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________________ पापुराणे ततः समुचिते काले तस्मिन् 'प्रस्तुतकर्मणः । इत्यवोचत सोत्साहः सुहृदं पवनंजयः ॥१३५॥ उत्तिष्ठाग्रे सखे तिष्ठ कुरु मार्गोपदेशनम् । वजावस्तत्र सा यत्र तिष्ठति स्वान्तहारिणी ॥१३६॥ इत्युक्ते प्रस्थितौ गन्तुं पूर्वप्रस्थितमानसौ । मीनाविव महानीलनीलग्योमतलार्णवे ॥१३७॥ क्षणेन च परिप्राप्तौ गृहमोञ्जनसुन्दरम् । सुन्दरं तत्समासत्या रत्नौषसममन्दरम् ॥१३८॥ सप्तमं स्कन्धमारुह्य तस्य वातायनस्थितौ । मुक्ताजालतिरोधानावङ्गनां तामपश्यताम् ॥१३९॥ संपूर्णवक्त्रचन्द्रांशुविफलीकृतदीपिकाम् । सितासितारुणच्छायचक्षुःशारितदिङ्मुखाम् ॥१४०॥ आमोगिनौ समुत्तुङ्गौ प्रियायें हारिणौ कुचौ । कलशाविव बिभ्राणां' शृङ्गाररसपूरितौ ॥१४॥ नवपलवसच्छायं पाणिपादं सुलक्षणम् । समुगिरदिवाभाति लावण्यं नखरश्मिभिः ॥१४२॥ स्तनभारादिवोदारान्मध्यं मामिशङ्कया। त्रिवलीदाममिर्बद्धं दधतीं तनुताभृतम् ॥१४॥ तूणौ मनोभुवः स्तम्भौ बन्धनं मदकामयोः । सुवृत्तौ बिभ्रतीमूरू नदौ लावण्यवाहिनौ ॥१४॥ इन्दीवरावलीछायां युक्ता मुक्ताफलोडुमिः । आसक्तां प्रियचन्द्रेण मूर्तामिव विभावरीम् ॥१४५॥ आसेचनकवीक्ष्यां तामेकतानस्थितेक्षणः। संप्राप्तः सुखितामुर्वीमैक्षिष्ट पवनंजयः ॥१४६॥ तदनन्तर जब प्रकृत कार्यके योग्य समय आ गया तब उत्साहसे भरे पवनंजयने मित्रसे इस प्रकार कहा ॥१३५।। हे मित्र! उठो, मार्ग दिखलाओ, हम दोनों वहाँ चलें जहां कि वह हृदयको हरनेवाली विद्यमान है॥१३६॥ इतना कहनेपर दोनों मित्र वहाँके लिए चल पडे। उनके मन उनके जानेके पूर्व ही प्रस्थान कर चुके थे और वे महानील मणिके समान नील आकाशतलरूपी समुद्र में मछलियोंकी तरह जा रहे थे ॥१३७॥ दोनों मित्र क्षण-भरमें ही अंजनासुन्दरीके घर जा पहुंचे। उसका वह घर अंजनासुन्दरीके सन्निधानसे ऐसा सुशोभित हो रहा था जैसा कि रत्नोंके समूहसे सुमेरु पर्वत सुशोभित होता है ॥१३८॥ उस भवनके सातवें खण्डमें चढ़कर दोनों मित्र मोतियोंकी जालीसे छिपकर झरोखेमें बैठ गये और वहींसे अंजनासुन्दरीको देखने लगे ॥१३९।। वह अंजनासुन्दरी अपने मुखरूपी पूर्ण चन्द्रमाकी किरणोंसे भवनके भीतर जलनेवाले दीपकोंको निष्फल कर रही थी तथा उसके सफेद, काले और लाल-लाल नेत्रोंकी कान्तिसे दिशाएं रंग-बिरंगी हो रही थीं ॥१४०॥ वह स्थूल, उन्नत एवं सुन्दर स्तनोंको धारण कर रही थी उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो पतिके स्वागतके लिए श्रृंगार रससे भरे हए दो कलश ही धारण कर रही थी ॥१४१।। नवीन पल्लवोंके समान लाल-लाल कान्तिको धारण करनेवाले तथा अनेक शुभ लक्षणोंसे परिपूर्ण उसके हाथ और पैर ऐसे जान पड़ते थे मानो नखरूपी किरणोंसे सौन्दर्यको ही उगल रहे हों॥१४२॥ उसकी कमर पतली तो थी ही ऊपरसे उसपर स्तनोंका भारी बोझ पड़ रहा है इसलिए वह कहीं टूट न जाये इस भयसे ही मानो उसे त्रिवलिरूपी रस्सियोंसे उसने कसकर बाँध रखा था ॥१४३।। वह अंजना जिन गोल-गोल जाँघोंको धारण कर रही थी वे कामदेवके तरकसके समान, अथवा मद और कामके बाँधनेके स्तम्भके समान अथवा सौन्दर्यरूपी जलको बहानेवाली नदियोंके समान जान पड़ती थीं ॥१४४॥ उसकी कान्ति इन्दीवर अर्थात् नील कमलोंके समूहके समान थी, वह मुक्ताफल-रूपी नक्षत्रोंसे सहित थी तथा पतिरूपी चन्द्रमा उसके पास ही विद्यमान था इसलिए वह मूर्तिधारिणी रात्रिके समान जान पड़ती थी॥१४५। इस प्रकार जिसके देखनेसे तृप्ति ही नहीं होती थी ऐसी अंजनाको पवनंजय एकटक नेत्रोंसे देखता हुआ परम सुखको प्राप्त हुआ ॥१४६॥ १. प्रकृतकार्यस्य । २. अञ्जनसुन्दर्या इदमाञ्जनसुन्दरम् । ३. अञ्जनसुन्दरीसंनिधानेन । तत्समा भक्त्या क., ब., म., ज.। ४. संपूर्णवस्त्र -म.। ५. बिभ्राणा म.। ६. तनुताभृताम् ख. । तनुतां भृशम् म. । ७. मूर्तामेव म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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