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________________ प्रस्तावना प्रयत्न करती है पर सब बेकार है । आखिर केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्षपदके उपभोक्ता होते हैं । रामके जीवनकी प्रत्येक घटनाएँ और उनकी प्रत्येक प्रवृत्तियाँ मानव मात्रको ऊँचा उठानेवाली हैं, कारण है कि आज इतना भारी अन्तराल बीत जानेपर भी राम जन-जन के श्रद्धाभाजन बने हु हैं । [७] सीता जनकनन्दिनी सीता रामकी आदर्श पत्नी हैं। राम गम्भीरताके समुद्र हैं तो सीता दयाकी सरिता है । सीता अपने शील के लिए प्रसिद्ध है । राजा अमितवीर्यके विरुद्ध जब सीता, लक्ष्मण तथा उनके सालोंको उत्तेजित देखती है तब सोता जो गम्भीर प्रवचन करती है आखिर राम उसका समर्थन ही करते हैं और लक्ष्मणसे कहते हैं कि सीताने जो कहा है वह हृदयहारी है, दूरदर्शिता से भरा है और विचारणीय है । वज्रकर्णके शत्रु सिंहोदरको लक्ष्मण कसकर बाँध लाते हैं और सीता तथा रामके सामने डाल देते हैं । उसकी दशा देख नारीकी कोमलता वचनद्वारसे फूट पड़ती है जिसे देख सिंहोदर पानी-पानी हो जाता है | ३७ वास्तव में यही तो दण्डक वन में कर्णरवा नदी के किनारे सीता भोजन बनाती है । चारण ऋद्धिधारी मुनियोंको आते देख उसकी प्रसन्नताका ठिकाना नहीं रहा है, वह रामको मुनियोंके दर्शन कराती है और भक्ति से पड़गाहकर आहार देती है | चन्द्रनखाका प्रपंच सीताहरणका कारण बनता है । रावण छलसे सीताका हरण करता है । रावणकी अशोक वाटिकामें सीताके सामने तरह-तरह के प्रलोभन आते हैं पर उन सबको वह ठुकरा देती है । 'जबतक रामका सन्देश न मिलेगा तबतक आहार- पानीका त्याग है' ऐसा नियम लेकर वह देवीको भाँति बैठ जाती है । हनुमान् रामका सन्देश लेकर पहुँचते हैं । उसकी प्रसन्नताका पारावार नहीं रहता । युद्ध होता है, रावण मारा जाता है, सीताका रामसे मिलाप होता है, अयोध्या में वापस आनेपर कुछ समय बाद सीता गर्भवती होती है । लोकापवाद के भयसे राम उसे बीहड़ अटवी में छुड़वा देते हैं, फिर भी रामके प्रतिकूल उसके मुखसे एक शब्द भी नहीं निकलता है । वह यही कहती है कि मेरे भाग्यका दोष है | लक्ष्मणके हाथ सन्देश भेजती है कि 'जिस प्रकार लोगोंके कहनेसे आपने मेरा त्याग किया है उस प्रकार लोकोत्तर धर्मका त्याग नहीं कर देना । सम्यग्दृष्टि पुरुष बाह्यनिमित्तोंसे न जूझकर अपने अन्तरंग निमित्तसे जूझते हैं' इसी कारण सीताने इस भारी अपमानके समय भी अपना हो दोष देखा, रामका नहीं । छोड़कर निर्जन वनमें क्या करेगी ? यह भी रामने नहीं विचारा | सीताको बहन के रूपमें घर ले जाता है और वहीं सीता शूर-वीर पिताके शूर-वीर ही पुत्र द्वारा राम-लक्ष्मणको पुत्रोंका पता सीताकी अग्नि परीक्षा होती है। लक्ष्मण वापस चले आते हैं । गर्भवती स्त्री अकेली, सीताका विलाप सुन वज्रजंघ राजा वहाँ पहुँचता है, युगलपुत्रों को जन्म देती है । पुत्रोंका लालन-पालन बड़े प्यारसे होता है । | पितासे युद्ध कर तथा उन्हें परास्त कर अपना परिचय देते हैं, नारदके चलता है, यह पिता और पुत्रोंका मिलन हृदयको गद्गद कर देता है । सती के शीलसे अग्नि कुण्ड जल-कुण्ड हो जाता है । इस देवकृत अतिशयसे सीताके शीलको महिमा सर्वत्र फैल जाती है। राम कहते हैं कि प्रिये ! घर चलो, पर सीता कहती है कि मैं घर देख चुकी, अब तो वन देखूँगी और वनमें जाकर आर्यिका हो जाती है, सीताकी निःशल्य आत्मा तपके प्रभावसे अच्युत स्वर्ग में प्रतीन्द्र हुई। इस तरह हम सीताको आदर्श नारीके रूप में पाते हैं । [ ८ ] लक्ष्मण लक्ष्मण राजा दशरथकी सुमित्रा रानीके पुत्र हैं । रामके साथ इनका नैसर्गिक प्रेम है, उनके प्रेमके पीछे हम लक्ष्मणको अपना समस्त सुख न्योछावर करते हुए पाते हैं । रामको वनवासके लिए उद्यत देख, लक्ष्मण उनके पीछे हो लेते हैं । यद्यपि पहले पिताके प्रति उन्हें कुछ रोष उत्पन्न होता है, पर बादमें यह सोचकर सन्तोष कर लेते हैं कि 'न्याय-अन्याय बड़े भाई समझते हैं, मेरा कर्तव्य तो इनके साथ जाना है ।' Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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