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________________ ३४६ पद्मपुराणे असौ संवत्सरैरल्पैर्मुनितां यास्यतीति सः । अस्याः पित्रा परित्यक्तस्तन्मे नाभाति शोभनम् ॥१६॥ वरं विद्युत्प्रभेणामा क्षणोऽपि सुखकारणम् । सत्रानन्तोऽपि नान्येन कालः क्षुद्रासुधारिणा ॥१६२॥ ततः प्राहादिरित्युक्ते क्रोधानलविदीपितः । क्षणाच्छायापरीवर्त संप्राप्तः पुरुवेपथुः ॥१६३॥ दष्टाधरः संमाकर्षन् सायकं परिवारतः । निरीक्षणस्फुरच्छोणच्छायाच्छन्न दिगाननः ॥१६॥ ऊचे प्रहसितावश्यमस्या एवेदमीप्सितम् । कन्याया यददत्येवमियं नारी जुगु पिसतम् ॥१६५॥ लुनाम्यतोऽनयोः पश्य मूधोनमुभयोरपि । विद्यत्प्रभोऽधुना रक्षां करोतु हृदयप्रियः ॥१६६॥ समाकर्ण्य ततो वाक्यं मैत्रं प्रहसितो रुषा । जगाद भ्रकुटीबन्धमीषणालिकपट्टिकः ॥१६७॥ सखे सखेऽलमेतेन यत्नेनागोचरे तव । ननु ते सायकस्यारिनरनाशः प्रयोजनम् ॥१६८॥ अतः पश्यत वाक्रोशप्रसनां दुष्टयोषितम् । इमामेतेन दण्डेन करोमि गतजीविताम् ॥१६९॥ ततो दृष्टास्य संरम्भं महान्तं पवनंजयः । विस्मृतात्मीयसंरम्मः खड़गं कोशं प्रतिक्षिपन् ॥१७॥ निजप्रकृतिसंप्राप्तिप्रवणाशेषविग्रहः । जगाद सुहृदं क्रूरकर्मनिश्चितमानसम् ॥१७१॥ अयि मित्र शमं गच्छ तवाप्येष न गोचरः । कोपस्यानेकसंग्रामजयोपार्जनशालिनः ॥१७२॥ इतरस्यापि नो युक्तं कर्तुं नारीविपादनम् । किं पुनस्तव मत्तेमकुम्भदारणकारिणः ॥१७३॥ पुंसां कुलप्रसूतानां गुणख्यातिमुपेयुषाम् । यशो मलिनताहेतुं कर्तुमेवमसांप्रतम् ॥१४॥ तस्मादुत्तिष्ट गच्छावस्तेनैव पुनरध्वना । विचित्रा चेतसो वृत्तिर्जनस्यात्र न कुप्यते ॥१७५॥ और समुद्र के बीच होता है ।।१६०॥ वह थोड़े ही वर्षों में मुनिपद धारण कर लेगा इस कारण इसके पिताने उसकी उपेक्षा की है पर यह बात मुझे अच्छी नहीं मालूम होती ॥१६१।। विद्युत्प्रभके साथ इसका एक क्षण भी बीतता तो वह सुखका कारण होता और अन्य क्षद्र प्राणीके साथ अ अनन्त भी काल बीतेगा तो भी वह सुखका कारण नहीं होगा ॥१६२।। तदनन्तर मिश्रकेशीके ऐसा कहते ही पवनंजय क्रोधाग्निसे देदीप्यमान हो गया, उसका शरीर काँपने लगा और क्षण-भरमें ही उसकी कान्ति बदल गयी ॥१६३।। ओठ चाबते हुए उसने म्यानसे तलवार बाहर खींच ली और नेत्रोंसे निकलती हुई लाल-लाल कान्तिसे दिशाओंका अग्र भाग व्याप्त कर दिया ॥१६४।। उसने मित्रसे कहा कि हे प्रहसित ! यह बात अवश्य ही इस कन्याके लिए इष्ट होगी तभी तो यह स्त्री इसके समक्ष इस घृणित बातको कहे जा रही है ।।१६५।। इसलिए देखो, मैं अभी इन दोनोंका मस्तक काटता हूँ। हृदयका प्यारा विद्युत्प्रभ इस समय इनकी रक्षा करे ॥१६६।। तदनन्तर मित्रके वचन सुनकर क्रोधसे जिसका ललाटतट भौंहोंसे 'भयंकर हो रहा था ऐसा प्रहसित बोला कि मित्र! मित्र ! अस्थानमें यह प्रयत्न रहने दो। तुम्हारी तलवारका प्रयोजन तो शत्रुजनोंका नाश करना है न कि स्त्रीजनोंका नाश करना ॥१६७-१६८|| अतः देखो, निन्दामें तत्पर इस दुष्ट स्त्रीको मैं इन डण्डेसे ही निर्जीव किये देता हूँ ॥१६९।। तदनन्तर पवनंजय, प्रहसितके महाक्रोधको देखकर अपना क्रोध भूल गया, उसने तलवार म्यानमें वापस डाल ली ॥१७०।। और उसका समस्त शरीर अपने स्वभावकी प्राप्तिमें निपुण हो गया अर्थात् उसका क्रोध शान्त हो गया। तदनन्तर उसने क्रूर कार्यमें दृढ़ मित्रसे कहा ॥१७१॥ कि हे मित्र ! शान्तिको प्राप्त होओ। अनेक युद्धोंमें विजय प्राप्त करनेसे सुशोभित रहनेवाले तुम्हारे क्रोधका भी ये स्त्रियाँ विषय नहीं हैं ॥१७२।। अन्य मनुष्यके लिए भी स्त्रोजनका घात करना योग्य नहीं है फिर तुम तो मदोन्मत्त हाथियोंके गण्डस्थल चीरनेवाले हो अतः तुम्हें युक्त कैसे हो सकता है ? ॥१७३।। उच्च कुलमें उत्पन्न तथा गुणोंकी ख्यातिको प्राप्त पुरुषोंके लिए इस प्रकार यशकी मलिनता करनेवाला कार्य करना योग्य नहीं है ॥१७४।। इसलिए उठो उसी मार्गसे पुनः वापस चलें। मनुष्यकी मनोवृत्ति भिन्न प्रकारकी होती है अतः उसपर क्रोध करना उचित नहीं है ॥१७५।। १. प्राह्लादिमित्यु -म. । २. परावृत्तं म. । ३. सायकः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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