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________________ ३४८ पद्मपुराणे उत्तिष्ठ स्वपुरं यामो न युक्तमवलम्बनम् । सेना प्रयाणशङ्खन कार्यतामवबोधिनी ॥१९०॥ तथेति कारिते तेन क्षुब्धसागरसंनिमा । चचाल सा चमूः क्षिप्रं कृतयानोचितक्रिया ॥१९१॥ ततो रथाश्वमातङ्गपादातप्रभवो महान् । शब्दो भेर्यादिजन्मा च कन्यायाः श्रवणेऽविशत् ॥१९॥ प्रयाणसूचिना तेन नितान्तं दुःखिताभवत् । विशता मुद्गराघातवेगतः शङ्कनेव सा ॥१९३॥ अचिन्तयञ्च हा कष्टं दत्त्वा मे विधिना 'हृतम् । निधानं किं करोम्यत्र कथमेतद्भविष्यति ॥१९॥ अङ्केऽस्य पुरुषेन्द्रस्य क्रीडिष्यामीति ये कृताः । तेऽन्यथैव परावृत्ता मन्दाया मे मनोरथाः ॥१९५॥ क्रियमाणमिमं ज्ञात्वा कथंचिन्निन्दमेतया । वैरिणीभूतया सख्या मयि स्याद् द्वेषमागतः ॥१९६॥ विवेकरहितामेतां धिक्पापां क्रूरमाषिणीम् । यथा मे दयितोऽवस्थामीदृशीमेष लम्भितः ॥१९७॥ कुर्यान्मह्यं हितं तातो जीवितेशं निवर्तयेत् । अपि नाम भवेदस्य बुद्धिावर्तनं प्रति ।।१९८॥ तत्त्वतो यदि नाथो मे परित्यागं करिष्यति । आहारवर्जनं कृत्वा ततो यास्यामि पञ्चताम् ॥१९९।। इति संचिन्तयन्ती सा प्राप्ता मूछो महीतले । पपाताश्चर्यनिर्मुक्ता लूनमूललता यथा ॥२०॥ ततः किमिदमित्युक्त्वा संभ्रमं परमागते । शीतलक्रियया सख्यौ चक्रतुस्तां 'विमूछिताम् ॥२०१॥ पृच्छयमाना च यत्नेन मूर्छाहेतुं श्लथाङ्गिका । शशाक त्रपया वक्तुं न सा स्तिमितलोचना ।।२०२॥ अथ वायुकुमारस्य सेनायामिति मानवाः । आकुला मानसे चक्रुरहेतुगतिविस्मिताः ॥२०३।। नहीं है अतः सुनो और उठो-अपने नगरकी ओर चलें, यहाँ विलम्ब करना उचित नहीं है। प्रस्थान कालमें बजनेवाले शंखसे सेनाको सावधान कर दो ॥१८९-१९०।। तदनन्तर शंखध्वनि होनेपर जो क्षुभित सागरके समान जान पड़ती थी तथा जिसने प्रस्थान कालके योग्य सर्व कार्य कर लिये थे ऐसी सेना शीघ्र ही चल पड़ी ॥१९१।। तत्पश्चात् रथ, घोड़े, हाथी, पैदल सिपाही और भेरी आदिसे उत्पन्न हुआ शब्द कन्याके कानमें प्रविष्ट हुआ ॥१९२।। प्रस्थानको सूचित करनेवाले उस शब्दसे कन्या अत्यन्त दुःखी हुई मानो मुद्गर प्रहार सम्बन्धी वेगसे प्रवेश करनेवाली कीलसे पीड़ित ही हुई थी ॥१९३|| वह विचार करने लगी कि हाय-हाय, बड़े खेदकी बात है कि विधाताने मेरे लिए खजाना देकर छीन लिया। मैं क्या करूँ ? अब कैसा क्या होगा? ॥१९४।। इस श्रेष्ठ पुरुषकी गोदमें कोड़ा करूंगी इस प्रकारके जो मनोरथ मैंने किये थे मुझ अभागिनीके वे सब मनोरथ अन्यथा ही परिणत हो गये और रूप ही बदल गये ||१९५|| इस वैरिन सखीने जो उनकी निन्दा की थी जान पड़ता है.कि किसी तरह उन्हें इसका ज्ञान हो गया है इसीलिए वे मझपर द्वेष करने लगे हैं ॥१९६।। विवेकरहित, पापिनी तथा कर वचन बोलनेवाली इस सखीको धिक्कार है जिसने कि मेरे प्रियतमको यह अवस्था प्राप्त करा दी ॥१९७॥ पिताजी यदि हृदयवल्लभको लौटा सकें तो मेरा बड़ा हित करेंगे और क्या इनकी भी लौटनेकी बुद्धि होगी ॥१९८।। यदि सचमुच ही हृदयवल्लभ मेरा परित्याग करेंगे तो मैं आहार त्याग कर मृत्युको प्राप्त हो जाऊँगी ॥१९९।। इस प्रकार विचार करती हुई अंजना मूर्छित हो छिन्नमूल लताके समान पृथिवीपर गिर पड़ो ॥२००॥ तदनन्तर 'यह क्या है ?' ऐसा कहकर परम उद्वेगको प्राप्त हुई दोनों सखियोंने शीतलोपचारसे उसे मूर्छारहित किया ।।२०१।। उस समय उसका समस्त शरीर ढीला हो रहा था और नेत्र निश्चल थे। सखियोंने प्रयत्नपूर्वक उससे मूर्छाका कारण पूछा पर वह लज्जाके कारण कुछ कह न सकी ।।२०२।। अथानन्तर वायुकुमार (पवनंजय ) की सेनाके लोग इस अकारण गमनसे चकित हो बड़ी आकुलताके साथ-मनमें विचार करने लगे कि यह कुमार इच्छित कार्यको पूरा किये बिना ही १. हतम् म. । २. निर्भाग्यायाः । ३. कथंचिद्भेदमेतया म.। ४. विद्वेषमागतः म., ब.। ५. विमूर्छताम् म. ६. मानवः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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