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________________ पद्मपुराणे मुञ्चन्नारात्समुद्रस्य धरणीं धरणीपतिः । चिरेण जिनचैस्याढ्यं प्रापाष्टापदभूधरम् ॥ ७२ ॥ प्रसन्नसलिला तत्र माति मन्दाकिनी भृशम् । महिषी सिन्धुनाथस्य कनकाब्जरजस्तता ॥७३॥ सन्निवेश्य समीपेऽस्या वाहिनीं परमाप ताम् । मनोज्ञं रमणं चक्रे कैलासस्य स कुक्षिषु ॥७४॥ नुनुदुः खेचराः खेदं भूचराश्च यथाक्रमम् । मन्दाकिन्याः सुखस्पर्शसलिले स्फटिकामले ॥ ७५ ॥ न मेरुपल्लवापास्तलोठनोपात्तपांशवः । स्नपिताः सप्तयः पीतपयसो "विनयस्थिताः ॥७६॥ शीकरार्द्वितदेहत्वाद् ग्राहिताः सुधनं रजः । तटिन्यस्तमहाखेदाः स्नपिताः कुञ्जराश्चिरम् ॥७७॥ स्मृत्वानु बालिवृत्तान्तं नमस्कृत जिनालयः । यमध्वंसः स्थितः कुर्वश्चेष्टां धर्मानुगामिनीम् ॥७८॥ अथ योऽसौ सुरेन्द्रेण नियुक्तो नलकूबरः । लोकपालतया ख्यातः पुरे दुर्लङ्यसंज्ञके ॥७९॥ उपशल्यं स विज्ञाय रावणं चरवर्गतः । जिगीषया समायातं सैन्यसागरवर्तिनम् ॥८०॥ लेखारोपितवृत्तान्तं प्राहिणोदाशुगामिनम् । खेचरं सुरनाथाय नासाध्यासितमानसः ॥ ८१ ॥ 'मन्दरं प्रस्थितायास्मै वन्दितुं जिनपुङ्गवान् । प्रणम्य लेखवाहेन लेखोऽवस्थापितः पुरः ॥ ८२ ॥ वाचयित्वा च तं कृत्वा हृदयेऽर्थमशेषतः । आज्ञापयत् सुराधीशो 'वस्त्विदं लेखदानतः ॥ ८३॥ यत्नात्तावदिहास्स्व त्वममोघास्य पालकः । जिनानां पाण्डुके कृत्वा वन्दनां यावदेम्यहम् ॥ ८४ ॥ ७ 10 २७४ संसार में अठारह वर्ष तक इस प्रकार भ्रमण करता रहा जिस प्रकार कि इन्द्र स्वर्ग में भ्रमण करता है ।।७०-७१।। तदनन्तर रावण क्रम-क्रमसे समुद्रको निकटवर्तिनी भूमिको छोड़ता हुआ चिरकाल के बाद जिनमन्दिरोंसे युक्त कैलास पर्वतपर पहुँचा ||७२ || वहाँ स्वच्छ जलसे भरी समुद्रकी पत्नी एवं सुवर्ण कमलोंकी परागसे व्याप्त गंगानदी अत्यधिक सुशोभित हो रही थी ||७३ || सो उसके समीप ही अपनी विशाल सेना ठहराकर कैलासकी कन्दराओं में मनोहर क्रीड़ा करने लगा ॥७४॥ पहले विद्याधर और फिर भूमिगोचरी मनुष्योंने यथाक्रमसे गंगा नदीके स्फटिकके समान स्वच्छ सुखकर स्पर्शंवाले जलमें अपना खेद दूर किया था अर्थात् स्नानकर अपनी थकावट दूर की थी ।।७५॥ पृथ्वीपर लोटनेके कारण लगी हुई जिनकी धूलि नमेरुवृक्षके नये-नये पत्तोंसे झाड़कर दूर कर दी गयी थी और पानी पिलानेके बाद जिन्हें खूब नहलाया गया था ऐसे घोड़े विनयसे खड़े थे ॥७६॥ जलके छींटोंसे गीला शरीर होनेके कारण जिनपर बहुत गाढ़ी धूलि जमी हुई थी तथा नदी द्वारा जिनका बड़ा भारी खेद दूर कर दिया गया था ऐसे हाथियोंको महावतोंने चिरकाल तक नहलाया था ||७७|| कैलासपर आते ही रावणको बालिका वृत्तान्त स्मृत हो उठा इसलिए उसने समस्त चैत्यालयोंको बड़ी सावधानी से नमस्कार किया और धर्मानुकूल क्रियाओंका आचरण किया || ७८|| अथानन्तर इन्द्रने दुर्लघयपुर नामा नगरमें नलकूबरको लोकपाल बनाकर स्थापित किया था सो गुप्तचरोंसे जब उसे यह मालूम हुआ कि सेना रूपी सागरके मध्य वर्तमान रहनेवाला रावण जीतने की इच्छा से निकट ही आ पहुँचा है तब उसने भयभोतचित्त होकर पत्रमें सब समाचार लिख एक शीघ्रगामी विद्याधर इन्द्रके पास पहुँचाया ॥७२-८१ । सो इन्द्र जिस समय जिन - प्रतिमाओं की वन्दना करनेके लिए सुमेरु पर्वतपर जा रहा था उसी समय पत्रवाहक विद्याधरप्रणामकर नलकूबरका पत्र उसके सामने रख दिया ॥८२॥ इन्द्रने पत्र बाँचकर तथा समस्त अर्थं हृदयमें धारणकर प्रतिलेख द्वारा आज्ञा दी कि मैं जबतक पाण्डुकवन में स्थित जिन-प्रतिवन्दना कर वापस आता हूँ तबतक तुम बड़े यत्नसे रहना । तुम अमोघ अस्त्र धारक १. कैलासगिरिम् । २. रजस्तथा म. । ३ पल्लवायास्त म । ४. नमिताः म । ५ विनयास्थिताः म. 1 ६. तटिन्या नद्या अस्तो महाखेदो येषां ते । तदन्यस्तमहाभेदाः क, ख । तटन्यस्तमहाखेदा: व. । ७. समीपं । ८. मेरुम् । मन्दिरं म., ब. । ९. वास्त्विदं म । १०. इह + आस्स्व । दिहास्व म. । दिहस्य ब. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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