लब्ध आवे वह तृतीय कुलकरकी आयु है। इस तरह चौदह कुलकरोंकी आयु जानना चाहिए ॥११६-११७।। प्रथम तोथंकर श्री ऋषभदेव भगवान्की चौरासी लाख पूर्व, द्वितीय तीर्थंकर श्री अजितनाथ भगवान्की बहत्तर लाख पूर्व, तृतीय तीर्थंकर श्री सम्भवनाथकी साठ लाख पूर्व, उनके बाद पांच तीर्थंकरोंमें प्रत्येकको दश-दश लाख पूर्व, कम अर्थात् चतुर्थ अभिनन्दननाथको पचास लाख पूर्व, पंचम सुमतिनाथकी चालीस लाख पूर्व, षष्ठ पद्मप्रभकी तीस लाख पूर्व, सप्तम सुपार्श्वनाथकी बीस लाख पूर्व, अष्टम चन्द्रप्रभकी दश लाख पूर्व, नवम पुष्पदन्तकी दो लाख पूर्व, दशम शीतलनाथको एक लाख पूर्व, ग्यारहवें श्रेयान्सनाथकी चौरासी लाख वर्ष, बारहवें वासुपूज्यकी बहत्तर लाख वर्ष, तेरहवें विमलनाथकी साठ लाख वर्ष, चौदहवें अनन्तनाथकी तीस लाख वर्ष, पन्द्रहवें धर्मनाथकी दश लाख वर्ष, सोलहवें शान्तिनाथकी एक लाख वर्ष, सत्रहवें कुन्थुनाथकी पंचानबे हजार वर्ष, अठारहवें १. सपश्चिका क., ज. । २. अत्र ख. पुस्तके एवं पाठ:-चतुभिरधिकाशीतिः पूर्वलक्षाद्विसप्ततिः । षष्टिलक्षाणि पूर्वाणि पञ्चाशल्लक्षकं तथा ।।११८॥ चत्वारिंशत्तु लक्षाणि त्रिशल्लक्षाणि चैव हि । तथा विंशतिलक्षाणि दश द्वे चैकमेव हि ॥११९॥ ३. शोतिरब्दाः लक्षा म, । ४. समा लक्षाः ख.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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