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________________ २९४ पद्मपुराणे दन्तिनौ दृष्टविस्पष्टतारकाक्रूरवीक्षणौ । चक्रतुः सुमहद्युद्धं स्तब्धको महाबलौ ॥३४५॥ तत उत्पत्य विन्यस्य पादमिन्द्रेभमूर्धनि । नितान्तं लाघवोपेतपादनिधूतसारथिः ॥३४६॥ बद्ध वांशुकेन देवेन्द्र मुहुराश्वासयन्विभुः । आरोपयद्यमध्वंसो निजं वाहनमूर्जितः ॥३४७॥ राक्षसाधिपपुत्रोऽपि गृहीत्वा वासवात्मजम् । समर्प्य किङ्करौघस्य सुरसैन्यस्य संमुखः ॥३४८॥ धावमानो जयोद्भूतमहोत्साहः परंतपः । उक्तो द्विषतपेनैवं मरुत्वमखविद्विषा ॥३४९॥ अलं वत्स ! प्रयत्नेन निवर्तस्व रणादरात् । शिरो गृहीतमेतस्याः सेनाया गिरिवासिनाम् ॥३५०॥ गृहीतेऽस्मिन् परिष्यन्दमत्र कः कुरुते परः । क्षदा जीवन्तु सामन्ता गच्छन्तु स्थानमीप्सितम् ॥३५१॥ तन्दुलेषु गृहीतेषु ननु शालिकलापतः । त्यागस्तुषपलालस्य क्रियते कारणाद् विना ॥३५२॥ इत्युक्तः समरोत्साहादिन्द्रजिद्विनिवर्तनम् । चक्रे चक्रेण महता नृपाणां बद्धमण्डलः ॥३५३॥ ततः सरबलं सर्व विशीर्ण क्षणमात्रतः । शारदानामिवाब्दानां वृन्दमत्यन्तमायतम् ॥३५४॥ सैन्येन दशवक्त्रस्य जयशब्दो महान् कृतः । पटुभिः पटलः शङ्खझी रैर्वन्दिना गणैः ॥३५५॥ शब्देन तेन विज्ञाय गृहीतममराधिपम् । सैन्यं राक्षसनाथस्य बभूवाकुलितोज्झितम् ॥३५६॥ ततः परमया युक्तो विभूत्या कैकसीसुतः । प्रतस्थे निवृतो लङ्कां साधनाच्छादिताम्बरः ॥३५७॥ आदित्यरथसंकाशैरथैर्ध्वजविराजितः । नानारत्नकरोदभूतसनासीरशरासनैः ॥३५८॥ हो ॥२४३।। जिनका शरीर अत्यन्त चंचल था तथा वेग भारी था ऐसे दोनों हाथी अपनी मोटी सूड़ोंको फैलाते, सिकोड़ते और ताड़ित कर रहे थे ॥३४४॥ साफ-साफ दिखनेवाली पुतलियोंसे जिनके नेत्र अत्यन्त क्रूर जान पड़ते थे, जिनके कान खड़े थे और जो महाबलसे युक्त थे ऐसे दोनों हाथियोंने बहुत भारी युद्ध किया ॥३४५।। तदनन्तर शक्तिशाली रावणने उछलकर अपना पैर इन्द्रके हाथोके मस्तकपर रखा और बड़ी शीघ्रतासे पैरकी ठोकर देकर सारथिको नीचे गिरा दिया। बार-बार आश्वासन देते हुए रावणने इन्द्रको वस्त्रसे कसकर बाँध अपने हाथीपर चढ़ा लिया ॥३४६-३४७।। उधर इन्द्रजित्ने भी जयन्तको बाँधकर किंकरोंके लिए सौंप दिया। तदनन्तर विजयसे जिसका उत्साह बढ़ रहा था तथा जो शत्रुओंको सन्तप्त कर रहा था ऐसा इन्द्रजित् देवोंकी सेनाके सम्मख दौडा। उसे दौडता देख शत्रुओंको सन्ताप पहुँचानेवाले रावणने कहा कि हे वत्स ! अब प्रयत्न करना व्यर्थ है, युद्धके आदरसे निवृत्त होओ, विजयार्धवासो लोगोंकी इस सेनाका सिर अपने हाथ लग चुका है ॥३४८३५०। इसके हाथ लग चुकनेपर दूसरा कौन हलचल कर सकता है ? ये. क्षुद्र सामन्त जीवित रहें और अपने इच्छित स्थानपर जावें ॥३५१।। जब धानके समूहसे चावल निकाल लिये जाते हैं तब छिलकोंके समूहको अकारण ही छोड़ देते हैं ॥३५२॥ रावणके इस प्रकार कहनेपर इन्द्रजित् युद्धके उत्साहसे निवत्त हआ। उस समय राजाओंका बड़ा भारी समह इन्द्रजितको घेरे हए था ॥३५३॥ तदनन्तर जिस प्रकार शरदऋतुके बादलोंका बड़ा लम्बा समूह क्षण-भरमें विशीर्ण हो जाता है उसी प्रकार इन्द्रकी सेना क्षण-भरमें विशीर्ण हो गयी-इधर-उधर बिखर गयी ॥३५४।। रावणकी सेनामें उत्तमोत्तम पटल, शंख, झर्झर बाजे तथा बन्दीजनोंके समूहके द्वारा बड़ा भारी जयनाद किया गया ॥३५५।। उस जयनादसे इन्द्रको पकड़ा जानकर रावणकी सेना निराकुल हो गयी ॥३५६।। तदनन्तर परम विभूतिसे युक्त रावण, सेनासे आकाशको आच्छादित करता हुआ लंकाकी ओर चला । उस समय वह बड़ा सन्तुष्ट था ॥३५७|| जो सूर्यके रथके समान थे, ध्वजाओंसे सुशोभित थे और नाना रत्नोंकी किरणोंसे जिनपर इन्द्रधनुष उत्पन्न हो रहे थे ऐसे रथ उसके १. संमुखम् म. । २. महोत्साहपरंतपः ख., म. । महोत्साहं क. । ३. वृन्दिनां म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org:
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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