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________________ पद्मपुराणे अनगारमहर्षीणां वेलामर्चन्ति ये जनाः । भोगोत्सवं प्रपद्यन्ते परं ते हरिषेणवत् ॥३३२॥ मुनिवेलाप्रतीक्ष्यत्वादुपार्य सुकृतं महत् । हरिषेणः परिप्राप्तो लक्ष्मीमत्यन्तमुन्नताम् ॥३३३॥ मुनेरन्तिकमासाद्य समाधानप्रचोदिताः । एकमतं जना ये तु कुर्वते शुद्धदर्शनाः ॥३३४॥ एकमक्तेन ते कालं नीत्वा पञ्चत्वमागताः । उत्पद्यन्ते विमानेषु रस्नभाचक्रवर्तिषु ॥३३५॥ नित्यालोकेषु ते तेषु विमानेषु सुचेतसः। रमन्ते सुचिरं कालमप्सरोमध्यवर्तिनः ॥३३६॥ हारिणः कटकाधारप्रेकोष्टाः कटिसूत्रिणः । मौलिमन्तो भवन्येते छत्रचामरिणोऽमराः ॥३३७॥ उत्तमव्रतसंसक्ता ये चाणुव्रतधारिणः । शरीरमधूवं ज्ञात्वा प्रशान्तहृदया जनाः ॥३३८॥ उपवासं चतुर्दश्यामष्टम्यां च सुमानसाः । सेवन्ते ते निबध्नन्ति चिरमायुस्त्रिविष्टपे ॥३३९॥ सौधर्मादिषु कल्पेषु यान्ति केचित्समुद्भवम् । अपरे स्वहमिन्द्रत्वं मुक्तिमन्ये विशुद्धितः ॥३४॥ विनयेन परिष्वक्ता गुणशीलसमन्विताः । तपःसंयोजितस्वान्ता यान्ति नाकमसंशयम् ॥३४१॥ तत्र कामेन भुक्त्वासौ मोगान्प्राप्तो मनुष्यताम् । भुक्ते राज्यं महज्जैन मतं च प्रतिपद्यते ॥३४२॥ जिनशासनमासाद्य स क्रमासाधुचेष्टितः । सर्वकर्मविमुक्तानामालयं प्रतिपद्यते ॥३४३॥ स्तुत्वा कालत्रये यस्तु नमस्यति जिनं त्रिधा । शैलराजवदक्षोभ्यः कुतीर्थमतवायुभिः ॥३४४॥ womanamaAANANA ~ ~ वैराग्यको प्राप्त हो जिनेन्द्र-प्रतिपादित दीक्षाको धारण किया था ॥३३१।। जो मनुष्य अनगार महर्षियोंके कालकी प्रतीक्षा करते हैं वे हरिषेण चक्रवर्तीके समान उत्कृष्ट भोगोंको प्राप्त होते हैं ॥३३२।। हरिषेणने मुनिवेलामें मुनिके आगमनकी प्रतीक्षा कर बहुत भारी पुण्यका संचय किया था इसलिए वह अत्यन्त उन्नत लक्ष्मीको प्राप्त हुआ था ॥३३३॥ शुद्ध सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले जो मनुष्य ध्यानकी भावनासे प्रेरित हो मुनिके समीप जाकर एकभक्त करते हैं अर्थात् एक बार भोजन करनेका नियम लेते हैं और एक भक्तसे हो समय पूरा कर मृत्युको प्राप्त होते हैं वे रत्नोंको कान्तिसे जगमगाते हुए विमानोमें उत्पन्न होते हैं ॥३३४-३३५।। शुद्ध हृदयको धारण करनेवाले वे देव, निरन्तर प्रकाशित रहनेवाले उन विमानों अप्सराओंके बीच बैठकर चिरकाल तक क्रीडा करते हैं ॥३३६॥ जो उत्तम हार धारण किये हुए हैं, जिनकी कलाइयोंमें उत्तम कड़े सुशोभित हैं, जो कमरमें कटिसूत्र और शिरपर मुकुट धारण करते हैं, जिनके ऊपर छत्र फिरता है और पार्श्वमें चमर ढोले जाते हैं ऐसे देव, एक भक्त व्रतके प्रभावसे होते हैं ॥३३७॥ जो महाव्रत धारण करनेकी भावना रखते हुए वर्तमानमें अणुव्रत धारण करते हैं तथा शरीरको अनित्य समझकर जिनके हृदय अत्यन्त शान्त हो चुके हैं ऐसे जो मनुष्य हृदयपूर्वक अष्टमी और चतुर्दशीके दिन उपवास करते हैं वे स्वर्गकी दीर्घायुका बन्ध करते हैं ॥३३८-३३९|| उनमें से कोई तो सौधर्मादि स्वर्गों में जन्म लेते हैं, कोई अहमिन्द्र पद प्राप्त करते हैं और कोई विशुद्धताके कारण मोक्ष जाते हैं ॥३४०।। जो निरन्तर विनयसे युक्त रहते हैं, गुण और शीलवतसे सहित होते हैं तथा जिनका चित्त सदा तपमें लगा रहता है ऐसे मनुष्य निःसन्देह स्वर्ग जाते हैं वहाँ इच्छानुसार भोग भोगकर मनुष्य होते हैं, बड़े भारी राज्यका उपभोग करते हैं और जैनमतको प्राप्त होते हैं ॥३४१-३४२।। जैनमतको पाकर क्रम-क्रमसे मुनियोंका चरित्र धारण करते हैं और उसके प्रभावसे सर्व कर्मरहित सिद्धोंका निकेतन प्राप्त कर लेते हैं ॥३४३॥ ___ जो प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और सायंकाल इन तीनों कालोंमें मन, वचन, कायसे स्तुति कर जिन देवको नमस्कार करता है अर्थात् त्रिकाल वन्दनाका नियम लेता है वह सुमेरुपर्वतके १. रमन्ते मध्यवतिनः म.। २. कटकाधाराः प्रकोष्ठाः म.। ३. ते न विघ्नन्ति ख. । तेन बध्नन्ति म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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