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________________ ३६८ पद्मपुराणे ततो विरहतो मीता तद्वक्त्रगतलोचना । कृत्वा करयुगाम्भोजां जगादाज्जन सुन्दरी || २३१ ॥ आर्यपुत्रर्तुमत्यस्मि' भवता कृतसंगमा । ततस्त्वद्विरहे गर्भो ममावाच्यो भविष्यति ॥ २३२॥ तस्मान्निवेद्य गच्छ त्वं गुरुभ्यो गर्भसंभवम् । क्षेमाय दीर्घदर्शित्वं कैल्पते प्राणधारिणाम् ॥२३३॥ एवमुक्तो जगादासौ देवि पूर्वं त्वया विना । निष्क्रान्तो निश्चितो गेहाद् गुरूणां संनिधावहम् ॥ २३४ ॥ अधुना गमनं तेभ्यस्तदर्थं गदितुं त्रपे । चित्रचेष्टं च विज्ञाय मां जनः स्मेरतां व्रजेत् ॥ २३५|| तस्माद्यावदयं गर्भस्तव नैति प्रकाशताम् । तावदेवात्रजिष्यामि मा ब्राजीर्विमनस्कताम् ॥२३६॥ इमं प्रमादनोदार्थं मन्नामकृतलक्षणम् । गृहाण वलयं मद्रे शान्तिस्तेऽतो मविष्यति ॥ २३७ ॥ इत्युक्त्वा वलयं दत्वा सान्खयित्वा मुहुः प्रियाम् । उक्त्वा वसन्तमालां च तदर्थं समुपासनम् ॥ २३८॥ रतव्यतिकरच्छिन्नहारमुक्ताफलाचितात् । पुष्पगन्धपरागोरुसौरभाकृष्टषट्पदात् ।।२३९ ।। तरङ्गिप्रच्छदपटाद् दुग्धाब्धिद्वीपसंनिमात् । शयनीयात् समुत्तस्थौ प्रियावस्थितमानसः ||२४०|| मङ्गलध्वंस भीत्या च प्रियया साश्रुनेत्रया । अदृष्टिगोचरं दृष्टः समित्रो वियदुद्ययौ ॥२४१|| पृथिवीच्छन्दः कदाचिदिह जायते स्वकृतकर्मपाकोदयात् सुखं जगति संगमादभिमतस्य सद्वस्तुनः । कदाचिदपि संभवस्य सुभृतामसौख्यं परं Jain Education International भवे भवति न स्थितिः समगुणा यतः सर्वदा ॥ २४२ ॥ तुम सुखसे रहो । पवनंजयने यह शब्द बड़ी मधुर आवाज से कहे थे ।। २२९-२३०॥ तदनन्तर जो विरहसे भयभीत थी तथा जिसके नेत्र पवनंजयके मुखपर लग रहे थे ऐसी अंजनासुन्दरी दोनों हस्तकमल जोड़कर बोली कि हे आर्यं पुत्र ! ऋतु कालके बाद ही मैंने आपके साथ समागम किया है इसलिए यदि मेरे गर्भ रह गया तो वह आपके विरह - कालमें निन्दाका पात्र होगा ।। २३१-२३२॥ अतः आप गुरुजनोंको गर्भ सम्भवताकी सूचना देकर जाइए । दीर्घदर्शिता मनुष्योंके कल्याणका कारण है ||२३३|| अंजनाके ऐसा कहने पर पवनंजयने कहा कि हे देवि ! मैं पहले गुरुजनोंके समीप तुम्हारे बिना घर से निकला था और ऐसा ही सबको निश्चय हैं। इसलिए इस समय उनके पास जाने और यह सब समाचार कहने में मुझे लज्जा आती है । इसकी चेष्टाएँ विचित्र हैं ऐसा जानकर लोग मेरी हँसी करेंगे ।।२३४ - २३५॥ अतः जबतक तुम्हारा यह गर्भ प्रकट नहीं हो पाता है तबतक में दापस आ जाऊँगा । विषाद मत करो ॥ २३६ ॥ हे भद्रे ! प्रमाद दूर करनेके लिए मेरे नामसे चिह्नित यह कड़ा ले लो इसमें तुम्हें शान्ति रहेगी || २३७॥ ऐसा कहकर, कड़ा देकर, बार-बार सान्त्वना देकर और वसन्तमालाको ठीक-ठीक सेवा करनेका आदेश देकर पवनंजय शय्यासे उठा । उस समय उसकी वह शय्या सुरतकालीन सम्मदंनसे टूटे हुए हारके मोतियोंसे व्याप्त थी, फूलोंकी सुगन्धित पराग सम्बन्धी भारी सुगन्धिसे भौंरे खिंचकर उसपर इकट्ठे हो रहे थे, उसके ऊपर बिछा हुआ चद्दर लहरा रहा था, और वह क्षीरसमुद्रके मध्य में स्थित क्षीर द्वीपके समान जान पड़ती थी । पवनंजय उठा तो सही पर उसका मन अपनी प्रियामें ही लग रहा था ॥ २३८२४०|| पृथ्वीपर अश्रु गिरनेसे कहीं मंगलाचारमें बाधा न आ जाये इस भयसे अंजनाने अपने अश्रु नेत्रोंमें ही समेटकर रखे थे और इसलिए जाते समय वह पवनंजयको आँख खोलकर नहीं देख सकती थी फिर भी मित्रके साथ वह आकाशकी ओर उड़ गया || २४१ ॥ गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि इस संसार में प्राणियोंको कभी तो अपने पूर्वो १. - मत्यस्मिन् म । २. निन्दनीय: । ३. कल्प्यते प्राणधारणम् म. । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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