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________________ द्वादशं पर्व २२३ तेन तन्निखिलं ध्वान्तं विध्वस्तं क्षणमात्रतः । जिनशासनतत्त्वेन मतं मिथ्यादृशामिव ॥३३॥ ततो यमविमर्देन कोपामागास्त्रमुज्झितम् । वितेने गगनं तेन भोगिमी रनभासुरैः ॥३३२॥ कामरूपभृतो बाणास्ते गत्वा वृत्रविद्विषः । चेष्टया रहितं चक्रुः शरीरं कृतवेष्टनाः ॥३३३॥ महानीलनिभैरेमिवलयाकारधारिभिः । जगामाकुलतां शक्रश्चलद्रसनमीषणैः ॥३३४॥ प्रययावस्वतन्त्रत्वं कैलिशी व्यालवेष्टितः । वेष्टितः कर्मजालेन यथा जन्तुर्भवोदधौ ॥३३५॥ गरुडास्त्रं ततो दध्यौ सुरेन्द्रस्तदनन्तरम् । हेमपक्षप्रभाजालैः पिङ्गता गगनं गतम् ॥३३६॥ पक्षवातेन तस्याभूनितान्तोदाररंहसा । दोलारूढमिवाशेषं प्रेङ्क्षणप्रवणं बलम् ॥३३७॥ स्पृष्टा गरुडवातेन न ज्ञाता नागसायकाः । क्व गता इति विस्पष्टबन्धस्थानोपलक्षिताः ॥३३८॥ गरुत्मता कृताश्लेषो बन्धलक्षणवर्जितः । बभूव दारुणः शक्रो निदाघरविसंनिमः ॥३३९॥ विमुक्तं सर्पजालेन दृष्ट्वा शक्रं दशाननः । आरूढस्त्रिजगभूषं क्षरद्दानं जयद्विपम् ॥३०॥ शक्रोऽऽप्यैरावतं रोषादस्यात्यासनमानयत् । ततो महदभूद्युद्धं दन्तिनोः पुरुदर्पयोः ॥३४१॥ क्षरदानौ स्फुरदमकक्षाविद्युद्गुणान्वितौ । दधतुस्तौ घनाकारं सान्द्रगर्जितकारिणौ ॥३४२॥ परस्पररदाघातनिर्धातैरिव दारुणः । पतनिर्भुवनं कम्पं प्रययौ शब्दपूरितम् ॥३४३॥ पिण्डयित्वा स्थवीयान्सौ करौ चपलविग्रहौ । पुनः प्रसारयन्तौ च ताडयन्तौ महारथौ ॥३४४॥ करने में निपुण रावणने अपनी सेनाको मोहग्रस्त देख प्रभास्त्र अर्थात् प्रकाशबाण छोड़ा ॥३३०।। सो जिस प्रकार जिन-शासनके तत्त्वसे मिथ्यादृष्टियोंका मत नष्ट हो जाता है उसी प्रकार उस प्रभास्त्रसे क्षण-भरमें ही वह समस्त अन्धकार नष्ट हो गया ॥३३।। तदनन्तर रावणने क्रोधवश नागास्त्र छोड़ा जिससे समस्त आकाश रत्नोंसे देदीप्यमान साँसे व्याप्त हो गया ॥३३२॥ इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन बाणोंने जाकर इन्द्रके शरीरको निश्चेष्ट कर दिया तथा सब उससे लिपट गये ॥३३३।। जो महानीलमणिके समान श्याम थे, वलयका आकार धारण करनेवाले थे और चंचल जिह्वाओंसे भयंकर दिखते थे ऐसे साँसे इन्द्र बड़ी आकुलताको प्राप्त हुआ ॥३३४॥ जिस प्रकार कर्मजालसे घिरा प्राणी संसाररूपी सागरमें विवश हो जाता है उसी प्रकार व्याल अर्थात् साँसे घिरा इन्द्र विवशताको प्राप्त हो गया ॥३३५।। तदनन्तर इन्द्रने गरुडास्त्रका ध्यान किया जिसके प्रभावसे उसी क्षण आकाश सुवर्णमय पंखोंकी कान्तिके समूहसे पीला हो गया ॥३३६।। जिसका वेग अत्यन्त तीव्र था ऐसी गरुडके पंखोंकी वायुसे रावणकी समस्त सेना ऐसी चंचल हो गयो मानो हिंडोला ही झूल रही हो ॥३३७॥ गरुडकी वायुका स्पर्श होते ही पता नहीं चला कि नागबाण कहाँ चले गये। वे शरीरमें कहां-कहाँ बंधे थे उन स्थानोंका पता भी नहीं रहा ॥३३८|| गरुडका आलिंगन होनेसे जिसके समस्त बन्धन दूर हो गये थे ऐसा इन्द्र ग्रीष्मऋतुके सूर्यके समान भयंकर हो गया ॥३३९।। जब रावणने देखा कि इन्द्र नागपाशसे छूट गया है तब वह जिससे मद झर रहा था ऐसे त्रिलोकमण्डन नामक विजयी हाथीपर सवार हुआ ॥३४०॥ उधरसे इन्द्र भी क्रोधवश अपना ऐरावत हाथी रावणके निकट ले आया। तदनन्तर बहुत भारी गर्वको धारण करनेवाले दोनों हाथियोंमें महायुद्ध हुआ ॥३४१।। जिनसे मद झर रहा था, जो चमकती हुई स्वर्णकी मालारूपी बिजलीके सहित थे, तथा जो लगातार विशाल गर्जना कर रहे थे ऐसे दोनों हाथी मेधका आकार धारण कर रहे थे ॥३४२।। परस्परके दांतोंके आघातसे ऐसा लगता था मानो भयंकर वज्र गिर रहे हों और उनसे शब्दायमान हो समस्त संसार कम्पित हो रहा १. भोगिनी रत्न म. । सर्पः । २. इन्द्रः । ३. व्यालचेष्टितः म.। ४. प्रेक्षणप्रवणं म. । ५. शक्रजालेन (?) म. । ६. जैत्रगजमित्यर्थः । जगद्विषम् म. । ७. पुरदर्पयोः म. । ८. कारणो म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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