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________________ चतुर्दशं पर्व ३२३ यथा तारयितं शक्ता न शिला सलिले शिलाम् । तथा परिग्रहासक्ताः कुतीर्थ्याः शरणागतान् ॥२३२॥ तपोनिर्दग्धपापा ये लघवस्तत्त्ववेदिनः । त एव तारणे शक्ता जनानामुपदेशतः ॥२३३॥ संसारसागरे भीमे रत्नद्वीपोऽयमुत्तमः । यदेतन्मानुषं क्षेत्रं तद्धि दुःखेन लभ्यते ॥२३४॥ तस्मिमियमरनानि गृहीतव्यानि धीमता । अवश्यं देहमुत्सृज्य कर्तव्यो भवसंक्रमः ॥२३५॥ अतो यथात्र सूत्रार्थ कश्चित् संचूर्णयेन्मणीन् । विषयार्थ तथा धर्मरत्नानां चूर्णको जनः ॥२३६॥ अनित्यत्वं शरीरादेरभावं शरणस्य च । अशुचित्वं तथान्यत्वमात्मनो देहपारात् ॥२३७॥ एकत्वमथ संसारो लोकस्य च विचित्रता । आस्रवः संवरः पूर्वकर्मणां निर्जरा तथा ॥२३८॥ बोधिदुर्लमताधर्मस्वाख्यातत्त्वं जिनेश्वरैः । द्वादर्शवमनुप्रेक्षाः कर्तव्या हृदये सदा ॥२३९।। आत्मनः शक्तियोगेन धर्म यो यादर्श भजेत् । स तस्य तादृशं भुक्ते फलं देवादिभूमिषु ॥२४॥ एवं वदनसौ पृष्टो भानुकर्णन केवली। सभेदं नियम नाथ ज्ञातुमिच्छामि सांप्रतम् ॥२४॥ ततो जगाद भगवान्भानुकर्णावधारय । नियमश्च तपश्चेति द्वयमेतन मिद्यते ॥२४२॥ तेन युक्तो जनः शक्त्या तपस्वीति निगद्यते । तत्र सर्वप्रयत्नेन मतिः कार्या सुमेधसा ।।२४३॥ स्वल्पं स्वल्पमपि प्राज्ञः कर्तव्य सकृतार्जनम् । पतद्भिर्बिन्दुभिर्जाता महानद्यः समुद्रगाः ।।२४४॥ अह्नो मुहूर्तमानं यः कुरुते भुक्तिवर्जनम् । फलं तस्योपवासेन समं मासेन जायते ॥२४५॥ आवर्तोसे युक्त संसाररूपी प्रवाहमें चक्कर काटते हैं, वहाँ उनके भक्तोंकी कथा ही क्या है ? ॥२३१।। जिस प्रकार पानीमें पड़ी शिलाको शिला ही तारने में समर्थ नहीं है उसी प्रकार परिग्रही साधु शरणागत परिग्रही भक्तोंको तारने में समर्थ नहीं हैं ॥२३२॥ जो तपके द्वारा पापोंको जलाकर हलके हो गये हैं ऐसे तत्त्वज्ञ मनुष्य ही अपने उपदेशसे दूसरोंको तारने में समर्थ होते हैं ॥२३३।। जो यह मनुष्य क्षेत्र है सो भयंकर संसार-सागरमें मानो उत्तम रत्नद्वीप है। इसकी प्राप्ति बड़े दुःखसे होती है ।।२३४।। इस रत्नद्वीपमें आकर बुद्धिमान् मनुष्यको अवश्य ही नियमरूपी रत्न ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वर्तमान शरीर छोड़कर पर्यायान्तरमें अवश्य ही जाना होगा ।।२३५।। इस संसारमें जो विषयोंके लिए धर्मरूपी रत्नोंका चूर्ण करता है वह वैसा ही है जैसा कि कोई सूत प्राप्त करनेके लिए मणियोंका चूर्ण करता है ॥२३६।। शरीरादि अनित्य है, कोई किसीका शरण नहीं है, शरीर अशुचि है, शरीररूपी पिंजड़ेसे आत्मा पृथक् है, यह अकेला ही सुख-दुःख भोगता है, संसारके स्वरूपका चिन्तवन करना, लोक की विचित्रताका विचार करना, आस्रवके दुर्गुणोंका ध्यान करना, संवरकी महिमाका चिन्तवन करना, पूर्वबद्ध कर्मोंकी निर्जराका उपाय सोचना, बोधि अर्थात् रत्नत्रयकी दुर्लभताका विचार करना और धर्मका माहात्म्य सोचना-जिनेन्द्र भगवान्ने ये बारह भावनाएँ कही हैं सो इन्हें सदा हृदयमें धारण करना चाहिए ॥२३७-२३९।। जो अपनी शक्तिके अनुसार जैसे धर्मका सेवन करता है वह देवादि गतियोंमें उसका वैसा ही फल भोगता है ।।२४०॥ इस प्रकार उपदेश देते हुए अनन्तबल केवलोसे भानुकर्णने पूछा कि हे नाथ ! मैं अब नियम तथा उसके भेदोंको जानना चाहता हूँ ॥२४१।। इसके उत्तरमें भगवान्ने कहा कि हे भानुकर्ण ! ध्यान देकर अवधारण करो। नियम और तप ये दो पदार्थ पृथक्-पृथक् नहीं हैं ।।२४२।। जो मनुष्य नियमसे युक्त है वह शक्तिके अनुसार तपस्वी कहलाता है इसलिए बुद्धिमान् मनुष्यको सब प्रकारसे नियम अथवा तपमें प्रवृत्त रहना चाहिए ॥२४३।। बुद्धिमान् मनुष्योंको थोड़ा-थोड़ा भी पुण्यका संचय करना चाहिए क्योंकि एक-एक बूंदके पड़नेसे समुद्र तक बहनेवाली बड़ी-बड़ी नदियाँ बन जाती हैं ।।२४४।। जो दिनमें एक मुहर्तके लिए भी भोजनका त्याग करता है उसे एक महीने में १. स्तोककर्माणः । २. शरीरम् । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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