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________________ ३६ पद्मपुराणे हृदयको एकदम गद्गद कर देनेवाली है । तदनन्तर राजा जनक मिथिलाका राज्य कनकको दे भामण्डल के साथ विजयार्धं चले जाते हैं । [६] राम राम राजा दशरथकी अपराजिता [ कौशल्या ] रानीके सुयोग्य पुत्र हैं । यही इस ग्रन्थके कथानायक हैं । प्रकृत्या सरल एवं शूरवीर हैं। राजा दशरथ विरक्त होकर दीक्षा लेनेकी तैयारी कर रहे हैं पर भरत उनसे पहले ही विरक्त हो दीक्षा लेना चाहते हैं, पिता दशरथ उन्हें समझाते हैं और राम भी । राम जिस ममता और वात्सल्यसे भरत को समझाते हैं वह उनकी महत्ता के अनुरूप है । जिस किसी तरह भरत शान्त हो जाते हैं । रामके राज्याभिषेककी तैयारी होती है । केकया अपने पुत्र भरतको राज्य दिलाना चाहती है । दशरथ वचनबद्ध होनेसे विवश हो जाते हैं । जब रामको पता चलता है तब वे वहीं ही समतासे वनके लिए रवाना हो जाते हैं । 'राज्यके अधिकारी पिता हैं, हमें उनकी आज्ञा पालन करनी चाहिए' यह विचारकर रामके हृदयमें कुछ भी उथल-पुथल नहीं होती है । यद्यपि लक्ष्मणके हृदयमें क्रान्तिके कण उत्पन्न होते हैं कि पिताजी एक स्त्री के वश हो अन्याय करने जा रहे हैं पर रामकी शान्ति देख चुप रह जाते | अभिषेकके लिए जब राम बुलाये जाते हैं तब उनके मुखपर प्रसन्नता के चिह्न प्रकट नहीं होते और जब वन जानेका आदेश पाते हैं तब विषादकी रेखा नहीं खिचती । राम सीता और लक्ष्मणके साथ वनको जाते हैं पर रामके हृदय में भरतके प्रति रंचमात्र भी विद्वेष पैदा नहीं होता । राजा अमितवीर्य भरत के विरुद्ध अभियान करता है, जब रामको इस बातका पता चलता है तब वे गुप्तरूपसे भरतकी रक्षा करनेका प्रयत्न करते हैं । उस समय वे लक्ष्मण, सीता तथा लक्ष्मणके सालोंके सामने एक लम्बा व्याख्यान देकर प्रकट करते हैं कि जो रात्रिमें मेघ के समान छुपकर दूसरोंका भला करते हैं उनके समान कोई नहीं है । फलस्वरूप वे नर्तकी के रूप में अमितवीर्यकी सभा में जाकर उसे प्रथम अपनी कलासे मोहित करते हैं और फिर परास्त । कपिल ब्राह्मणकी यज्ञशाला में थके-माँदे राम विश्राम करना चाहते हैं पर ब्राह्मण इतनी उग्रतासे पेश आता है कि वे सीधे वनके लिए रवाना हो जाते हैं, यद्यपि लक्ष्मण रोष में आकर कपिलको पछाड़ना चाहते हैं पर रामकी गम्भीरता में कोई न्यूनता दृष्टिगोचर नहीं होती । वे लक्ष्मणको बड़े सुन्दर ढंगसे समझाते हैं । यक्षनिर्मित रामनगरी में रामका रहना और उनके द्वारा उसी कपिल ब्राह्मणका उद्धार होना सुदामा चरितकी स्मृति दिलाता है । सीताके हरण के बाद यद्यपि राममें कुछ विह्वलता आती है फिर भी वे बहुत राम-रावण युद्धके समय जब कुछ लोग रामसे आज्ञा चाहते हैं कि रावणकी बाधा दी जाये तब राम इस कृत्यको घृणित काम समझ कर मना करते हैं युद्धमें विजय होती है। राम कहते हैं कि भाई ! रावणसे वैर तो मरणान्त ही था अब बैर किस बातका ? ऐसा कहकर वे उसका अन्तिम संस्कार करते हैं, सभी को समझाते हैं । 'ईदृशी भवितव्यता' कहकर वे सबको शान्त करते हैं । राज्यभार सँभालते हैं । लोकापवादके भयसे सीताका परित्याग होता है। राम पुटपाककी तरह भीतर ही भीतर दुःखी रहते हैं पर बाह्यमें सब काम यथावत् चलते रहते हैं । इस तरह हम देखते हैं कि राम स्वयं कष्ट उठाकर भी लोकमर्यादाकी रक्षा करना चाहते हैं इसलिए वे लोक में मर्यादा पुरुषोत्तम के नामसे प्रसिद्ध होते हैं | अग्निपरीक्षा के लिए सीताको आदेश देते हैं पर जब गगनचुम्बी ज्वालाओंकी राशि देखते हैं तब करुणाकुल हो लक्ष्मणसे कहते हैं- - लक्ष्मण ! कहीं सीता जल न जाये ? लक्ष्मणके मरणके बाद तो छह माह तक उनका स्नेह उन्हें मानो पागल ही बना देता है । अनन्तर वे सचेत हो दीक्षा धारण करते हैं । इस बीच में सीता तपश्चरण कर अच्युत स्वर्ग में उत्पन्न हो चुकती है । वह उन्हें चंचलचित्त करनेके लिए बहुत सँभले हुए दृष्टिगोचर होते हैं । बहुरूपिणी विद्या सिद्ध करनेमें । विभीषण- मन्दोदरी आदि अयोध्या वापस आनेपर Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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