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________________ सप्तवशं पर्व ३८५ श्रुत्वा गवाक्षजालेन त्रियामायां तिरोहितः । द्वेषमस्यै परिप्राप्तो वैधुर्यमकरोत् पुरः ॥२०॥ युद्धाय प्रस्थितो दृष्ट्वा सोऽन्यदा चक्रवाकिकाम् । विरहाद्दीपिता रम्ये मानसे सरसि द्रुतम् ॥२०१॥ सख्येव कृपया नीतः समये तां मनोहराम् । गतश्च गर्भमादाय कतु जनकशासनम् ॥२०२॥ इत्युक्त्वा पुनरूचेऽसावञ्जनां मुनिपुङ्गवः । महाकारुण्यसंपन्नः शरन्निव गिरामृतम् ॥२०३॥ सा त्वं कर्मानुभावेन बाले दुःखमिदं श्रिता । ततो भूयोऽपि मा कार्षीरोदशं कर्म निन्दितम् ॥२०४॥ यानि यानि च सौख्यानि जायन्ते चात्र भूतले । तानि तानि हि सर्वाणि जिनभक्ते विशेषतः ॥२०५॥ भक्ता भव जिनेन्द्राणां संसारोत्तारकारिणाम् । गृहाण नियमं शक्त्यां कुरु श्रमगपूजनम् ॥२०६॥ दिष्ट्या बोधिं प्रपन्नासि तदा दत्तां तदार्यया । उदहार्षीत् करालम्बात् सा स्वां यान्तीमधोगतिम् ॥२०७॥ अयं च ते महाभाग्यः कुक्षि गर्भः समाश्रितः । पुरा निर्लोठते सम्यग्बहुकल्याणभाजनम् ॥२०८॥ परमां भूतिमेतस्मात् सुतात् प्राप्स्यसि शोभने । अखण्डनीयवीर्योऽयं गीर्वाणः सकलैरपि ॥२०९॥ अल्पैरेव च तेऽहोभिः प्रियसंगो भविष्यति । ततो भव सुखस्वान्सा प्रमादरहिता शुभे ॥२१०॥ इत्युक्ताभ्यां ततस्ताभ्यां तुष्टाभ्यां मुनिसत्तमः । प्रणतो विकसन्नेत्रराजीवाभ्यां पुनः पुनः ॥२१॥ सोऽपि दत्त्वाशिषं ताभ्यां समुत्पत्य नभस्तलम् । संयमस्योचितं देशं जगामामलमानसः ॥२१२॥ पर्यङ्कासनयोगेन यस्मात्तस्यां स सन्मुनिः । तस्थौ जगाम पर्यङ्कगुहाख्यां सा ततो भुवि ॥२१३॥ इत्थं निजभवान् श्रुत्वाभवद् विस्मितमानसा । निन्दन्ती दुष्कृतं कर्म पूर्व यदधमं कृतम् ॥२१४॥ अपने मित्रके साथ रात्रिके समय झरोखेसे छिपा खड़ा था सो यह सब सुनकर इससे रोषको प्राप्त हो गया और उस रोषके कारण ही उसने पहले इसे दुःख उपजाया है ॥१९९-२००|| जब वह युद्धके लिए गया तो अत्यन्त मनोहर मानसरोवरपर ठहरा। वहाँ विरहसे छटपटाती हुई चकवीको देखकर अंजनापर दयालु हो गया ॥२०१॥ उसके हृदयमें जो दया उत्पन्न हुई थी वह सखीके समान उसे शीघ्र ही समयपर इस सुन्दरीके पास ले आयी और वह गर्भाधान कराकर पिताकी आज्ञा पूर्ण करनेके लिए चला गया ॥२०२ महादयालु मुनिराज इतना कहकर वाणीसे अमृत झराते हुएके समान अंजनासे फिर कहने लगे कि हे बेटी ! कर्मके प्रभावसे ही तूने यह दुःख पाया है इसलिए फिर कभी ऐसा निन्द्य कार्य नहीं करना ।।२०३-२०४॥ इस पृथ्वीतलपर जो-जो सुख उत्पन्न होते हैं वे सब विशेषकर जिनेन्द्र देवकी भक्तिसे ही उत्पन्न होते हैं ॥२०५।। इसलिए तु संसारसे पार करनेवाले जिनेन्द्र देवकी भक्त हो, शक्तिके अनुसार नियम ग्रहण कर और मुनियोंकी पूजा कर ॥२०६|| भाग्यसे तू उस समय संयमश्री आर्याके द्वारा प्रदत्त बोधिको प्राप्त हुई थी। आर्याने तुझे बोधि क्या दी थी मानो अधोगतिमें जाती हुई तुझे हाथका सहारा देकर ऊपर खींच लिया था ॥२०७॥ यह महाभाग्यशाली गर्भ तेरे उदरमें आया है सो आगे चल कर अनेक उत्तमोत्तम कल्याणोंका पात्र होगा ॥२०८॥ हे शोभने त इस पत्रसे परम विश्रतिको प्राप्त होगी। सब देव मिलकर भी इसका पराक्रम खण्डित नहीं कर सकेंगे ॥२०९॥ थोड़े ही दिनोंमें तुम्हारा पतिके साथ समागम होगा। इसलिए हे शुभे ! चित्तको सुखी रखो और प्रमादरहित होओ ॥२१०॥ मुनिराजके ऐसा कहनेपर जो अत्यन्त हर्षित हो रही थीं तथा जिनके नेत्रकमल खिल रहे थे ऐसी दोनों सखियोंने मुनिराजको बार-बार प्रणाम किया ॥२११॥ तदनन्तर निर्मल हृदयके धारक मुनिराज उन दोनोंके लिए आशीर्वाद देकर आकाश-मागंसे संयमके योग्य स्थानपर चले गये ||२१२।। वे उत्तम मुनिराज उस गुहामें पर्यकासनसे विराजमान थे। इसलिए आगे चलकर वह गुहा पृथिवीमें 'पयंक गुहा' इस नामको प्राप्त हो गयी ।।२१३।। इस प्रकार राजा महेन्द्रकी १. इत्युक्ता म.। २. स त्वं म. । ३. भक्त्या म. । ४. त्वा क. । ५.निर्लोठिते म.। ६. प्रमोदरहिता ब.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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