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________________ द्वादशं पर्व २७५ इति संदिश्य गर्वेण सेनामगणयद् द्विषः । गतोऽसौ पाण्डुकोद्यानं वन्दनासक्तमानसः ॥८५॥ समस्ताप्तसमेतश्च प्रयत्नान्नलकूबरः । पुरस्याचिन्तयद् रक्षामिति कर्तव्यतत्परः ॥८६॥ योजनानां शतं तुङ्गः प्राकारो विद्यया कृतः। वज्रशाल इति ख्यातः परिधिस्त्रिगुणान्वितः ॥८७॥ रावणेन च विज्ञाय नगरं शत्रुगोचरम् । 'गृहीतं प्रेषितो दण्ड प्रहस्तोऽनीकिनीपतिः॥४८॥ निवृत्य रावणायासावाख्यदेव न शक्यते । गृहीतुं तत्पुरं तुङ्गप्राकारकृतवेष्टनम् ॥८९॥ पश्य दृश्यत एवायं दिक्षु सर्वासु दारुणः । शिखरी विवरी दंष्ट्राकरालास्यशयूपमः ॥१०॥ दह्यमानमिवोदारं कीचकानां घनं वनम् । स्फुलिङ्गराशिदुष्प्रेक्ष्यज्वालाजालसमाकुलम् ॥९॥ दंष्ट्राकरालवेतालरूपाण्यस्य नरान् बहून् । हरन्त्युदारयन्त्राणि योजनाभ्यन्तरस्थितान् ॥१२॥ तेषां वक्त्राणि ये प्राप्ता यन्त्राणां प्राणिनां गणाः । तेषां जन्मान्तरे भूयः शरीरेण समागमः ॥१३॥ इति विज्ञाय कर्तव्यस्त्वया कुशलसंगमः । उपायो विजिगीषुत्वं क्रियते दीर्घदर्शिना ॥९४॥ निःसर्पणमरं तावदस्माद्देशाद् विराजते । संशयः परमोऽप्यत्र दृश्यते दुनिराकृतः॥१५॥ ततः कैलासकुक्षिस्था दशवक्त्रस्य मन्त्रिणः । उपायं चिन्तयाञ्चक्रुर्न यशास्त्रविशारदाः ॥९६।। अथ रम्भागुणाकारा नलकूबरकामिनी। उपरम्भेति विख्याता शुश्रावान्ते दशाननम् ॥९७।। पूर्वमेव गुण रक्ता तत्रोत्कण्ठां परामसौ । जगाम रजनीनाथे यथा कुमुदसंहतिः ॥९८॥ हो ॥८३-८४॥ ऐसा सन्देश देकर जिसका मन वन्दनामें आसक्त था ऐसा इन्द्र गर्ववश शत्रुकी सेनाको कुछ नहीं गिनता हुआ पाण्डुकवन चला गया ॥८५॥ इधर समयानुसार कार्य करने में तत्पर रहनेवाले नलकूबरने समस्त आप्तजनोंके साथ मिलकर बड़े प्रयत्नसे नगरकी रक्षाका उपाय सोचा ॥८६॥ उसने सौ योजन ऊंचा और तिगुनी परिधिसे युक्त वज्रशाल नामा कोट, विद्याके प्रभावसे नगरके चारों ओर खड़ा कर दिया ॥८७|| यह नगर शत्रुके अधीन है ऐसा जानकर रावणने दण्ड वसूल करनेके लिए प्रहस्त नामा सेनापति भेजा ॥८८॥ सो उसने लौटकर रावणसे कहा कि हे देव ! शत्रुका नगर बहुत ऊँचे प्रकारसे घिरा हुआ है इसलिए वह नहीं लिया जा सकता है ।।८।। देखो वह भयंकर प्राकार यहाँ से ही समस्त दिशाओंमें दिखाई दे रहा है। वह बड़ी ऊँची शिखरों और गम्भीर विलोसे युक्त है तथा जिसका मुख दाँढोंसे भयंकर है ऐसे अजगरके समान जान पड़ता है ।।९०॥ उड़ते हुए तिलगोंसे जिनकी ओर देखना भी कठिन है ऐसी ज्वालाओंके समूहसे वह प्राकार भरा हुआ है तथा बाँसोंके जलते हुए किसी सघन बड़े वनके समान दिखाई देता है ॥११॥ इस प्राकारमें भयंकर दाढ़ोंको धारण करनेवाले वेतालोंके समान ऐसे-ऐसे विशाल यन्त्र लगे हुए हैं जो एक योजनके भीतर रहनेवाले बहुतसे मनुष्योंको एक साथ पकड़ लेते हैं ॥१२॥ प्राणियोंके जो समूह उन यन्त्रोंके मुखमें पहुंच जाते हैं फिर उसके शरीरका समागम दूसरे जन्ममें ही होता है ॥९३।। ऐसा जानकर आप नगर लेनेके लिए कोई कुशल उपाय सोचिए । यथार्थमें दीर्घदर्शी मनुष्यके द्वारा ही विजिगीषुपना किया जाता है अर्थात् जो दीर्घदर्शी होता है वही विजिगीषु हो सकता है ।।१४।। इस स्थानसे तो शीघ्र ही निकल भागना शोभा देता है क्योंकि यहाँ पर जिसका निरावरण नहीं किया जा सकता ऐसा बहुत भारी संशय विद्यमान है ॥९५।। तदनन्तर कैलासकी गुफाओं में बैठे रावणके नीतिनिपुण मन्त्री उपायका विचार करने लगे।।९६।। अथानन्तर जिसके गुण और आकार रम्भा नामक अप्सराके समान थे ऐसी नलकूबरकी उपरम्भा नामक प्रसिद्ध स्त्री ने सुना कि रावण समीप ही आकर ठहरा हुआ है ।१७।। वह रावणके गुणोंसे पहले ही अनुरक्त थी इसलिए जिस प्रकार कूमदोंकी पंक्ति चन्द्रमाके विषयमें १. गृहीतं प्रेषितो दण्डः प्रहस्तो नाकिनीपतिः म.। २. स्थितं म.। स्थिता ख.। ३. दशिता म., शिना ख. ब.। दशिनः ज.। ४. शीघ्रम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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