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________________ २७२ पपुराणे अचिन्तयच्च हा कष्टं मया मित्रस्य कामिनी । किमपि प्रार्थिता कतुं घिल्मामुच्छिनचेतनम् ॥४३॥ पापादस्मान मुच्येऽहमृते स्वस्य विपादनात् । किं वा कलङ्कयुक्तेन जीवितेन ममाधुना ॥४४॥ इति संचिन्त्य मर्धा स्वं ललूष्यं चकर्ष सः। कोशतः सायकं सान्द्रच्छायादिग्धदिगन्तरम् ॥४५॥ उपकण्ठं च कण्ठस्य यावंदेनं चकार सः । निपत्य सहसा तावत्सुमित्रेण न्यरुध्यते ॥४६॥ जगाद च स्वरायुक्तं परिष्वज्य स तं सुहृद् । आत्मघातितया दोष प्राज्ञः किं नाम बुध्यसे ॥४७॥ "आमगर्मेषु दुःखानि प्राप्नुवन्ति चिरं जनाः । ये शरीरस्य कुर्वन्ति स्वस्याविधिनिपातनम् ।।४८॥ इत्युक्त्वा सुहृदः खड्गं करानाइय' सुचेतसा । सान्वितश्च चिरं वाक्यैर्मनोहरणकारिभिः ॥४९॥ ईदशी च तयोः प्रीतिरन्योऽन्यगुणयोजिता । प्राप्स्यत्यन्तमहो कष्टः संसारः सारव जितः ॥५०॥ पृथक-पृथक प्रपद्यन्ते सुखदु:खकरी गतिम् । जीवाः स्वकर्मसंपज्ञाः कोऽत्र कस्य सुहृजनः ॥५१॥ अन्यदाथ विबुद्धात्मा श्रमणस्वं समाश्रितः । ईशानकल्प ईशत्वं सुमित्रः प्राप्तवान् सुखी ॥५२॥ ततश्च्युत्वेह संभूतो द्वीपे जम्बूपदान्तिके । हरिवाहनराजस्य मथुरायां सुरः पुरि ॥५३॥ माधव्यास्तनयो नाम्ना मधुः स मधुमोहितः । नमसो हरिवंशस्य यश्चन्द्रस्वमुपागतः ॥५॥ मिथ्यादृक् प्रभवो मृत्वा दुःखमासाद्य दुर्गतौ । विश्वावसारभूत् पुत्रो ज्योतिष्मत्यां शिखिश्रुतिः ॥५५।। श्रमणत्वधरः कृत्वा तपः कष्टं निदानतः । दैत्यानामधिपो जातश्चमराख्योऽभमामरः ॥५६॥ ततोऽवधिकृतालोकः स्मृत्वा पूर्वमवान् निजान् । गुणान् सुमित्रमित्रस्य चक्रे मनसि निर्मलान् ॥५७॥ कह सुनाया। उसे सुनकर प्रभव प्रभाहीन हो गया और परम निर्वेदको प्राप्त हुआ ॥४२॥ वह विचार करने लगा कि हाय-हाय बड़े कष्टकी बात है कि मैंने मित्रकी स्त्रीसे कुछ तो भी करनेकी इच्छा की। मुझ अविवेकीके लिए धिक्कार है ॥४३॥ आत्मघातके सिवाय अन्य तरह मैं इस पापसे मुक्त नहीं हो सकता। अथवा मुझे अब इस कलंकी जीवनसे प्रयोजन ही क्या है ? ॥४४॥ ऐसा विचारकर उसने अपना मस्तक काटनेके लिए म्यानसे तलवार खींची। उसकी वह तलवार अपनी सघन कान्तिसे दिशाओंके अन्तरालको व्याप्त कर रही थी ॥४५॥ वह इस तलवारको कण्ठके पास ले ही गया था कि सुमित्रने सहसा लपककर उसे रोक दिया ॥४६॥ सुमित्रने शीघ्रतासे मित्रका आलिंगन कर कहा कि तुम तो पण्डित हो, आत्मघातसे जो दोष होता है उसे क्या नहीं जानते हो ? ||४७|| जो मनुष्य अपने शरीरका अविधिसे घात करते हैं वे चिरकाल तक कच्चे गर्भ में दुख प्राप्त करते हैं अर्थात् गर्भ पूर्ण हुए बिना ही असमय में मर जाते हैं ॥४८॥ ऐसा कहकर उसने मित्रके हाथसे तलवार छीनकर नष्ट कर दी और चिरकाल तक उसे मनोहारी वचनोंसे समझाया ॥४९॥ आचार्य कहते हैं कि परस्परके गुणोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उन दोनों मित्रोंकी प्रीति इस तरह अन्तको प्राप्त होगी इससे जान पड़ता है कि यह संसार असार है ।।५०|| अपने-अपने कर्मोसे युक्त जीव सुख-दुःख उत्पन्न करनेवाली पृथक्-पृथक् गतिको प्राप्त होते हैं इसलिए इस संसारमें कौन किसका मित्र है ? ॥५१॥ तदनन्तर जिसकी आत्मा प्रबुद्ध थी ऐसा राजा सुमित्र मुनि दीक्षा धारण कर अन्तमें ऐशान स्वर्गका अधिपति हो गया ॥५२॥ वहाँसे च्युत होकर जम्बूद्वीपकी मथुरा नगरीमें राजा हरिवाहनकी माधवी रानीसे मधु नामका पुत्र हुआ। यह पुत्र मधुके समान मोह उत्पन्न करनेवाला था और हरिवंशरूपी आकाशमें चन्द्रमाके समान सुशोभित था ॥५३-५४।। मिथ्यादृष्टि प्रभव मरकर दुर्गतिमें दुःख भोगता रहा और अन्तमें विश्वावसुकी ज्योतिष्मती स्त्रीके शिखी नामा पुत्र हुआ ॥५५|| सो द्रव्यलिंगी मुनि हो महातप कर निदानके प्रभावसे असुरोंका अधिपति चमरेन्द्र हुआ ॥५६॥ तदनन्तर अवधिज्ञानके द्वारा अपने पूर्व भवोंका स्मरण कर सुमित्र १. मारणात् । २. खड्गम् । ३. निरुध्यते म.। ४. दोषः म.। ५. अपरिपूर्णगर्भेषु । ६. करात्तस्य म. । ७. मथुरायामुरौ पुरि क., ख. । ८. श्रवणत्व -म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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