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________________ द्वादशं पर्व २७१ तां च कन्यां समासाद्य साक्षादिव वनश्रियम् । वनमालाश्रुतिं तत्र स्थितोऽसौ भासमात्रकम् ॥२८॥ अनुज्ञातस्ततस्तेन शतद्वारपुरोत्तमम् । प्रस्थितः कान्तया साकं वृतः शबरसेनया ॥२९॥ गवेषणे विनिष्क्रान्तः प्रभवोऽथ तदैक्षत । कान्तया सहितं मित्रं स्मरस्येव पताकया ॥३०॥ चक्रे च मित्रभार्यायां मानसं पापकर्मणः । उदयान्नष्टनिःशेषकृत्याकृत्यविचेतनः ॥३१॥ मनोभवशरैरुङ्गस्ताड्यमानः समन्ततः । अवाप न क्वचित्सौख्यं मनसा भृशमाकुलः ॥३२॥ ज्येष्ठो व्याधिसहस्राणां मदनो मतिसूदनः । येन संप्राप्यते दुःखं नरैरक्षतविग्रहः ॥३३॥ प्रधानं दिवसाधीशः सर्वेषां ज्योतिषां यया । तथा समस्तरोगाणां मदनो मूनि वर्तते ॥३४॥. विचित्तोऽसि किमित्येवमित्युक्तः सुहृदा च सः। जगाद सुन्दरीं दृष्ट्वा विक्लवस्वस्य कारणम् ॥३५।। श्रुत्वा प्राणसमस्यास्य दुःखं स्वस्त्रीनिमित्तकम् । तामाशुप्राहिणोत् प्राज्ञः सुमित्रो मित्रवत्सलः ॥३६॥ प्रेक्ष्य च प्रभवागारं गवाक्षे गूढविग्रहः । स तामैक्षत किं कुर्यादियमस्येति तत्परः ॥३७॥ अचिन्तयच्च योषा भवेन्नास्यानकलिका । ततो निग्रहमेतस्याः कर्तास्मि सुविनिश्चितम् ॥३८॥ अर्थतस्याश्रवो भूत्वा कामं संपादयिष्यति । ततो ग्रामसहस्रेण पूजयिष्यामि सुन्दरीम् ॥३९।। समीपं प्रभवस्यापि वनमाला च सोत्सुका । प्रदोषसमये स्पष्टे ताराप्रकरमण्डिते ॥४०॥ आसीनां चासने रम्ये पुरोदोषविवर्जितः । तामपृच्छदहो मद्रे का त्वमित्युत्कटादरः॥४१॥ ततो विवाहपर्यन्तं तस्याः श्रुत्वा विचेष्टितम् । प्रभवो निष्णमो जातो निवेदं च गतः परम् ॥४२॥ दंष्ट्र उसे अपनी पल्ली (भीलोंकी बस्ती) में ले गया और एक पक्की शर्त कर उसने अपनी पुत्री राजा सुमित्रको विवाह दी ॥२७॥ जो साक्षात् वनलक्ष्मीके समान जान पड़ती थी ऐसी वनमाला नामा कन्याको पाकर राजा सुमित्र वहाँ एक माह तक रहा ॥२८॥ तदनन्तर द्विरददंष्ट्रको आज्ञा लेकर वह अपनी कान्ताके साथ शतद्वार नगरकी ओर वापस आ रहा था। भीलोंकी सेना उसके साथ थी ॥२९॥ इधर प्रभव अपने मित्रकी खोजके लिए निकला था सो उसने कामदेवकी पताकाके समान सुशोभित कान्तासे सहित मित्रको देखा ॥३०॥ पापकर्मके उदयसे जिसके समस्त करने और न करने योग्य कार्योंका विचार नष्ट हो गया था ऐसे प्रभवने मित्रकी स्त्रीमें अपना मन किया ।।३१॥ सब ओरसे कामके तीक्ष्ण बाणोंसे ताड़ित होनेके कारण उसका मन अत्यन्त व्याकुल हो रहा था इसलिए वह कहीं भी सुख नहीं पा रहा था ॥३२।। बुद्धिको नष्ट करनेवाला काम हजारों बीमारियोंमें सबसे बड़ी बीमारी है क्योंकि उससे मनुष्योंका शरीर तो नष्ट होता नहीं है पर वे दुःख पाते रहते हैं ॥३३॥ जिस प्रकार सूर्य समस्त ज्योतिषियोंमें प्रधान है उसी प्रकार काम समस्त रोगोंमें प्रधान है॥३४॥ 'बेचैन क्यों हो रहे हो 'इस तरह जब मित्रने बेचैनीका कारण पूछा तब उसने सुन्दरीको देखना ही अपनी बेचैनीका कारण कहा ॥३५|| मित्रवत्सल सुमित्रने जब सुना कि मेरे प्राणतुल्य मित्रको जो दुःख हो रहा है उसमें मेरी स्त्री ही निमित्त है तब उस बुद्धिमान्ने उसे प्रभवके घर भेज दिया और आप झरोखेमें छिपकर देखने लगा कि देखें यह वनमाला इसका क्या करती है ॥३६-३७॥ साथ ही वह यह भी सोचता जाता था कि यदि यह वनमाला इसके अनुकूल नहीं हुई तो मैं निश्चित ही इसका निग्रह करूँगा अर्थात् इसे दण्ड दूंगा ॥३८।। और यदि अनुकूल होकर इसका मनोरथ पूर्ण करेगी तो हजार ग्राम देकर इस सुन्दरीकी पूजा करूँगा ॥३९॥ तदनन्तर जब रात्रिका प्रारम्भ हो गया और आकाशमें ताराओंके समूह छिटक गये तब वनमाला बड़ी उत्कण्ठाके साथ प्रभक्के समीप पहुँची ॥४०॥ वनमालाको उसने सुन्दर आसनपर बैठाया और स्वयं निर्दोष भावसे उसके सामने बैठ गया। तदनन्तर उसने बड़े आदरके साथ उससे पूछा कि हे भद्रे ! तू कौन है ? ||४१।। वनमालाने विवाह तकका सब समाचार १. सती मैक्षत म. । २. वशंवदा आज्ञाकारिणीति यावत् । ३. स्पृष्टे म., ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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