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________________ चतुर्दशं पर्व ३२९ उपाय केचिदज्ञात्वा धर्माख्यं सखसंततेः । मुढा तस्य समारम्भे न यतन्तेऽसधारिणः ॥३१९॥ पापकर्मवशात्मानः केचिच्छ्रस्वापि मानवाः । शर्मोपायं न सेवन्ते धर्म दुष्कृततत्पराः ॥३२०॥ उपशान्ति गते केचित्सच्चेष्टारोधिकर्मणि । अभिगम्य गुरुं धर्म पृच्छन्त्युद्यतचेतसः ॥३२१॥ उपशान्तेरशुद्धस्य कर्मणस्तद्गुरोर्वचः । अर्थवज्जायते तेषु श्रेष्ठानुष्ठानकारिषु ॥३२२॥ इमं ये नियमं प्राज्ञाः कुर्वते मुक्तदुष्कृताः । एके भवन्ति ते नाके द्वितीया वा महागुणाः ॥३२३॥ समयं येऽनगाराणां भुञ्जतेऽतीत्य भक्तितः । तेषां स्वर्गे सुखप्रेक्षामाकाङ्क्षन्ति सुराः सदा ॥३२४॥ इन्द्रत्वं देवसङ्घानां ते प्रयान्ति सुतेजसः । जनाः सामानिकत्वं वा संपादितयथेप्सिताः ॥३२५॥ न्यग्रोधस्य यथा स्वल्पं बीजमुच्चैस्तरुमवेत् । तपोऽल्पमपि तद्वत्स्यान्महाभोगफलावहम् ॥३२६॥ समः कुबेरकान्तस्य नेत्रबन्धनविग्रहः । धर्मसक्तमतिनित्यं जायते पूर्वधर्मतः ॥३२७॥ मुनिवेलावतो दत्वा मुनेमिक्षा समागतः । रत्नवृष्टिं सहस्राख्यः कुबेरदयितोऽभवत् ॥३२८॥ महीमण्डलविख्यातो नामोदारपराक्रमः । धनेन महता युक्तो भृत्यमण्डलमध्यगः ॥३२९॥ पौर्णमास्यां यथा चन्द्रः कान्तदर्शनविग्रहः । भुञ्जानः परमं भोगं सर्वशास्त्रार्थकोविदः ॥३३०॥ पूर्वधर्मानुभावेन परं निर्वेदमागतः । अमीयाय महादीक्षा जिनेन्द्रमुखनिर्गताम् ॥३३१॥ और नाना अलंकार धारण करनेवाली दासियाँ पुण्यके फलस्वरूप प्राप्त होती हैं ॥३१५-३१८|| कितने ही मूर्ख प्राणी ऐसे हैं कि जो सुख-समूहकी प्राप्तिका कारण धर्म है उसे जानते ही नहीं हैं अतः वे उसके साधनके लिए प्रयत्न ही नहीं करते ॥३१९।। और जिनकी आत्मा पाप कर्मके वशीभूत है तथा जो पाप कर्मों में निरन्तर तत्पर रहते हैं ऐसे भी कितने ही लोग हैं कि जो धर्मको सुख प्राप्तिका साधन सुनकर भी उसका सेवन नहीं करते ॥३२०।। उत्तम कार्योंके बाधक पापकर्मके उपशान्त हो जानेपर कुछ ही जीव ऐसे होते हैं कि जो उत्सुक चित्त हो गुरुके समीप जाकर धर्मका स्वरूप पूछते हैं ॥३२१॥ तथा पाप कर्मके उपशान्त होनेसे यदि वे जीव उत्तम आचरण करने लगते हैं तो उनमें सद्गुरुके वचन सार्थक हो जाते हैं ।।३२२।। जो बुद्धिमान् मनुष्य पापका परित्याग कर इस नियमका पालन करते हैं वे स्वर्गमें महागुणोंके धारक होते हुए प्रथम अथवा द्वितीय होते हैं ॥३२३॥ जो मनुष्य भक्ति-पूर्वक मुनियोंके भोजन करनेका समय बिताकर बादमें भोजन करते हैं स्वर्गमें देव लोग सदा उन्हें सुखी देखनेकी इच्छा करते हैं ।।३२४॥ उत्तम तेजको धारण करनेवाले वे पुरुष देवोंके समूहके इन्द्र होते हैं अथवा मनचाहे भोग प्राप्त करनेवाले सामानिक पदको प्राप्त करते हैं ॥३२५॥ जिस प्रकार वट वृक्षका छोटा-सा बीज आगे चलकर ऊंचा वृक्ष हो जाता है उसी प्रकार छोटा-सा तप भी आगे चलकर महाभोग रूपी फलको धारण करता है ।।३२६।। जिसकी बुद्धि निरन्तर धर्ममें आसक्त रहती है ऐसा मनुष्य अपने पूर्वाचरित धर्मके प्रभावसे कुबेरकान्तके समान नेत्रोंको आकर्षित करनेवाले सुन्दर शरीरका धारक होता है ॥३२७|| एक सहस्रभट नामका पुरुष था। उसने मुनिवेलाव्रत धारण किया था अर्थात् मुनियोंके भोजन करनेका समय बीत जानेके बाद ही वह भोजन करता था। एक बार उसने मुनिके लिए आहार दिया। उसके प्रभावसे उसके घर रत्नवृष्टि हुई और वह मरकर परभवमें कुबेरकान्त सेठ हुआ ॥३२८॥ जो कि भूमण्डलमें प्रसिद्ध, उत्कृष्ट पराक्रमी, महाधनसे युक्त और सेवक समूहके मध्यमें स्थित रहनेवाला था ॥३२९।। पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान उसका शरीर अत्यन्त सुन्दर था और वह उत्कृष्ट भोगोंको भोगता हुआ समस्त शास्त्रोंका अर्थ जाननेमें निपुण था॥३३०।। पूर्व धर्मके प्रभावसे ही उसने परम १. रधर्मस्य म.। २. अद्वितीयाः । ३. धर्मे सक्तमति ख.। धर्मशक्तमति म.। ४. भवेत् म., सहस्रभटो मनेनप्रभावात कुबेरकान्तनामा श्रेष्ठी अभवत् । ५. चन्द्रकान्तदर्शन म.। चन्द्र : कान्तिदर्शन ख..ब.। ६. सुख म.। ४२ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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