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________________ द्वादशं पर्व २७१ तमदृष्ट्वा ततः शालं लोकपालो विषादवान् । गृहीतमेव नगरं मेने यक्षविमदिना ॥१४॥ तथापि पौरुषं बिभ्रद् योद्धं 'श्रममरेण सः । निष्क्रान्तोऽत्यन्तविक्रान्तेसर्व सामन्तवेष्टितः ॥१४१॥ ततो महति संग्रामे प्रवृत्ते शस्त्रसङ्कुले । अदृष्टपद्मिनीनाथकिरणे क्रूरनिःस्वने ॥१४२॥ विभीषणेन वेगेन निपत्य नलकूबरः । गृहीतः कूबरं मंक्त्वा स्यन्दनस्यान्रिताडनात् ॥१४३॥ सहस्रकिरणे कर्म दशवक्त्रेण यत्कृतम् । विभीषणेन क्रुद्धेन तत्कृतं नलकूबरे ॥१४४॥ देवासुरभयोत्पादे दक्षं चक्रं न रावणः । त्रिदशाधिपसंबन्धि प्राप नाम्ना सुदर्शनम् ॥१४५॥ उपरम्भा दशास्येन रहसीदमथोदिता । विद्यादानाद् गुरुत्वं मे वर्तते प्रवराङ्गने ! ॥१४६॥ जीवति प्राणनाथे ते न युक्तं कर्तुमीदृशम् । ममापि सुतरामेव न्यायमार्गोपदेशिनः ॥१४७॥ समाश्वास्य ततो नीतो भार्यान्तं नलकूबरः । शस्त्रदारितसंनाहँ दृष्टविक्षतविग्रहः ॥१४८॥ अनेनैव समं मा भुइक्ष्व भोगान् यथेप्सितान् । कामवस्तुनि को भेदो मम वास्य च भोजने ॥१४९॥ मलीमसा च मे कीर्तिः कर्मदं कुर्वतो भवेत् । अपरोऽपि जनः कर्म कुर्वीतेदं मया कृतम् ॥१५०॥ सुताकाशध्वजस्यासि संभूता विमले कुले । संजाता मृदुकान्तायां शीलं रक्षितुमर्हसि ॥१५१॥ उच्यमानेति सा तेन नितान्तं जपयान्विता । स्वभर्तरि भृशं चक्रे मानसं प्रतिबोधिनी ॥१५२॥ व्यभिचारमविज्ञाय कान्ताया नलकूबरः । रेमे तया समं प्राप्तः संमानं दशवक्त्रतः ॥१५३॥ सुनकर नलकूबर क्षोभको प्राप्त हआ ॥१३९|| तदनन्तर उस मायामय प्राकारको न देखकर लोकपाल नलकबर बड़ा दुःखी हुआ। यद्यपि उसने समझ लिया था कि अब तो हमारा नगर रावणने ले ही लिया तो भी उसने उद्यम नहीं छोड़ा। वह पुरुषार्थको धारण करता हुआ बड़े श्रमसे युद्ध करनेके लिए बाहर निकला। अत्यन्त पराक्रमी सब सामन्त उसके साथ थे ॥१४०-१४१॥ तदनन्तर जो शस्त्रोंसे व्यप्त था, जिसमें सूर्यको किरणें नहीं दिख रही थीं और भयंकर कठोर शब्द हो रहा था ऐसे महायुद्धके होनेपर विभीषणने वेगसे उछलकर पैरके आघातसे रथका धुरा तोड़ दिया और नलकूबरको जीवित पकड़ लिया ॥१४२-१४३॥ रावणने राजा सहस्ररश्मिके साथ जो काम किया था वही काम क्रोधसे भरे विभीषणने नलकूबरके साथ किया ॥१४४|| उसी समय रावणने देव और असुरोंको भय उत्पन्न करने में समर्थ इन्द्र सम्बन्धी सुदर्शन नामका चक्ररत्न प्राप्त किया ।।१४५|| तदनन्तर रावणने एकान्तमें उपरम्भासे कहा कि हे प्रवरांगने ! विद्या देनेसे तुम मेरी गुरु हो ॥१४६।। पतिके जीवित रहते तुम्हें ऐसा करना योग्य नहीं है और नीतिमार्गका उपदेश देनेवाले मुझे तो बिलकुल ही योग्य नहीं है ॥१४७|| तत्पश्चात् शस्त्रोंसे विदारित कवचके भीतर जिसका अक्षत शरीर दिख रहा था ऐसे नलकूबरको वह समझाकर स्त्रीके पास ले गया ||१४८।। और कहा कि इस भर्ताके साथ मनचाहे भोग भोगो। काम-सेवनके विषयमें मेरे और इसके साथ उपभोगमें विशेषता ही क्या है ? ॥१४९|| इस कार्यके करनेसे मेरी कीर्ति मलिन हो जायेगी और मैंने यह कार्य किया है इसलिए दूसरे लोग भी यह कार्य करने लग जावेंगे ॥१५०।। तुम राजा आकाशध्वज और मृदुकान्ताकी पुत्री हो, निर्मल कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ है अतः शीलकी रक्षा करना ही योग्य है ॥१५१॥ रावणके ऐसा कहनेपर वह अत्यधिक लज्जित हुई और प्रतिबोधको प्राप्त हो अपने पतिमें ही सन्तुष्ट हो गयी ॥१५२।। इधर नलकूबरको अपनी स्त्रीके व्यभिचारका पता नहीं चला इसलिए रावणसे सम्मान प्राप्त कर वह पूर्ववत् उसके साथ रमण करने लगा ॥१५३।। १. समभरेण ख., म., ब.। २. विक्रान्तः क., ब., म. । ३. सामन्तशतवेष्टितः क., ब., म. । ४. निपात्य ख., म. । ५. प्रापन्नाम्ना म., ब. । ६. भायाँ तां ख., म., ब.। ७. दिष्ट ख., म., ब.। ८. चास्य म. । ९. भोगे । १०. समं चक्रे म.। For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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