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________________ षोडशं पर्व ततोऽसंभाषणादस्याश्चक्षुषश्चानिपातनात् । चकार परमं दुःखं वायुरज्ञाततन्मनाः ॥१॥ रात्रावपि न सा लेभे निन्द्रा विद्राणलोचना । अनारतगलद्वाष्पमलिनौ दधती स्तनौ ॥२॥ वायुमप्यभिनन्दन्ती दयितेनैकनामकम् । तन्नामश्रवणोत्कण्ठावष्टब्धश्रवणा भृशम् ॥३॥ कुर्वती मानसे रूपं तस्य वेद्यां निरूपितम् । अस्पष्टं क्षणनिश्चेष्टस्थिता स्तिमितलोचना ॥४॥ अन्तर्निरूप्य वाञ्छन्ती बहिरप्यस्य दर्शनम् । कुर्वती लोचने स्पष्टे यात्यदृष्टे पुनः शुचम् ॥५॥ सकृदस्पष्टदृष्टत्वाच्चित्रकर्माणि कृच्छ्रतः । लिखन्ती वेपथुग्रस्तहस्तप्रच्युतवर्तिका ॥६॥ संचारयन्ती कृच्छुण वदनं करतः करम् । कृशीभूतसमस्ताङ्गश्लथसस्वनभूषणा ।।७।। दीर्घोणतरनिश्वासदग्धपाणिकपोलिका । अंशुकस्यापि भारेण खेदमङ्गेषु बिभ्रती ॥८॥ निन्दन्ती भृशमात्मानं स्मरन्ती पितरौ मुहुः । दधाना हृदयं शून्यं क्षणं निष्पन्दविग्रहा ॥९॥ दुःखनिःसृतया वाचा वाप्पसंरुद्धकण्ठतः । उपालम्भं प्रयच्छन्ती दैवायात्यन्तविक्लवा ॥१०॥ करैः शीलकरस्यापि विभ्रती दाहमुत्तमम् । प्रासादेऽपि विनिर्यान्ती याति मूच्छा पुनः पुनः ॥११॥ अथानन्तर पवनंजयने अंजनाको विवाह कर ऐसा छोड़ा कि उससे कभी बात भी नहीं करते थे, बात करना तो दूर रहा आँख उठाकर भी उस ओर नहीं देखते थे। इस तरह वे उसे बहत दःख पहुँचा रहे थे। इस घटनासे अंजनाके मन में कितना दुःख हो रहा था इसका उन्हें बोध नहीं था ।।१।। उसे रात्रिमें भी नींद नहीं आती थी, सदा उसके नेत्र खुले रहते थे। उसके स्तन निरन्तर अश्रुओंसे मलिन हो गये थे ।।२।। पतिके समान नामवाले पवन अर्थात् वायुको भी वह अच्छा समझती थी-सदा उसका अभिनन्दन करती थी और पतिका नाम सुननेके लिए सदा अपने कान खड़े रखती थी ॥३॥ उसने विवाहके समय वेदीपर जो पतिका अस्पष्टरूप देखा था उसीका मनमें ध्यान करती रहती थी। वह क्षण-क्षणमें निश्चेष्ट हो जाती थी और उसके नेत्र निश्चल रह जाते थे ॥४॥ वह हृदयमें पतिको देखकर बाहर भी उनका दर्शन करना चाहती थी इसलिए नेत्रोंको पोंछकर ठीक करती थी पर जब बाह्यमें उनका दर्शन नहीं होता था तो पुनः शोकको प्राप्त हो जाती थी ॥५॥ उसने एक ही बार तो पतिका रूप देखा था इसलिए बड़ी कठिनाईसे वह उनका चित्र खींच पाती थी उतने पर भी हाथ बीच-बीच में कांपने लगता था जिससे तुलिका छटकर नीचे गिर जाती था ॥६|| वह इतनी निर्बल हो चुकी थी कि मुखको एक हाथसे दूसरे हाथ पर बड़ी कठिनाईसे ले जा पाती थी। उसके समस्त अंग इतने कृश हो गये थे कि उनसे आभूषण ढीले हो होकर शब्द करते हुए नीचे गिरने लगे थे ।।७॥ उसकी लम्बी और अतिशय गरम सांससे हाथ तथा कपोल दोनों ही जल गये थे। उसके शरीर पर जो महीन वस्त्र था उसीके भारसे वह खेदका अनुभव करने लगी थी ॥८॥ वह अपने आपकी अत्यधिक निन्दा करती हुई बार-बार माता-पिताका स्मरण करती थी तथा शून्य हृदयको धारण करती हुई क्षणक्षणमें निश्चेष्ट अर्थात् मूच्छित हो जाती थी ।।९।। कण्ठके वाष्पावरुद्ध होनेके कारण दुःखसे निकले हुए वचनोंसे वह सदा अपने भाग्यको उलाहना देती रहती थी। अत्यन्त दुःखी जो वह थी ॥१०॥ वह चन्द्रमाकी किरणोंसे भी अधिक दाहका अनुभव करती थी और महलमें भी चलती थी तो १. पवनञ्जयः । २. स्पृष्टे म., ज. । ३. विग्रहा म.। ४. किरणैः । ५. अधिकम् । ६. चलन्ती। विनिर्याति ख. । विनियन्ती क., ज.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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