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________________ षोडश पर्व इति वाचास्य जातोऽसौ प्रबोधं श्लथविग्रहः । कृत्वा विजृम्भणं निद्राशेषारुणनिरीक्षणः ॥२१७॥ श्रवणं वामतर्जन्या कण्डूयन्मुकुलक्षणः । संकोच्य दक्षिणं बाहु निक्षिपक्षनितस्वरम् ।।२१।। कान्तायां निदधन्नेत्रे पाविनतचक्षुषि । एहीति निगदन्मित्रमुत्तस्थौ पवनंजयः ॥२१९॥ कृत्वा स्मितमथापृच्छय सुखरात्रिं कृतस्मितम् । पृच्छन्तं रात्रिकुशलं तद्वेदी तनिवेदनम् ।।२२०॥ निवेश्य तत्प्रियोद्दिष्टे समासन्ने सुखासने । सुहृदेनं जगादेवं नयशास्त्रविशारदः ॥२२॥ उत्तिष्ठ मित्र गच्छावः सांप्रतं बहवो गताः । दिवसास्ते प्रसक्तस्य प्रियासंमानकमणि ॥२२२॥ यावत्कश्चिन्न जानाति प्रत्यागमनमावयोः। गमनं युज्यते तावदन्यथा लजनं भवेत् ॥२२३॥ तिष्ठत्युदीक्षमाणश्च रथनूपुरकस्तव । नृपः कैमरगीतश्च यियासुः स्वामिनोऽन्तिकम् ॥२२४॥ मन्त्रिणश्च किलाजस्रं पृच्छत्यादरसंगतः । पवनो वर्तते क्वेति मरुत्वमखसूदनः ॥२२५॥ उपायो गमनस्यायं मया विरचितस्तव । दयितासंगमस्तस्मादिदानीं तत्र त्यज्यताम् ॥२२६॥ आज्ञेयं करणीया ते स्वामिनो जनकस्य च । क्षेमादागत्य सततं दयितां मानयिष्यति ॥२२७॥ एवं करोमि साधूक्तं सुहृदेत्यभिधाय सः । कृत्वा तनुगतं कर्म संनिधापितमङ्गलम् ॥२२८॥ रहस्यालिङ्गय दयितां चुम्बित्वा स्फुरिताधरम् । जगाद देवि माकार्षीरुद्वेगं त्वं व्रजाम्यहम् ॥२२९।। अचिरेणेव कालेन विधाय स्वामिशासनम् । आगमिष्यामि निवृत्या' तिष्ठेति मधुरस्वरः ॥२३॥ होकर ही यह चन्द्रमा अत्यन्त निष्प्रभताको प्राप्त हुआ है ।। २१६॥ मित्रके यह वचन सुनते ही पवनंजय जाग उठा। उस समय उसका शरीर शिथिल था, निद्राके शेष रहनेसे उसके नेत्र लाल थे तथा जमुहाई आ रही थी ॥२१७॥ उसने नेत्र बन्द किये ही वाम हस्तकी तर्जनी नामा अंगुलीसे कान खुजाया तथा दाहिनी भुजाको पहले संकोचकर फिर जोरसे फैलाया जिससे चटाकका शब्द हुआ ।।२१८।। तदनन्तर लज्जासे जिसके नेत्र नीचे हो रहे थे ऐसे कान्ताके मुखपर दृष्टि डालता हुआ पवनंजय 'आओ मित्र' ऐसा कहता हुआ शय्यासे उठ खड़ा हुआ ॥२१९।। तदनन्तर प्रहसितने हँसकर पूछा कि रात्रि सुखसे व्यतीत हुई ? इसके उत्तरमें पवनंजयने भी हँसते हुए प्रहसितसे पूछा कि तुम्हारी भी रात्रि कुशलतासे बीती ? इस प्रकार वार्तालापके अनन्तर समस्त वृत्तान्तको जाननेवाला एवं नीतिशास्त्रका पण्डित प्रहसित अंजनाके द्वारा बतलाये हुए निकटवर्ती सुखासनपर बैठकर पवनंजयसे इस प्रकार बोला कि हे मित्र ! उठो, अब चलें, प्रियाके सम्मान-कार्यमें लगे हुए आपके बहुत दिन निकल गये ॥२२०-२२२॥ जबतक हम लोगोंका वापस आना कोई जान नहीं पाता है तबतक चला जाना ठीक है अन्यथा लज्जाकी बात हो जायेगी ॥२२३॥ तुम्हारा सेनापति रथनूपुरक तथा स्वामीके समीप जानेका इच्छुक राजा कैन्नरगीत तुम्हारी प्रतीक्षा करते हुए ठहरे हैं ॥२२४॥ आदरसे भरा रावण निरन्तर मन्त्रियोंसे पूछता रहता है कि पवनंजय कहाँ है ? ॥२२५|| मैंने तुम्हारे जानेका यह उपाय रचा था सो इस समय वल्लभाका समागम छोड़ दिया जाये ।।२२६।। तुम्हें स्वामी रावण और पिता प्रह्लादकी यह आज्ञा माननी चाहिए। तदनन्तर कुशलतापूर्वक वापस आकर निरन्तर वल्लभाका सम्मान करते रहना ।।२२७। इसके उत्तरमें पवनंजयने कहा कि हे मित्र ! ऐसा ही करता हूँ। तुमने बहुत ठोक कहा है। ऐसा कहकर उसने मंगलाचारपूर्वक शरीरसम्बन्धी क्रियाएँ की ॥२२८॥ एकान्तमें वल्लभाका आलिंगन किया, उसके फड़कते हुए अधरोष्ठका चुम्बन किया और कहा कि हे देवि ! तुम उद्वेग नहीं करना, मैं जाता हूँ और शीघ्र ही स्वामीकी आज्ञाका पालन कर वापस आ जाऊंगा। १. प्रबुध्य । सुखरात्रिकृतस्मितम् म.। ३. तन्निवेदिनम् ब. । ४. पृच्छन्त्यादर म.। ५. रावणः । ६. संतोषेण । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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