SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 393
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ पञ्चदशं प कुटुम्बी क्षितिपालाय गुरवेऽन्तेवसन् प्रिया । पत्यै वैद्याय रोगार्तो मात्रे शैशवसंगतः ||१२२ || निवेद्य मुच्यते दुःखाद्यथात्यन्तपुरोरपि । मित्रायैवं नरः प्राज्ञस्ततस्ते कथयाम्यहम् ॥ १२३ ॥ श्रुत्वैव तामहं हृद्यं महेन्द्रतनुसंभवाम् । मन्मथस्य शरैद्रं विकलस्वमुपागतः ॥ १२४॥ तामदृष्ट्वातिचक्षुष्यां प्रियां मानसहारिणीम् । अतिवाहयितुं नाहं प्रभवामि दिनत्रयम् ॥ १२५ ॥ अतो विधत्स्व तं यत्नं येन पश्यामि तामहम् । तदर्शनादहं स्वस्थो मयि स्वस्थे भवानपि ॥ १२६॥ जीवितं ननु सर्वस्यादिष्टं सर्वशरीरिणाम् । सति तत्रान्यकार्याणामात्मलामस्य संभवः || १२७ || एवमुक्तस्ततोऽवोचदाशु प्रहसितो हसन् । लब्धार्थमिव कुर्वाणः सद्यो मित्रस्य मानसम् ||१२८|| सखे किं बहुनोक्तेन कृत्यकालातिपातिना । वद किं करवाणीति ननु नान्यत्वमावयोः || १२९|| यावत्त्योः समालापो वर्ततेऽयं सुचित्तयोः । तावत्तदुपकारीव गतोऽस्तं धर्मदीधितिः ॥१३०॥ प्राहादेखि रागेण संध्यालोकेन मानुमान् । प्रेरितो ध्वान्तसंभूतिमिच्छता प्रियकारिणा ॥ १३१ ॥ कान्तया रहितस्यास्य दुःखं दृष्ट्वैव संध्यया । करुणायुक्तया भर्त्ता तेजसामनुवर्तितः ॥१३२॥ ततो मास्करनाथस्य वियोगादिव 'कृष्णताम् । आशा पौरन्दरी' प्राप तमसात्यन्तभूरिणा ॥ १३३॥ नेव च वस्त्रेण क्षणालो कस्तिरस्कृतः । रजो नीलाज्जनस्येव प्रवृत्तं पतितुं घनम् ॥१३४॥ जाननेवाले एक आपको छोड़कर दूसरा ऐसा कौन उदारचेता है जिसके लिए यह दुःख बताया जाये ? ||१२१|| जिस प्रकार गृहस्थ राजाके लिए, विद्यार्थी गुरुके लिए, स्त्री पतिके लिए, रोगी वैद्यके लिए और बालक माताके लिए प्रकटकर बड़े भारी दुःखसे छूट जाता है उसी प्रकार मनुष्य मित्र के लिए प्रकटकर दुःखसे छूट जाता है इसी कारण मैं आपसे कुछ कह रहा हूँ ||१२२-१२३ ॥ जबसे मैंने अनवद्य सुन्दरी राजा महेन्द्रकी पुत्रीकी चर्चा सुनी हैं तभीसे में काम के बाणोंसे अत्यधिक विकलता प्राप्त कर रहा हूँ ॥ १२४ ॥ ३४३ मनको हरनेवाली उस सुन्दरी प्रियाको देखे बिना मैं तीन दिन बिताने के लिए समर्थ नहीं हूँ ॥ १२५ ॥ इसलिए ऐसा प्रयत्न करो कि जिससे में उसे देख सकूँ । क्योंकि उसके देखनेसे मैं स्वस्थ हो सकूँगा और मेरे स्वस्थ रहनेसे आप भी स्वस्थ रह सकेंगे ||१२६|| निश्चयसे सब प्राणियों के लिए अन्य समस्त वस्तुओंकी अपेक्षा अपना जीवन ही इष्ट होता है क्योंकि उसके रहते हुए ही अन्य कार्योंका होना सम्भव है ॥ १२७॥ तदनन्तरमित्रके मनको मानो कृतकृत्य करता हुआ प्रहसित हँसकर शीघ्र ही बोला ॥१२८॥ कि हे मित्र ! करने योग्य कार्यका उल्लंघन करनेवाले बहुत कहने से क्या मतलब है कहो, मैं क्या करूँ ? यथार्थ में हम दोनोंमें पृथकपना नहीं हैं ॥ १२९ ॥ उत्तम चित्तके धारक उन मित्रोंके बीच जबतक यह वार्तालाप चलता है तबतक सूर्य अस्त हो गया सो मानो उनका उपकार करने के लिए ही अस्त हो गया था ॥ १३० ॥ जो पवनंजयके रागके समान लाल-लाल था, अन्धकारके प्रसारको चाहता था और प्रिय करनेवाला था ऐसे सन्ध्याके आलोकसे प्रेरित होकर ही मानो सूर्य अस्त हुआ था || १३१॥ कान्तासे रहित पवनंजयका दुःख देखकर ही मानो जिसे करुणा उत्पन्न हो गयी थी ऐसी सन्ध्या अपना पति जो सूर्य सो उसके पीछे चलने लगी थी— उसके अनुकूल हो गयी थी ॥ १३२ ॥ तदनन्तर पूर्व दिशा अत्यधिक अन्धकारसे कृष्णताको प्राप्त हो गयी सो मानो सूर्यरूप पति वियोगसे ही मलिन अवस्थाको प्राप्त हुई थी || १३३ || क्षण-भर में लोक ऐसा दिखने लगा मानो नील वस्त्र से ही आच्छादित हो गया हो अथवा नीलांजनकी सघन पराग ही सब ओर उड़-उड़कर गिरने लगी हो ॥ १३४ ॥ १. सूर्यः । २. प्राह्लादेरपि म । प्राह्लादेनेव ख. । ३. भानुना म । ४. कृष्णता म. । ५. पूर्वा । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy