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________________ ३१४ पपपुराणे जिनैरभिहितं धर्म कथयामि समासतः । कांश्चित्तत्फलभेदांश्च शृणुतैकाग्रमानसाः ॥१०६॥ हिंसातोऽलीकतः स्तेयानधनाद व्यसंगमात । तितितायि विशेष र द द्रव्यसंगमात् । विरतिव्रतमुद्दिष्टं विधेयं तस्य धारणम् ॥१०७।। ईर्यावाक्यैषणादाननिक्षेपोत्सर्गरूपिका । समितिः पालनं तस्याः कार्य यत्नेन साधुना ।।१०।। वाङमनःकायवृत्तीनामभावो 'म्रदिमाथवा । गुप्तिराचरणं तस्यां विधेयं परमादरात् ॥१०९।। क्रोधो मानस्तथा माया लोभश्चेति महाद्विषः । केषाया यैरयं लोकः संसारे परिवर्यते ।।११०॥ क्षमातो मृदुतासंगादजुत्वाद्धतियोगतः । विधेयो निग्रहस्तेषां सूत्रनिर्दिष्टकारिणा ॥१११॥ धर्मसंज्ञमिदं सर्व व्रतादि परिकीर्तितम् । त्यागश्चोदितो धर्मो विशेषोऽस्य निवेदितः ।।११२॥ रसनस्पर्शन घ्राणचक्षुःश्रोत्राभिधानतः । प्रसिद्धानीन्द्रियाण्येषां निर्जयो धर्म उच्यते ॥११३॥ उपवासोऽवमौदर्य परिसंख्यानवृत्तिता । रसानां च परित्यागो विविक्तं शयनासनम् ॥११४।। कायक्लेश इति प्रोक्तं बाह्यं षोढा तपः स्थितम् । तपसोऽभ्यन्तरस्यैतद्वृत्तिस्थानीयमिप्यते ॥११५।। प्रायश्चित्तं विनीतिश्च वैयावृत्यकृतिस्तथा । स्वाध्यायेन च संबन्धो व्युत्सगो ध्यानमुत्तमम् ।।११६॥ एतदाभ्यन्तरं षोढा तपश्चरणमिष्यते । तपः समस्तमप्येतद्धर्म इत्यभिधीयते ॥११७।। धर्मणानेन कुर्वन्ति भव्याः कर्मवियोजनम् । कर्म चाद्भुतमत्यन्तव्यवस्थापरिवर्तनम् ।।११८॥ शक्नोति बाधितुं सर्वान्मानुषानमरांस्तथा । लोकाकाशं च संरोधं वपुषा विक्रियात्मना ।।११९॥ एकनासत्वमानेतुं त्रैलोक्यं च महाबलः । अष्टभेदमहैश्वर्यं योगं चाप्नोति दुर्लभम् ॥१२०॥ है और प्राप्ति सम्पर्कको कहते हैं, अतः धर्मको प्राप्तिको धर्मलाभ कहते हैं ॥१०५।। अब हम जिनभगवान्के द्वारा कहे हुए धर्मका संक्षेपसे निरूपण करते हैं। साथ ही उसके कुछ भेदों और उनके फलोंका भी निर्देश करेंगे सो तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥१०६।। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रहसे विरक्त होना सो व्रत कहलाता है। ऐसा व्रत अवश्य ॥१०७।। ईर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेपण और उत्सर्ग ये पाँच समितियाँ हैं । साधुको इनका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिए ॥१०८।। वचन, मन और कायकी प्रवृत्तिका सर्वथा अभाव हो जाना अथवा उसमें कोमलता आ जाना गुप्ति है। इसका आचरण बड़े आदरसे करना चाहिए ।।१०९।। क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार कषाय महाशत्रु हैं, इन्हींके द्वारा जीव संसारमें परिभ्रमण करता है ।।११०॥ आगमके अनुसार कार्य करनेवाले मनुष्यको क्षमासे क्रोधका, मृदुतासे मानका, सरलतासे मायाका और सन्तोषसे लोभका निग्रह करना चाहिए ॥१११।। अभी ऊपर जिन व्रत समिति आदिका वर्णन किया है वह सब धर्म कहलाता है। इसके सिवाय त्याग भी विशेषधर्म कहा गया है ॥११२॥ स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण ये पाँच इन्द्रियाँ प्रसिद्ध हैं। इनका जीतना धर्म कहलाता है ।।११३।। उपवास, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश ये छह बाह्यतप हैं। बाह्यतप अन्तरंग तपकी रक्षाके लिए वृति अर्थात् बाड़ीके समान हैं ॥११४-११५।। प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान ये छह आभ्यन्तर तप हैं। यह समस्त तप धर्म कहलाता है ।।११६-११७|| भव्य जीव इस धर्मके द्वारा कर्मोंका वियोजन अर्थात् विनाश तथा अनन्त व्यवसायोंको परिवर्तित करनेवाले अनेक आश्चर्यजनक कार्य करते हैं ॥११८॥ यह जीव धर्मके प्रभावसे ऐसा विक्रियात्मक शरीर प्राप्त करता है कि जिसके द्वारा समस्त मनुष्य और देवोंको बाधा देने तथा लोकाकाशको व्याप्त करने में समर्थ होता है ।।११९।। धर्मके प्रभावसे यह जीव इतना महाबलवान् हो जाता है कि तीनों १. -मभाव इति साथवा क., ख..ब.। २. कषायाद्यैरयं म. । ३. परिवर्तते म., ख.। ४. मदुतः संगादजुत्वाद्वेत्तियोगतः म.। ५. -भिधावतः म.। ६. बाह्यं तपोऽभ्यन्तरतपसो रक्षणाय वृतितुल्यमस्तीति भावः । ७. एतदभ्यन्तरे म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org :
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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