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________________ ३८६ पद्मपुराणे महेन्द्रदुहिता तस्यां सूतिकालव्यपेक्षया । तस्थौ मगधराजेन्द्रपूतायां मुनिसंगमात् ॥२१५॥ वसन्तमालया तस्या विद्याबलसमृदया। पानाशनविधिश्चक्रे मनसा विषयीकृतः ॥२१६॥ अथ प्रियविमुक्तां तां कारुण्येनेव भूयसा । असमर्थो रविष्टमस्तमैच्छन्निषेवितुम् ॥२१७॥ तदुःखादिव मन्दत्वं भास्करस्य करा ययुः । चित्रकर्माप्तिादित्यकरोस्करकृतोपमाः ॥२१८॥ शोकादिव रवेबिम्बं सहसा पातमागतम् । गिरिवृक्षाग्रसंसक्तं करजालं समाहरन् ॥२१९॥ अथागन्तुकसिंहस्य दृष्टयंव क्रोधताम्रया। संध्यया पिहित सर्व क्षणेन नभसस्तलम् ॥२२॥ ततो भाव्युपसर्गेण प्रेरितेव त्वरावती । उदियाय तमोलेखा वेतालीव रसातलात् ॥२२१॥ कृतकोलाहलाः पूर्व दृष्ट्वा तामिव भीतितः । निःशब्दा गहने तस्थुवृक्षाग्रेषु पतत्रिणः ॥२२२॥ प्रावर्तन्त शिवारावो महानिर्घातभीषणाः । वादिता उपसर्गेण प्रकटाः पटहा इव ॥२२३॥ अथ धूतेभकीलालशोणकेसरसंचयः । मृत्युपत्राङ्गलिच्छायां भृकुटि कुटिलां दधत् ॥२२४॥ विमुञ्चन्विषमच्छेदान्नादान् सप्रतिशब्दकान् । वेगिनः सकलं व्योम कुर्वाण इव खण्डशः ॥२२५॥ प्रलयज्वलनज्वालाविलासाञ्चलयन्मुहुः । महास्यगह्वरे जिह्वां प्रहां भूरिजनक्षये ॥२२६॥ पुत्री अंजना अपने भवान्तर सुन आश्चर्यसे चकित हो गयी। उसने पूर्वभवमें जो निन्द्य कार्य किया था उसकी वह बार-बार निन्दा करती रहती थी ॥२१४॥ गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! मुनिराजके संगमसे जो अत्यन्त पवित्र हो चुकी थी ऐसी उस गुफामें अंजना प्रसवकालकी प्रतीक्षा करती हुई रहने लगी ।।२१५॥ विद्या-बलसे समृद्ध वसन्तमाला उसकी इच्छानुसार आहार-पानकी विधि मिलाती रहती थी ॥२१६।। अथानन्तर सूर्य अस्ताचलके सेवनको इच्छा करने लगा अर्थात् अस्त होनेके सम्मुख हुआ। सो ऐसा जान पड़ता था मानो अत्यधिक करुणाके कारण भर्तारसे वियक्त अंजनाको देखने के लिए असमर्थ हो गया हो ॥२१७॥ सर्यकी किरणें भी चित्रलिखित सर्यकी किरणों के समान मन्दपनेको प्राप्त हो गयी थीं सो ऐसा जान पड़ता था मानो अंजनाफा दुःख देखकर ही मन्द पड़ गयी हों ।।२१८।। पर्वत और वृक्षोंके अग्रभागपर स्थित किरणोंके समूहको समेटता हुआ सूर्यका बिम्ब सहसा पतनको प्राप्त हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो अंजनाके शोकके कारण ही पतनको प्राप्त हुआ हो ।।२१९।। तदनन्तर आगे आनेवाले सिंहकी कुपित दृष्टिके समान लालवर्णकी सन्ध्यासे समस्त आकाश क्षण-भर में व्याप्त हो गया ॥२२०॥ तत्पश्चात् भावी उपसर्गसे प्रेरित होकर ही मानो शीघ्रता करनेवाली अन्धकारकी रेखा उत्पन्न हो गयी। वह अन्धकारकी रेखा ऐसी जान पड़ती थी मानो पातालसे वेताली ही निकल रही हो ॥२२१॥ उस वनमें पक्षी पहले तो कोलाहल कर रहे थे पर उन्होंने जब अन्धकारकी रेखा देखी तो मानो उसके भयसे ही नि:शब्द होकर के अग्रभागपर बैठ रहे ॥२२२।। महावज्रपातके समान भयंकर शृगालोंके शब्द होने लगे सो ऐसा जान पड़ता था मानो आनेवाले उपसगंने अपने नगाड़े ही बजाना शुरू कर दिया हो ।।२२३।। ___अथानन्तर वहाँ क्षण-भरमें एक ऐसा विकराल सिंह प्रकट हुआ जो हाथियोंके रुधिरसे लाल-लाल दिखनेवाले जटाओंके समूहको बार-बार हिला रहा था, मृत्युके द्वारा भेजे हुए पत्रपर पड़ी अंगुलीकी रेखाके समान कुटिल भौंहको धारण कर रहा था। वीच-बीचमें प्रतिध्वनिसे युक्त वेगशाली भयंकर शब्द छोड़ रहा था और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो समस्त आकाशके खण्ड-खण्ड ही कर रहा हो। जो प्रलयकालीन अग्निकी ज्वालाके समान चंचल एवं अनेक प्राणियोंका क्षय करनेमें निपुण जिह्वाको मुखरूपी महागर्तमें बार-बार चला रहा था। जो जीवको १. कृतोपमात् ख., क., म. । २. समाहरत् ख., ब.। ३. आच्छादितम् : विहितं म.। ४. शीघ्रतोपेता । ५. शृगाली शब्दाः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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