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________________ पञ्चवशं पर्व अत्रान्तरे प्रियात्यन्तं वसन्ततिलकामिधा । अमाषत सखी वाक्यमिदमअनसुन्दरीम् ॥१४७॥ अहो 'परमधन्या त्वं सुरूपे भर्तृदारिके । पिता वायुकुमाराय यद्दत्तासि महौजसे ॥१४॥ गुणैस्तस्य जगत्सर्व शशाङ्ककिरणामलैः । व्याप्तमन्यगुणख्यातितिरस्करणकारणैः ॥१४९॥ कलशब्दा महारत्नप्रभापटलरञ्जिता । अङ्के स्थास्यति वीरस्य तस्य वेलेव वारिधेः ॥१५०॥ पतिता वसुधारा स्वं तटे रत्नमहीभृतः । इलाध्यसंबन्धजस्तोषो वधूनाममवत्परः ॥१५॥ कीर्तयन्त्यां गुणानेवं तस्य सख्या सुमानसा । लिलेख लजयाङ्गल्या कन्याङ्ग्रिनखमानता ॥१५२॥ नितान्तं च हृतो दूरं पूरेणानन्दवारिणः । विकसन्नयनाम्मोजच्छन्नास्यः पवनंजयः ॥१५३॥ नाम्नाथ मिश्रकेशीति वाक्यं सख्यपरावदत् । संकुचत्पृष्ठबिम्बोष्टं धूतधम्मिलपल्लवम् ॥१५४॥ अहो परममज्ञानं त्वया कथितमात्मनः । विद्युत्प्रमं परित्यज्य वायोर्गृह्णासि यद्गुणान् ॥१५५॥ कथा विद्युत्प्रभस्यास्मिन्मया स्वामिगृहे श्रुता । तस्मै देया न देयेयं कन्येति मुहुरुद्गता ॥१५६॥ उदन्वदम्भसो बिन्दुसंख्यानं योऽवगच्छति । तदगुणानां मतिः पारं व्रजेत्तस्यामलत्विषाम् ॥१५७॥ युवा सौम्यो विनीतात्मा दीप्तो धीरः प्रतापवान् । पारेवियं स्थितः सर्वजगद्वाञ्छितदर्शनः ॥१५८॥ विद्यत्प्रभो भवेदस्याः कन्याया यदि पुण्यतः । भर्ता ततोऽनया लब्धं जन्मनोऽस्य फलं मवेत् ॥१५९॥ वसन्तमालिके भेदो वायोर्विद्युत्प्रभस्य च । स गतो जगति ख्याति गोष्पदस्याम्बुधेश्च यः ॥१६०॥ ___ इसी बीचमें उसकी वसन्ततिलका नामकी अत्यन्त प्यारी सखीने अंजना सुन्दरीसे यह वचन कहे कि हे सुन्दरी ! राजकुमारी ! तुम बड़ी भाग्यशालिनी हो जो पिताने तुझे महाप्रतापी पवनंजयके लिए समर्पित किया है ॥१४७-१४८॥ चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल एवं अन्य मनुष्योंके गुणोंकी ख्यातिको तिरस्कृत करनेवाले उसके गुणोंसे यह समस्त संसार व्याप्त हो रहा है ।।१४९॥ बड़ी प्रसन्नताकी बात है कि तुम समुद्रकी बेलाके समान महारत्नोंकी कान्तिके समूहसे प्रभासित हो, मनोहर शब्द करती हुई उसकी गोदमें बैठोगी ॥१५०|| तुम्हारा उसके साथ सम्बन्ध होनेवाला है सो मानो रत्नाचलके तटपर रत्नोंकी धारा ही बरसनेवाली है। यथार्थमें स्त्रियोंके प्रशंसनीय सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाला सन्तोष ही सबसे बड़ा सन्तोष होता है ॥१५१॥ इस प्रकार जब सखी वसन्तमाला पवनंजयके गुणोंका वर्णन कर रही थी तब अंजना मन ही मन प्रसन्न हो रही थी और लज्जाके कारण मुख नीचा कर अंगुलीसे पैरका नख कुरेद रही थी ॥१५२।। और खिले हुए नेत्रकमलोंसे जिसका मुख व्याप्त था ऐसे पवनंजयको आनन्दरूपी जलका प्रवाह बहुत दूर तक बहा ले गया था ॥१५३॥ अथानन्तर मिश्रकेशी नामक दूसरी सखीने निम्नांकित वचन कहे । कहते समय वह अपने लाल-लाल ओठोंको भीतरकी ओर संकुचित कर रही थी तथा सिर हिलानेके कारण उसकी चोटीमें लगा पल्लव नीचे गिर गया था ॥१५४॥ उसने कहा कि चूंकि तू विद्युत्प्रभको छोड़कर पवनंजयके गण ग्रहण कर रही है इससे तने अपना बडा अज्ञान प्रकट किया है॥१५५॥ मैंने राजमहलोंमें विद्युत्प्रभकी चर्चा कई बार सुनी है कि उसके लिए यह कन्या दी जाये अथवा नहीं दी जाये ।।१५६।। जो समुद्रके जलकी बूंदोंकी संख्या जानता है उसीकी बुद्धि उसके निर्मल गुणोंका पार पा सकती है ॥१५७|| वह युवा है, सौम्य है, नम्र है, कान्तिमान् है, धीर-वीर है, प्रतापी है, विद्याओंका पारगामी है और समस्त संसार उसके दर्शनको इच्छा करता है ॥१५८।। यदि पुण्ययोगसे विद्युत्प्रभ इस कन्याका पति होता तो इसे इस जन्मका फल प्राप्त हो जाता ॥१५९।। हे वसन्तमालिके ! पवनंजय और विद्युत्प्रभके बीच संसारमें वही भेद प्रसिद्ध है जो कि गोष्पद १. परमधन्यत्वं न.। २. कलशब्दमहारत्न -ख., ज.। ३. श्लाघ्या संबन्धजः म.। ४. पल्लवा ब. । ५. पारे विद्यास्थितः म. । पारेविद्यां ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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