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________________ पद्मपुराणे नरान्तरमुखक्लेदपूर्णेऽन्याङ्गविमर्दिते । उच्छिष्टभोजने भोक्तुं भद्रे वान्छति को नरः ॥ १२६॥ मिथो विभीषणायेदं प्रीत्यानेनाथ वेदितम् । नयज्ञः स जगादैवं सततं मन्त्रिगणाग्रणीः ॥ १२७॥ देव प्रक्रम एवायमीदृशो वर्तते यतः । अलीकमपि वक्तव्यं राज्ञा नयवता सदा ॥ १२८ ॥ तुष्टाभ्युपगमात् किंचिदुपायं कथयिष्यति । उपरम्भा परिप्राप्तौ विश्रम्भं परमागता ।। १२९|| ततस्तद्वचनात्तेन दूती छद्मानुगामिना । इत्यभाष्यत तन्नाम भद्रे यदुचितं त्वया ॥ १३० ॥ वराकी मद्गतप्राणा वर्तते सा सुदुःखिता । रक्षणीया ममोदारा भवन्ति हि दयापराः ॥ १३१ ॥ ततश्चानय तां गत्वा प्राणैर्यावन्न मुच्यते । प्राणिनां रक्षणे धर्मः श्रूयते प्रकटो भुवि ॥ १३२ ॥ २ 3 ४ ' इत्युक्त्वा परिसृष्टा सा गत्वा तामानयत् क्षणात् । आदरश्च महानस्याः कृतो यमविमर्दिना ॥१३३॥ ततो मदनसंप्राप्ता सा तेनैवमभाष्यत । दुर्लङ्घयनगरे देवि रन्तुं मम परा स्पृहा ॥ १३४ ॥ अटव्यामि किं सौख्यं किं वा मदनकारणम् । तथा कुरु यथैतस्मिंस्त्वया सह पुरे रमे ॥ १३५ ॥ ततस्तत्तस्य कौटिल्यमविज्ञाय स्मरातुरा । स्त्रीणां स्वभावमुग्धत्वात्पुरस्यागमनाय सा ॥१३६॥ ददावाशालिकां विद्यां प्राकारत्वेन कल्पिताम् । व्यन्तरैः कृतरक्षाणि नानास्त्राणि च सादरा ॥ १३७ ॥ अपयातश्च शालोऽसौ विद्यालामादनन्तरम् । स्थितं प्रकृतिशालेन केवलेनावृतं पुरम् ॥१३८॥ बभूव रावणः साकं सैन्येन महतान्तिकैः । पुरस्य निनदं श्रुत्वा क्षुब्धश्च नलकूबरः ॥ १३९॥ २७८ ही कह || १२५ || हे भद्रे ! दूसरे मनुष्य के मुखकी लारसे पूर्ण तथा अन्य मनुष्य के अंगसे मर्दित जूठा भोजन खानेकी कौन मनुष्य इच्छा करता है ? ॥ १२६ ॥ तदनन्तर रावणने यह बात प्रीतिपूर्वक विभीषणसे भी एकान्तमें कही सो नीतिको जानने वाले एवं निरन्तर मन्त्रिगणोंमें प्रमुखता धारण करनेवाले विभीषणने इस प्रकार उत्तर दिया ॥ १२७॥ कि हे देव ! चूँकि यह कार्य ही ऐसा है अतः सदा नीतिके जाननेवाले राजाको कभी झूठ भी बोलना पड़ता है || १२८|| सम्भव है स्वीकार कर लेनेसे सन्तोषको प्राप्त हुई उपरम्भा उत्कट विश्वास करती हुई, किसी तरह नगर लेनेका कोई उपाय बता दे || १२९|| तदनन्तर विभीषण के कहने से कपटका अनुसरण करनेवाले रावणने दूतीसे कहा कि हे भद्रे ! तूने जो कहा है वह ठीक है ॥ १३० ॥ चूँकि उस बेचारीके प्राण मुझमें अटक रहे हैं और वह अत्यन्त दुःखसे युक्त है अतः मेरे द्वारा रक्षा करनेके योग्य है । यथार्थ में उदार मनुष्य दयालु होते हैं ॥ १३१ ॥ इसलिए जबतक प्राण उसे नहीं छोड़ देते हैं तब तक जाकर उसे ले आ । 'प्राणियोंकी रक्षा करनेमें धर्मं है' यह बात पृथिवीपर खूब सुनी जाती है ॥ १३२ ॥ इतना कहकर रावणके द्वारा विदा की हुई दूती क्षणभरमें जाकर उपरम्भाको ले आयी । आनेपर रावणने उसका बहुत आदर किया ॥ १३३ ॥ तदनन्तर कामके वशीभूत हो जब उपरम्भा रावणके समीप पहुँची तब रावणने कहा कि हे देवि ! मेरी उत्कट इच्छा दुर्लघ्यनगरमें ही रमण करनेकी है || १३४|| तुम्हीं कहो इस जंगल में क्या सुख है ? और क्या कामवर्धक कारण है ? हे देवि ! ऐसा करो कि जिससे मैं तुम्हारे साथ नगर में ही रमण करूँ || १३५|| स्त्रियाँ स्वभावसे ही मुग्ध होती हैं इसलिए उपरम्भा रावणकी कुटिलताको नहीं समझ सको । निदान, उसने कामसे पीड़ित हो उसे नगर में आनेके लिए आशालिका नामकी वह विद्या जो कि प्राकार बनकर खड़ी हुई थी तथा व्यन्तर देव जिनकी रक्षा किया करते थे ऐसे नाना शस्त्र बड़े आदर के साथ दे दिये ।। १३६- १३७॥ विद्या मिलते ही वह मायामय प्राकार दूर हो गया और उसके अभाव में वह नगर केवल स्वाभाविक प्राकारसे ही आवृत रह गया ।। १३८ || रावण बड़ी भारी सेना लेकर नगरके निकट पहुँचा सो उसका कलकल १. वक्तुं म । २. इत्युक्ता म., ब. क. । ३. परिहृष्टा क., म., ब । ४. महा तस्याः म. । ५ मदनसंप्राप्ती क., ख., म. । ६. निकटस्थ: । ७. निन्दनं म । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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