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________________ पद्मपुराणे निसर्गोऽयं तथा येन जिनानामर्चनात्सुखम् । जायते प्राणिनां दुःखं परमं च तिरस्कृतेः ॥१८॥ यन्नाम दृश्यते लोके दुःखं तत्पापसंभवम् । सुखं च चरितात्पूर्वसुकृतादिति विद्यताम् ॥१८७॥ सा त्वं पुण्यैरिमा वृद्धिं भर्तारं पुरुषाधिपम् । पुत्रं चाद्भुतकर्माणं प्राप्ता इलाध्यासुधारिणाम् ॥१८॥ तथा कुरु यथा भूयो लप्स्यसे सुखमात्मनः । मद्वाक्यादवटे भव्ये ! मा पप्तः सति भास्करे ॥१८९॥ अभविष्यत्तवावासो नरके घोरवेदने । अहं नाबोधयिष्यं चेत्प्रमादोऽयमहो महान् ॥१९॥ इत्युक्ता सा परित्रस्ता दुःखतो नरकोद्भवात् । प्रत्ययादिति शुद्धारमा सम्यग्दर्शनमुत्तमम् ॥१९१॥ अगृहीद गृहिधर्मच शक्तश्च सदशं तपः । जन्मान्यदिव मेने च सांप्रतं धर्मसंगमात् ॥१९॥ प्रतिमां च प्रवेश्यैनां पूर्वदेशे व्यतिष्ठपत् । आनर्च च विचित्राभिः सुमनोमिः सुगन्धिभिः ॥१९३॥ कृतार्थ मन्यमाना स्वं तस्या धर्मनियोजनात् । जगाम स्वोचितं स्थानं संयमश्रीः प्रमोदिनी ॥१९॥ कनकोदर्यपि श्रेयः समुपायं गृहे रता । कृत्वा कालं दिवं गस्वा भुक्त्वा भोगं महागुणम् ॥१९५n च्युत्वा महेन्द्रराजस्य महेन्द्रपुटभेदने । मनोवेगासमाख्यायामञ्जनेति सुताभवत् ॥१९६॥ सेयं पुण्यावशेषेन कृतेन जननान्तरे । जातेहाट्यकुले शुद्ध प्राप्ता च वरमुत्तमम् ॥१९७॥ प्रतिमां च जिनेन्द्रस्य त्रिकालाय॑स्य यद्बहिः । अकार्षीत्समयं कंचित्तेनातो दुःखमागतम् ॥१९८॥ विद्युत्प्रमगुणस्तोत्रं क्रियमाणं पुरस्तव । मिश्रकेश्याः स्वनिन्दा च समित्रः पवनंजयः ॥ १९९॥ दूर कर लेता है और भोजन तथा जलका सेवनकर भूख-प्यासकी पीड़ासे छुट्टी पा जाता है यह स्वाभाविक बात है उसी प्रकार जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करनेसे प्राणियोंको सुख उत्पन्न होता है और उनका तिरस्कार करनेसे परम दुःख प्राप्त होता है यह भी स्वाभाविक बात है ।।१८५-१८६।। यह निश्चित जानो कि संसारमें जो भी दुःख दिखाई देता है वह पापसे उत्पन्न हुआ है और जो भी सुख दृष्टिगोचर है वह पूर्वोपार्जित पुण्य कमसे उपलब्ध है ।।१८७॥ तूने जो यह वैभव, राजा पति और आश्चर्यजनक कार्य करनेवाला पुत्र पाया है सो पूण्यके द्वारा ही पाया है। तु प्राणियोंमें प्रशंसनीय है ।।१८८॥ इसलिए ऐसा कार्य कर जिससे फिर भी तुझे सुख प्राप्त हो। हे भव्ये ! तू मेरे कहनेसे सूर्यके रहते हुए गड्ढे में मत गिर ॥१८९।। इस पापके कारण घोर वेदनासे युक्त नरकमें तेरा निवास हो और मैं तुझे सम्बोधित न करूं यह मेरा बड़ा प्रमाद कहलायेगा ॥१९०॥ आर्यिकाके ऐसा कहनेपर कनकोदरी नरकोंमें उत्पन्न होनेवाले दुःखसे भयभीत हो गयी। उसने उसी समय शुद्ध हृदयसे उत्तम सम्यग्दर्शन धारण किया ॥१९१|| गृहस्थका धर्म और शक्ति अनुसार तप भी उसने स्वीकृत किया। उसे ऐसा लगने लगा मानो धर्मका समागम होनेसे मैंने दूसरा ही जन्म पाया हो ॥१९२।। अर्हन्त भगवान्की प्रतिमाको उसने पूर्व स्थानपर विराजमान कराया और नाना प्रकारके सुगन्धित फूलोंसे उसकी पूजा की ॥१९३।। कनकोदरीको धर्ममें लगाकर अपने आपको कृतकृत्य मानती हई संयमश्री आर्यिका हर्षित हो अपने योग्य स्थानपर चली गयीं ॥१९४।। घरमें अनुराग रखनेवाली कनकोदरी भी पुण्योपार्जन कर आयुके अन्त में स्वर्ग गयी और वहाँ उत्तमोत्तम भोग भोगकर वहाँसे च्युत हो महेन्द्र नगरमें राजा महेन्द्रकी मनोवेगा नामा रानीसे यह अंजना नामक पुत्री हुई है ।।१९५-१९६।। इसने जन्मान्तरमें जो पुण्य किया था उसके अवशिष्ट अंशसे यह यहाँ सम्पन्न एवं विशुद्ध कुलमें उत्पन्न हुई है तथा उत्तम वरको प्राप्त हुई है ।।१९७।। इसने त्रिकालमें पूजनीय जिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमाको कुछ समय तक घरसे बाहर किया था उसीसे इसे यह दुःख प्राप्त हुआ है ॥१९८॥ विवाहके पूर्व जब इसके आगे मिश्रकेशी विद्युत्प्रभके गुणोंकी प्रशंसा और पवनंजयको निन्दा कर रही थी तब पवनंजय १. जानातु । २. भक्तोरं म.। ३. श्लाध्यासुधारिणम् म.। ४. गर्ने । ५. अभविष्यं म. । ६. प्रविश्येनां म. । ७. एतन्नाम्नी आर्यिका। ८. रताः म. । ९. श्रुत्वा म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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