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________________ ४०६ पद्मपुराणे विलापमपि कुर्वाणां ताडयन्तीमुरो भृशम् । सान्त्वयन्वनितां कृच्छाबहादः साश्रुलोचनः ॥७॥ सर्वबन्धुजनाकीर्णः कृत्वा प्रहसितं पुरः । निर्यातः स्वपुरात् पुत्रमुपलब्धुं समुत्सुकः ।।७२।। सर्वे चाह्वायिता तेन खगा द्विश्रेणिवासिनः । प्रीत्या ते तु समायाताः परिवारसमन्विताः ॥७३।। रवेः पन्थानमाश्रित्य भास्वद्विविधवाहनाः । अन्वेष्यंस्ते महीं यत्नाद् गह्वरन्यस्तलोचनाः ॥७॥ प्रतिभानुरुदन्तं तं ज्ञात्वा प्रह्लाददूततः । उद्वहन्मनसा शोकमजनायै न्यवेदयत् ॥७५।। प्रथमादपि सा दुःखात्ततो दुःखेन भूयसा । अश्रुधौतमुखा चक्रे करुणं परिदेवनम् ।।७६॥ हा नाथ प्राणसर्वस्त्र मम मानसबन्धन । क्व मां त्यक्त्वा प्रयातोऽसि क्लेशसंततिभागिनीम् ॥७७॥ किं वाद्यापि न तं कोपं विमुञ्चसि पुरातनम् । अदृश्यत्वं यदेतोऽसि सर्वविद्याभृतामपि ॥७८॥ अप्यकं प्रतिवाक्यं मे नाथ यच्छामृतोपमम् । मत्वापनहितोन्मुक्ता महात्मानो भवन्ति हि ॥७९॥ इयन्तं धारिताः कालं भवद्दर्शनकाझया । प्राणा मयाधुना कार्य किमेतैः पापकर्ममिः ॥८॥ समागममवाप्स्यामि प्रियेणेति समं कृताः । कथं मनोरथा भग्ना देवेनाफलिता मम ॥८१॥ कृते मे मन्दभाग्यायाः प्रियोऽवस्थां गतो भवेत् । तामिदं हृदयं वरं यां समाशङ्कते मुहुः ॥८२॥ वसन्तमालिके पश्य किमिदं वर्तते मम । असह्यविरहाङ्गारपल्यङ्कपरिवर्तनम् ॥८३॥ वसन्तमालया चोक्ता देवि मैवममङ्गलम् । व्यरटीः सर्वथासौ ते भर्ता गोचरमेष्यति ॥४॥ है ऐसी अपनी माताको प्रत्युत्तर देकर शोकरहित कर ||७०|| इस प्रकार विलाप करती और अत्यधिक छाती कूटती हुई केतुमतीको राजा प्रह्लाद सान्त्वना दे रहे थे पर शोकके कारण उनके नेत्रोंसे भी टप-टप आंसू गिरते जाते थे ॥७१॥ तदनन्तर पुत्रको पानेके लिए उत्सुक राजा प्रह्लाद समस्त बन्धुजनोंके साथ प्रहसितको आगे कर अपने नगरसे निकले ॥७२॥ उन्होंने दोनों श्रेणियोंमें रहनेवाले समस्त विद्याधरोंको बुलवाया सो अपने-अपने परिवार सहित समस्त विद्याधर प्रेमपूर्वक आ गये ॥७३।। जिनके नाना प्रकारके वाहन आकाशमें देदीप्यमान हो रहे थे और जिनके नेत्र नीचे गुफाओंमें पड़ रहे थे ऐसे वे समस्त विद्याधर बड़े यत्नसे पृथ्वीकी खोज करने लगे ॥७४॥ इधर प्रह्लादके दूतसे राजा प्रतिसूर्यको जब यह समाचार मालूम हुआ तो हृदयसे शोक धारण करते हुए उसने यह समाचार अंजनासे कहा ॥७५।। अंजना पहलेसे ही दुःखी थी अब इस भारी दुःखसे और भी अधिक दुःखी होकर वह करुण विलाप करने लगी। विलाप करते समय उसका मुख अश्रुओंसे धुल रहा था ॥७६।। वह कहने लगी कि हाय नाथ ! आप ही तो मेरे हृदयके बन्धन थे फिर निरन्तर क्लेश भोगनेवाली अबलाको छोड़कर आप कहां चले गये ? ॥७७॥ क्या आज भी आप उस पुरातन क्रोधको नहीं छोड़ रहे हैं जिससे समस्त विद्याधरोंके लिए अदृश्य हो गये हैं ।।७८॥ हे नाथ ! मेरे लिए अमृततुल्य एक भी प्रत्युत्तर दीजिए क्योंकि महापुरुष आपत्तिमें पड़े हुए प्राणियोंका हित करना कभी नहीं छोड़ते ॥७९॥ मैंने अब तक आपके दर्शनकी आकांक्षासे ही प्राण धारण किये हैं। अब मुझे इन पापी प्राणोंसे क्या प्रयोजन है ? |८०|| मैं पतिके साथ समागमको प्राप्त होऊँगी, ऐसे जो मनोरथ मैंने किये थे वे आज दैवके द्वारा निष्फल कर दिये गये ॥८१॥ मुझ मन्दभागिनीके लिए प्रिय उस अवस्थाको प्राप्त हुए होंगे जिसकी कि यह क्रूर हृदय बार-बार आशंका करता रहा है ॥८२॥ वसन्तमाले ! देख तो यह क्या हो रहा है? मुझे असह्य विरहके अंगाररूपी शय्यापर कैसे लोटना पड़ रहा है ? ||८३।। वसन्तमालाने कहा कि हे देवि ! ऐसी अमांगलिक रट मत लगाओ। मैं निश्चित कहती हूँ कि भर्ता तुम्हारे समीप आयेगा १. मुखे म. । २. रवे म. । ३. उद्वहतं महाशोक- म.। तद्वहंतं महाशोक-क.। ४. करणं म. । ५. यदेतासि ब. । ६. मवाक्ष्यामि ( ? ) म. । ७. व्युपसर्गपूर्वकरटधातोर्लुङमध्यमपुरुषैकवचने रूपम् । व्यरंटी: म., ब. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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