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________________ विशतितमं पर्व ४३३ एकं चाब्द सहस्राणां संख्येयं परिकीर्तिताः । वर्षाणां च शतं द्वाभ्यामधिका सप्ततिस्तथा ॥१२२॥ क्रमेणेति जिनेन्द्राणामायुः श्रेणिक कीर्तितम् । शृणु संप्रति यो यत्र जातश्चक्रधरोऽन्तरे ॥१२३॥ ऋषभेण येशोवत्या जातो भरतकीर्तितः । यस्य नाम्ना गते ख्यातिमेतद्वास्यं जगत्त्रये ॥१२॥ अभूदु यः पुण्डरीकिण्या पीठः पूर्वत्र जन्मनि । सर्वार्थसिद्धिमैत्कृत्वा कुशसेनस्य शिष्यताम् ।।१२५॥ लोचानन्तरमुत्पाद्य महासंवेगयोगतः । सर्वावभासनं ज्ञानं निर्वाणं स समीयिवान् ॥१२६॥ बभूव नगरे राजा पृथिवीपुरनामनि । विजयो नाम शिष्योऽभूद यशोधरगुरोरसौ ॥१२७॥ स मृतो विजयं गत्वा भुक्त्वा मोगमनुत्तमम् । विनीतायामिह च्युत्वा विजयस्याप्य पुत्रताम् ॥१२८॥ सौमङ्गलो बभूवासी चक्री सगरसंज्ञितः । भुक्त्वा मोगं महासारं सुरपूजितशासनः ॥१२९॥ प्रबुद्धः पुत्रशोकेन प्रव्रज्य जिनशासने । उत्पाद्य केवलं नाथः सिद्धानामालयं गतः ॥३०॥ शशिभः पुण्डरीकियां शिष्योऽभूद विमले गुरौ । गत्वा ग्रेवेयकं भुक्त्वा संसारसुखमुत्तमम् ।।१३१।। च्युत्वा सुमित्रराजस्य मद्रवत्यामभूत् सुतः । श्रावस्त्यां मघवा नाम चक्रलक्ष्मीलतातरुः ॥१३२।। श्रामण्यवतमास्थाय धर्मशान्तिजिनान्तरे। समाधानानुरूपेण गतः सौधर्मवासिताम् ।।१३३॥ सनत्कुमारचक्रेशे स्तुते मगधपुंगवः । ब्रवीति केन पुण्येन जातोऽसाविति रूपवान् ।।१३४॥ अरनाथकी चौरासी हजार वर्ष, उन्नीसवें मल्लिनाथकी पचपन हजार वर्ष, बीसवें मुनिसुव्रतनाथकी तीस हजार वर्ष, इक्कीसवें नमिनाथकी दश हजार वर्ष, बाईसवें नेमिनाथकी एक हजार वर्ष, तेईसवें पाश्वनाथकी सौ वर्ष और चौबीसवें महावीरकी बहत्तर वर्षको आयु थी ॥११८-१२२।। हे श्रेणिक ! मैंने इस प्रकार क्रमसे तीर्थंकरोंकी आयुका वर्णन किया। अब जिस अन्तरालमें चक्रवर्ती हुए हैं उनका वर्णन सुन ॥१२३।। __ भगवान् ऋषभदेवकी यशस्वती रानीसे भरत नामा प्रथम चक्रवर्ती हुआ। इस चक्रवर्तीके नामसे ही यह क्षेत्र तीनों जगत्में भरत नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥१२४॥ यह भरत पूर्व जन्ममें पुण्डरीकिणी नगरीमें पीठ नामका राजकुमार था। तदनन्तर कुशसेन मुनिका शिष्य होकर सर्वार्थसिद्धि गया। वहाँसे आकर भरत चक्रवर्ती हुआ। इसके परिणाम निरन्तर वैराग्यमय रहते थे जिससे केशलोंचके अनन्तर ही लोकालोकावभासी केवलज्ञान उत्पन्न कर निर्वाण धामको प्राप्त हुआ ॥१२५-१२६॥ फिर पृथ्वीपुर नगरमें रोजा विजय था जो यशोधर गुरुका शिष्य होकर मुनि हो गया। अन्तमें सल्लेखनासे मरकर विजय नामका अनुत्तम विमानमें गया । वहाँ उत्तम भोग भोगकर अयोध्या नगरीमें राजा विजय और रानी सुमंगलाके सगर नामका द्वितीय चक्रवर्ती हुआ। वह इतना प्रभावशाली था कि देव भी उसकी आज्ञाका सम्मान करते थे। उसने उत्तमोत्तम भोग भोगकर अन्तमें पुत्रोंके शोकसे प्रवृत्ति हो जिन दीक्षा धारण कर ली और केवलज्ञान उत्पन्न कर सिद्धालय प्राप्त किया ॥१२७-१३०॥ तदनन्तर पुण्डरीकिणी नगरीमें शशिप्रभ नामका राजा था। वह विमल गुरुका शिष्य होकर ग्रेवेयक गया। वहाँ संसारका उत्तम सुख भोगकर वहाँसे च्युत हो श्रावस्ती नगरीमें राजा सुमित्र और रानी भद्रवतींके मघवा नामका तृतीय चक्रवर्ती हुआ। यह चक्रवर्तीको लक्ष्मीरूपी लताके लिपटनेके लिए मानो वृक्ष ही था। यह धर्मनाथ और शान्तिनाथ तीर्थंकरके बीचमें हुआ था तथा मुनिव्रत धारण कर समाधिके अनुरूप सौधर्म स्वर्गमें उत्पन्न हुआ था ।।१३१-१३३॥ इसके बाद गौतमस्वामी चतुर्थ चक्रवर्ती सनत्कुमारकी बहुत प्रशंसा करने लगे तब राजा श्रेणिकने पूछा कि हे भगवन् ! वह किस पुण्यके कारण इस तरह अत्यन्त रूपवान् हुआ था ।।१३४।। १. चक्रधरान्तरे म. । २. यशस्वत्यामिति भवितव्यम् । ३. कुरुसेनस्य म. । ४. लुञ्चानन्तर ज., लोचनान्तर म. । ५. गतं म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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