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________________ पञ्चदशं पर्व ३४९ अविधायेप्सितं कस्मादयं गन्तुं समुद्यतः । कोपोऽस्य जनितः केन केन वा चोदितोऽन्यथा ॥२०॥ विद्यते सर्वमेवास्य कन्योपादानकारणम् । अतः किमित्ययं कस्मादभूदपगताशयः ॥२०५॥ हसित्वा केचिदित्यूचर्नामास्येदं सहार्थकम् । पवनंजय इत्येष यस्माजेतास्य वेगतः ॥२०६॥ उचुरन्येऽयमद्यापि न जानात्यङ्गनारसम् । नूनं येन विहायेमां कन्यां गंतुं समुद्यतः ॥२०७॥ यदि स्यादस्य विज्ञाता रतिः परमुदारजा । बद्धः स्यात्प्रेमबन्धेन ततो वनगजो यथा ॥२०८॥ इत्युपांशुकृतालापसामन्तशतमध्यगः । वेगवद्वाहनो गन्तं प्रवृत्तः पवनंजयः ॥२०९॥ ततः कन्यापिता ज्ञात्वा प्रयाणं तस्य संभ्रमात् । समस्तैबन्धुभिः सार्धमाजगाम समाकुलैः ॥२१०॥ प्रह्लादेन समं तेन ततोऽसावित्यमाष्यत । भद्रेदं गमनं कस्मास्क्रियते शोककारणम् ॥२११॥ ननु केन किमुक्तोऽसि कस्य नेष्टोऽसि शोभन । चिन्तयत्यपि नो कश्चिद्यत्ते बुध न रोचते ॥२१२॥ पितुर्मम च ते वाक्यं दोषे सत्यपि युज्यते । कर्तु किमुत निःशेषदोषसङ्गविवर्जितम् ॥२१३॥ ततः सूरे निवर्तस्व क्रियतां नौवभीप्सितम् । भवादृशां गुरोराज्ञा नन्वानन्दस्य कारणम् ॥२१४॥ इत्युक्त्वापत्यरागेण वीरो विनतमस्तकः । श्वसुरेण कृतः पाणौ जनकेन च सादरम् ॥२१५॥ ततस्तद्गौरवं भक्तुमसमर्थो न्यवर्तत । दध्याविति च कन्यायाः कोपादुःखस्य कारणम् ॥२१६॥ समुह्य शातयाम्येनां दुःखेनासङ्गजन्मना । येनान्यतोऽपि नैवेषा प्राप्नोति पुरुषात्सुखम् ॥२१७॥ Amra जानेके लिए उद्यत क्यों हो गया है ? इसे किसने क्रोध उत्पन्न कर दिया ? अथवा किसने इसे विपरीत प्रेरणा दी है ? ॥२०३-२०४॥ इसके कन्या ग्रहण करनेकी समस्त तैयारी है हो फिर यह किस कारण उदासीन हो गया है ? ॥२०५॥ कितने ही लोग हँसकर कहने लगे कि चूंकि इसने वेगसे पवनको जीत लिया है इसलिए इसका 'पवनंजय' यह नाम सार्थक है ॥२०६।। कुछ लोग कहने लगे कि यह अभी तक स्त्रीका रस जानता नहीं है इसीलिए तो यह इस कन्याको छोड़कर जानेके लिए उद्यत हुआ है ॥२०७॥ यदि इसे उत्तम रतिका ज्ञान होता तो यह जंगली हाथोके समान उसके प्रेमपाशमें सदा बँधा रहता ।।२०८।। इस प्रकार एकान्तमें वार्तालाप करनेवाले सैकड़ों सामन्तोंके बीच खड़ा हुआ पवनंजय वेगशाली वाहनपर आरूढ हो चलनेके लिए प्रवृत्त हुआ ॥२०९॥ तदनन्तर जब कन्याके पिताको इसके प्रस्थानका पता चला तब वह हड़बड़ाकर घबड़ाये हुए समस्त बन्धुजनोंके साथ वहां आया ॥२१०॥ उसने प्रह्लादके साथ मिलकर कुमारसे इस प्रकार कहा कि हे भद्र ! शोकका कारण जो यह गमन है सो किसलिए किया जा रहा है ? आपसे किसने क्या कह दिया ? हे भद्र पुरुष ! आप किसे प्रिय नहीं हैं ? हे विद्वन् ! जो बात आपके लिए नहीं रुचती हो उसका तो यहां कोई विचार ही नहीं करता ॥२११-२१२॥ दोष रहते हुए भी आपको मेरे तथा पिताके वचन मानना उचित है फिर यह कार्य तो समस्त दोषोंसे रहित है अतः इसका करना अनुचित कैसे हो सकता है ? ॥२१३।। इसलिए हे विद्वन् ! लौटो और हम दोनोंका मनोरथ पूर्ण करो। आप जैसे पुरुषोंके लिए पिताकी आज्ञा तो आनन्दका कारण होना चाहिए ।।२१४॥ इतना कहकर श्वसुर तथा पिताने सन्तानके राग वश नतमस्तक वीर पवनंजयका बड़े आदरसे हाथ पकड़ा ॥२१५॥ तत्पश्चात् 'श्वसुर और पिताके गौरवका भंग करनेके लिए असमर्थ होता हआ पवनंजय वापिस लौट आया और क्रोधवश कन्याको दुःख पहुँचानेवाले कारण प्रकार विचार करने लगा ॥२१६।। अब मैं इस कन्याको विवाह कर असमागमसे उत्पन्न दुःखके १. इत्येवं तस्माज्जेतास्य म. । २. विमुक्तोसि । ३. संगवातविजितम् ख. । ४. हे विद्वन् । ५. नौ आवयोः । तावदीप्सितम् ख. । नवमीप्सितम् म. । ६. नत्वानन्दस्य म. । ७. भक्तु म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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