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________________ चतुर्दशं पर्व ३२५ मनुष्यत्वं समासाद्य दुर्लभं तत्परायणः । महेशानस्य कर्तव्यं जिनस्य समुपासनम् ॥२६॥ यस्य काञ्चननिर्माणा योजनं जायते मही । आसने जायते देवतिर्यग्मानुषसेविता ॥२६॥ प्रातिहार्याणि यस्याष्टौ चतुस्त्रिंशन्महाद्भुतोः । सहस्रभास्कराकारं रूपं लोचनसौख्यदम् ॥२६२॥ मव्यः प्रेणाममेतस्य यः करोति विचक्षणः । समुत्तरति कालेन स स्तोकेन भवार्णवम् ॥२६३॥ उपायमेतमुज्झित्वा शान्तिप्राप्तौ शरीरिणाम् । नान्यः कश्चिदुपायोऽस्ति तस्मात्सेव्यः स यत्नतः ॥२६॥ मार्गा गोदण्डकाकाराः सन्त्यन्येऽपि सहस्रशः । कुतीर्थसंश्रिता येषु विमुह्यन्ति प्रमादिनः ॥२६५॥ न सम्यक्करुणा तेषु मधुमासादिसेवनात् । जैने तु कणिकाप्यस्ति न दोषस्य प्ररूपणे ॥२६६॥ त्याज्यमेतस्परं लोके यत्प्रपोड्य दिवा क्षुधा । आत्मानं रजनीभुक्त्या गमयत्यर्जितं शुभम् ॥२६७॥ निशिभुक्तिरधर्मो यैर्धर्मत्वेन प्रकल्पितः । पापकर्मकठोराणां तेषां दुःखं प्रबोधनम् ॥२६८॥ दर्शनागोचरीभूते सूर्ये परमलालसः । भुङ्क्ते पापमना जन्तुर्दुर्गतिं नावबुध्यते ॥२६९॥ मक्षिकाकोटकेशादि भक्ष्यते पापजन्तुना । तमःपटलसंछन्नचक्षुषा पापबुद्धिना ॥२७॥ डाकिनीप्रेतभूतादिकुत्सितप्राणिभिः समम् । भुक्तं तेन मवेद्येन क्रियते रात्रिभोजनम् ॥२७१॥ सारमेयाखुमार्जारप्रभृतिप्राणिमिः समम् । मांसाहारैर्मवेद्भुक्तं तेन यो निशि वल्मते ॥२७२॥ अथवा किं प्रपञ्चेन पुलाकेनेह माष्यते ।क्षपायामश्नता सर्व भवेदशुचि मक्षितम् ॥२७३॥ मध्यमें बैठकर अनेक पल्योपमकाल व्यतीत करता है ।।२५९।। इसलिए दुर्लभ मनुष्य पर्याय पाकर धर्ममें तत्पर रहनेवाले मनुष्योंको महाप्रभु श्रीजिनेन्द्र देवकी उपासना करनी चाहिए ॥२६०।। जिनके आसनस्थ होनेपर देव, तिर्यंच और मनुष्योंसे सेवित एक योजनकी पृथ्वी स्वर्णमयी हो जाती है ॥२६१।। जिनके आठ प्रातिहार्य और चौंतीस महाअतिशय प्रकट होते हैं। तथा जिनका रूप हजार सूर्योंके समान देदीप्यमान एवं नेत्रोंको सुख देनेवाला होता है ।।२६२।। ऐसे महाप्रभु जिनेन्द्र भगवान्को जो बुद्धिमान् भव्य प्रणाम करता है वह थोड़े ही समयमें संसार-सागरसे पार हो जाता है ।।२६३॥ जीवोंको शान्ति प्राप्त करनेके लिए यह उपाय छोड़कर और दूसरा कोई उपाय नहीं है इसलिए यत्नपूर्वक इसकी सेवा करनी चाहिए ॥२६४॥ इनके सिवाय कुतोथियोंसे सेवित गोदण्डकके समान जो अन्य हजारों मार्ग हैं उनमें प्रमादी जीव मोहित हो रहे हैं-यथार्थ मार्ग भूल रहे हैं ।।२६५॥ उन मार्गाभासोंमें समीचीन दया तो नाममात्रको नहीं है क्योंकि मधु-मांसादिका सेवन खुलेआम होता है पर जिनेन्द्रदेवकी प्ररूपणामें दोष की कणिका भी दृष्टिगत नहीं होती ॥२६६॥ लोकमें यह कार्य तो बिलकुल ही त्यागने योग्य है कि दिनभर तो भूखसे अपनी आत्माको पीड़ा पहुंचाते हैं और रात्रिको भोजन कर संचित पुण्यको तत्काल नष्ट कर देते हैं ॥२६७।। रात्रिमें भोजन करना अधर्म है फिर भी इसे जिन लोगोंने धर्म मान रखा है, उनके हृदय पापकर्मसे अत्यन्त कठोर हैं उनका समझना कठिन है ॥२६८॥ सूर्यके अदृश हो जानेपर जो लम्पटी-पापी मनुष्य भोजन करता है वह दुर्गतिको नहीं समझता ॥२६९॥ जिसके नेत्र अन्धकारके पटलसे आच्छादित हैं और बुद्धि पापसे लिप्त है ऐसे पापी प्राणी रातके समय मक्खी, कीड़े तथा बाल आदि हानिकारक पदार्थ खा जाते हैं ।।२७०॥ जो रात्रिमें भोजन करता है वह डाकिनी, प्रेत, भूत आदि नीच प्राणियोंके साथ भोजन करता है ॥२७१॥ जो रात्रिमें भोजन करता है वह कुत्ते, चूहे, बिल्लो आदि मांसाहारी जीवोंके साथ भोजन करता है ॥२७२।। अथवा अधिक कहनेसे क्या ? १. महातिशयाः। महाभुतं म.। २. प्रणामं भावेन ब.। ३. मेन -ब. । ४. संचिता म.। ५. दुःखप्रबोधनम् भ. । ६. प्रबन्धनम् क. । ७. दुर्गतिनविबुध्यते ख.। ८. भक्तं म. । ९. भुङ्क्ते । वल्भ भोजने । वल्गते म.। १०. भाव्यते म., क. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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