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________________ ३२४ पद्मपुराणे तत्र स्वर्गे सहस्राणि समानां दश कीर्तितम् । भुञ्जानस्य जनस्योद्योगं चित्तोपपादितम् ॥ २४६ ॥ श्रद्दधानो मतं जैनं यः करोति पुरोदितम् । पल्यैस्तस्योपमानो यः कालः स्वर्गे महात्मनः ॥ २४७॥ च्युत्वा तत्र मनुष्यत्वे लभते भोगमुत्तमम् । यथोपवनया लब्धं तापसान्वयजातया ॥२४८|| दुःखिन्युपवनाऽबन्धुर्व दराद्युपजीविनी । आदरादीक्षिता राज्ञा मुहूर्तव्रतसंभवात् ॥ २४९ || कुमारी व्रतकस्यान्ते परया द्रव्यसंपदा । योजिता सुतरां जाता धर्मसंविग्नमानसा ||२५० ॥ जिनेन्द्रवचनं यस्तु कुरुतेऽन्तरवर्जितम् । अनन्तरमसौ सौख्यं परलोके गतोऽश्नुते ।। २५१|| मुहूर्तद्वितयं यस्तु न भुङ्क्ते प्रतिवासरम् । षष्ठोपवासिता तस्य जन्तोर्मासेन जायते ॥ २५२ ॥ मुहूर्तत्रिंशतं कृत्वा काले यावति तावति । आहारवर्जनं जन्तुरुपवासफलं भजेत् ॥ २५३ ॥ मुहूर्त योजनं कार्यमेवमेवाष्टमादिषु । अधिकं तु फलं वाच्यं हेतुवृद्ध्यनुरूपतः ॥२५४॥ अवाप्यास्य फलं नाके नियमस्य शरीरिणः । मनुष्यतां समासाद्य जायन्तेऽद्भुतचेष्टिताः || २५५ ।। लावण्यपङ्कलिप्तानां हारिविभ्रमकारिणाम् । भवन्ति कुलदाराणां पतयो धर्मशेषतः ।। २५६ ।। स्त्रियोऽपि स्वर्गतश्च्युत्वा मनुष्यमवमागताः । महापुरुषसंसेव्या पान्ति लक्ष्मीसमानताम् || २५७ ।। आदित्येऽस्तमनुप्राप्ते कुरुते योऽन्नवर्जनम् । भवेदभ्युदयोऽस्यापि सम्यग्दृष्टेर्विशेषतः ॥ २५८ ॥ अप्सरोमण्डलान्तःस्थो विमाने रत्नभासुरे । बहुपल्योपमं कालं धर्मेणानेन तिष्ठति ॥ २५९ ॥ उपवास के समान फल प्राप्त होता है || २४५ ॥ संकल्प मात्रसे प्राप्त होनेवाले उत्कृष्ट भोगोंका उपभोग करते हुए इस जीवको कमसे कम दसहजार वर्षं तो लगते ही हैं || २४६ || और जो जैनधर्मकी श्रद्धा करता हुआ पूर्वप्रतिपादित व्रतादि धारण करता है उस महात्माका स्वर्गमें कमसे कम एक पत्य प्रमाण काल बीतता है || २४७|| वहाँसे च्युत होकर वह मनुष्य गतिमें उस प्रकार उत्तम भोग प्राप्त करता है जिस प्रकार तापसवंश में उत्पन्न हुई उपवनाने प्राप्त किये थे ॥ २४८ ॥ एक उपवना नामकी दुःखिनी कन्या थी जो भाई-बन्धुओंसे रहित थी और बेर आदि खाकर अपनी जीविका करती थी। एक बार उसने मुहूर्त-भर के लिए आहारका त्याग किया। उस व्रतके प्रभावसे राजाने उसका बड़ा आदर किया तथा व्रतके अनन्तर उसे उत्कृष्ट धनसम्पदासे युक्त किया। इस घटना से उसका मन धर्म में अत्यन्त उत्साहित हो गया ।। २४९ - २५०॥ जो मनुष्य निरन्तर जिनेन्द्र भगवान्‌ के वचनों का पालन करता है वह परलोकमें निर्बाध सुखका उपभोग करता है ||२५१॥ जो प्रतिदिन दो मुहूर्तके लिए आहारका त्याग करता है उसे महीने में दो उपवासका फल प्राप्त होता है ॥ २५२ ॥ इस प्रकार जो एक-एक मुहूतं बढ़ाता हुआ तीस मुहूर्त तक के लिए आहारका त्याग करता है उसे तीन-चार आदि उपवासोंका फल प्राप्त होता ।। २५३|| तेला आदि उपवासोंमें भी इसी तरह मुहूर्तकी योजना कर लेनी चाहिए । जो अधिक काल के लिए त्याग होता है उसका कारणके अनुसार अधिक फल कहना चाहिए ॥ २५४ ॥ प्राणी स्वर्ग में इस नियमका फल प्राप्त कर मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं और वहाँ अद्भुत चेष्टाओं के धारक होते हैं ॥२५५॥ स्वर्ग में फल भोगनेसे जो पुण्य शेष बचता है उसके फलस्वरूप वे कुलवती स्त्रियों के पति होते हैं । जिनका कि शरीर लावण्यरूपी पंकसे लिप्त रहता है तथा जो मनको हरण करनेवाले हाव-भाव विभ्रम किया करती हैं ॥ २५६ ॥ नियमवाली स्त्रियाँ भी स्वर्गसे चयकर मनुष्य भवमें आती हैं और महापुरुषोंके द्वारा सेवनीय होती हुई लक्ष्मीको समानता प्राप्त करती हैं ॥ २५७॥ जो सूर्यास्त होनेपर अन्नका त्याग करता है उस सम्यग्दृष्टिको भी विशेष अभ्युदयकी प्राप्ति होती है ।। २५८ ॥ यह जीव इस धर्मके कारण रत्नोंसे जगमगाते विमानोंमें अप्सराओंके १. जनस्योध्वं भोगं म । जनस्योर्द्ध ब. क. । २. इच्छामात्रेण प्राप्तम् । ३. तस्योपमानीयः मः । ४. -ऽस्तमनप्राप्ते म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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