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________________ अष्टावशं पर्व ४०७ एष कल्याणि ते नाथमानयाम्यचिरादिति । प्रतिसूर्यः समाश्वास्य कृच्छ्रणाञ्जनसुन्दरीम् ॥८५॥ मनोहरं सेमारुह्य खगयानं मनोजवम् । नमोमूर्धानमुस्पस्य वीक्षमाणः क्षितिं ययौ ॥८६॥ प्रतिमानुसमेतास्ते वैजयार्दा नभश्चराः । त्रैकूटाश्च प्रयत्नेन निक्षन्त महीतलम् ॥४७॥ अथ भूतरवाटव्यां देदृशुस्ते महाद्विपम् । प्रावृषेण्यघनोदारसंघाताकारधारिणम् ॥४८॥ अयं स कालमेघाख्यः पवनद्विप इत्यमी। अभ्यशासिषरेनं च पूर्वदष्टेरनेकशः ॥८९॥ अयमेष स हस्तीति जगदुश्च परस्परम् । सर्व विद्याधराः हृष्टाः समं कृतमहारवाः ॥१०॥ नीलाञ्जनगिरिच्छायः कुन्दराशिसितद्विजः । युक्तप्रमाणहस्तोऽयं हस्ती यत्रावतिष्ठते ॥९॥ पवनंजयवीरेण देशेऽत्र गतसंशयम् । मवितव्यमयं तस्य मित्रवत्पार्श्वगोचरः ॥१२॥ वदन्त इति ते याताः समीपं तस्य दन्तिनः । निरङ्कुशतया तस्य मनाग्वित्रस्तमानसाः ॥१३॥ रवेण महता तेषां चुक्षोभ स महागजः । दुर्निवारश्चलनीमसमस्ताङ्गो महाजवः ॥९४॥ मदक्लिनकपोलोऽसौ स्तब्धकर्णः सुगर्जितः । दिशं पश्यति यामेव तत्र क्षुभ्यन्ति खेचराः ॥९५॥ दृष्ट्वा जनसमूह तं स्वामिरक्षणतत्परः । पवनंजयसामीप्यं न जहाति स वारणः ॥१६॥ मण्डलेन भ्रमत्यस्य सलील भ्रमयन् करम् । दशनेनैव चण्डेन त्रासयन् सर्वखेचरान् ॥९७॥ करिणीमिरथावृत्य द्विपं यत्नेन खेचराः । वशीकृस्य तमुद्देशमवतीर्णाः समुत्सुकाः ॥९॥ ॥८४॥ 'हे कल्याणि ! मैं तेरे भर्ताकी अभी हाल ले आता हूँ' इस प्रकार अंजनाको बड़े दुःखसे आश्वासन देकर राजा प्रतिसूर्य मनके समान तीव्र वेगवाले सुन्दर विमानमें चढ़कर आकाशमें उड़ गया। वह पृथिवीको अच्छी तरह देखता हुआ जा रहा था ।।८५-८६।। इस प्रकार विजयावासी विद्याधर और त्रिकूटाचलवासी राक्षस राजा प्रतिसूर्यके साथ मिलकर बड़े प्रयत्नसे पृथिवीका अवलोकन करने लगे ॥८७|| अथानन्तर उन्होंने भूतरव नामक अटवीमें वर्षा ऋतुके मेघके समान विशाल आकारको धारण करनेवाला एक बड़ा हाथी देखा ॥४८॥ उस हाथीको उन्होंने पहले अनेक बार देखा था इसलिए 'यह पवनकुमारका कालमेघ नामक हाथी है' इस प्रकार पहचान लिया ॥८९|| 'यह वही हाथी है' इस प्रकार सब विद्याधर हर्षित हो जोरसे हल्ला करते हुए परस्पर एक दूसरेसे कहने लगे ॥९०।। जो नीलगिरि अथवा अंजनगिरिके समान सफेद है तथा जिसकी सूंड योग्य प्रमाणसे सहित है ऐसा यह हाथी जिस स्थानमें है निःसन्देह उसी स्थानमें पवनंजयको होना चाहिए यह हाथी मित्रके समान सदा उसके समीप ही रहता है ॥९१-९२।। इस प्रकार कहते हए सब विद्याधर उस हाथीके पास गये। चूंकि वह हाथी निरंकुश था इसलिए विद्याधरोंका मन कुछ. कुछ भयभीत हो रहा था ॥९३॥ उन विद्याधरोंके महाशब्दसे वह महान् हाथी सचमुच ही क्षुभित हो गया। उस समय उसका रोकना कठिन था, उसका समस्त भयंकर शरीर चंचल हो रहा था और वेग अत्यन्त तीव्र था॥९४॥ उसके दोनों कपोल मदसे भीगे हुए थे, कान खड़े थे और वह जोर-जोरसे गर्जना कर रहा था। वह जिस दिशामें देखता था उसी दिशाके विद्याधर क्षुभित हो जाते थे-भयसे भागने लगते थे ।।९५॥ उस जनसमूहको देखकर स्वामीकी रक्षा करने में तत्पर हाथी पवनंजयको समीपताको नहीं छोड़ रहा था ॥९६॥ वह लीलासहित सूंड़को घुमाता और अपने तीक्ष्ण दशनसे हो समस्त विद्याधरोंको भयभीत करता हुआ पवनंजयके चारों ओर मण्डलाकार भ्रमण कर रहा था ।।९७॥ तदनन्तर विद्याधर यत्नपूर्वक हस्तिनियोंसे उस हाथीको घेरकर तथा वशमें कर उत्सुक १. समासह्य म. । २. ददृशे म. । ३. धारिणाम् म. । ४. मेघाख्यपवन म. । ५. अभ्यशासिषु म. । ६. महारवः म.। ७. भमयत्करम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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