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________________ चतुर्दशं पवं 1 हन्ति तापं सहस्रांशोस्तुषारत्वमुप्रभोः । करोति पूरणं वृष्ट्या सर्वस्य जगतः क्षणात् ॥ १२१ ॥ मस्मतां नयते लोकमाशीविषवदीक्षणात् । कुरुते मन्दरोत्क्षेपं विक्षेपणमुदन्वताम् ॥ १२२ ॥ ज्योतिश्चक्रं समुद्धर्तुभिन्द्ररुद्रादिसाध्वसम् । रत्नकाञ्चनवर्षं च प्रावसंघातसर्जनम् ॥ १२३ ॥ व्याधीनामतितीव्राणां शमनं पादपांसुनो। नृणामद्भुतहेतूनां विभवानां समुद्भवम् ॥ १२४ ॥ जीवः करोति धर्मेण तथान्यदपि दुष्करम् । नैव किंचिदसाध्यत्वं धर्मस्य प्रतिपद्यते ॥ १२५ ॥ धर्मेण मरणं प्राप्ता ज्योतिश्चक्रतिरस्कृतिम् । कृत्वा कल्पान्प्रपद्यन्ते सौधर्मादीन् गुणालयान् ॥ १२६॥ सामानिकाः सुराः केचिद्भवन्त्यन्ये सुराधिपाः । अहमिन्द्रास्तथान्ये च कृत्वा धर्मस्य संग्रहम् ॥१२७॥ स्फटिकवैडूर्य स्तम्भसंभारनिर्मितान् । तद्भित्तिमासुराँस्तुङ्गान् प्रासादान्बहुभूमिकान् ॥ १२८ ॥ अम्भोजदधिमध्वादिविचित्रमणिकुट्टिमान् । मुक्ताकलापसंयुक्तान् वातायनविराजितान् ॥ १२९ ॥ रुरुभिश्चमरैः सिंहैर्गजैरन्यैश्च चारुभिः । रूपैर्निचितपाइर्वाभिर्वेदिकाभिरलंकृतान् ॥१३०॥ चन्द्रशालादिभिर्युक्तान् ध्वजमालाविभूषितान् । सोपाश्रयमनोहारिशयनासनसंगतान् ॥१३१॥ आतोयवर संपूर्णानिच्छासंचारकारिणः । युक्तान्सत्परिवर्गेण पुण्डरीकादिलक्षितान् ॥१३२॥ विमानप्रभृतीन् जीवा निलयान् धर्मकारिणः । प्रपद्यन्तेऽर्कशीतांशुदीप्तिकान्त्य भिभाविनः ॥ १३३॥ सुखनिद्राक्षये यद्वद्विबुद्धं विमलेन्द्रियम् । अचिरोदिततिग्मांशुदीसं कान्त्या समं विधोः ॥ १३४ ॥ लोकको एक ग्रास बना सकता है। अणिमा, महिमा आदि आठ प्रकारके ऐश्वर्यं तथा अनेक दुर्लभ योग भी यह धर्मंके प्रभावसे प्राप्त करता है || १२० || यह जीव धर्मके प्रभावसे सूर्यके सन्तापChat और चन्द्रमाकी शीतलताको नष्ट कर सकता है तथा वृष्टिके द्वारा समस्त संसारको क्षणभर में भर सकता है || १२१ ॥ यह धर्मके प्रभावसे आशीविष साँपके समान दृष्टिमात्र से लोकको भस्म कर सकता है, मेरु पर्वतको उठा सकता है और समुद्रको बिखेर सकता है ॥ १२२ ॥ धर्मके ही प्रभावसे ज्योतिश्चक्रको उठा सकता है, इन्द्र, रुद्र आदि देवोंको भयभीत कर सकता है, रत्न और सुवर्णकी वर्षा कर सकता है तथा पर्वतोंके समूहकी सृष्टि कर सकता है ॥ १२३ ॥ धर्मके ही प्रभावसे अत्यन्त भयंकर बीमारियोंकी शान्ति अपने पैरकी धूलिसे कर सकता है तथा मनुष्योंको अन्य अनेक आश्चर्यकारक वैभवकी प्राप्ति करा सकता है || १२४ || जीव धर्मके प्रभाव से और भी कितने ही कठिन कार्य कर सकता है । यथार्थ में धर्म के लिए कोई भी कार्य असाध्य नहीं है || १२५ || जो जीव धर्मपूर्वक मरण करते हैं वे ज्योतिश्चक्रको उल्लंघन कर गुणोंके निवासभूत सौधर्मादि स्वर्गो में उत्पन्न होते हैं ॥ १२६ ॥ धर्मका उपार्जन कर कितने ही सामानिक देव होते हैं, कितने ही इन्द्र होते हैं और कितने ही अहमिन्द्र बनते हैं || १२७|| धर्मके प्रभावसे जीव उन महलोंमें उत्पन्न होते हैं जो कि स्वर्ण, स्फटिक और वैडूर्यं मणिमय खम्भोंके समूहसे निर्मित होते हैं जिनकी स्वर्णादिनिर्मित दीवालें सदा देदीप्यमान रहती हैं, जो अत्यन्त ऊँचे और अनेक भूमियों (खण्डों) से युक्त होते हैं | || १२८|| जिनके फर्श पद्मराग, दधिराग तथा मधुराग आदि विचित्र-विचित्र मणियोंसे बने होते. हैं, जिनमें मोतियों की मालाएँ लटकती रहती हैं, जो झरोखोंसे सुशोभित होते हैं || १२९ || जिनके किनारोंपर हरिण, चमरी गाय, सिंह, हाथी तथा अन्यान्य जीवोंके सुन्दर-सुन्दर चित्र चित्रित रहते हैं ऐसी वेदिकाओंसे जो अलंकृत होते हैं || १३० ॥ जो चन्द्रशाला आदिसे सहित होते हैं, ध्वजाओं और मालाओंसे अलंकृत रहते हैं तथा जिनकी कक्षाओंमें मनोहारी शय्याएँ और आसन बिछे रहते हैं ॥१३१॥ धर्मं धारण करनेवाले लोग ऐसे विमान आदि स्थानोंमें उत्पन्न होते हैं जो वादित्र आदि संगीत के साधनोंसे युक्त रहते हैं, इच्छानुसार जिनमें गमन होता है, जो उत्तम परिकरसे सहित होते हैं, कमल आदि प्रसाधन सामग्रीसे युक्त रहते हैं और अपनी प्रभासे सूर्यकी दीप्ति और चन्द्रमाको कान्तिको तिरस्कृत करते रहते हैं ।। १३२ - १३३ ॥ धर्मके प्रभावसे प्राणियों को १. चन्द्रस्य । २. चरणरजसा । ३. ध्वजामाला म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only ३१५ www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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