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________________ ३० पद्मपुराणे का प्रसंग दिया हुआ है- विपुलाचल पर्वतपर वीर भगवान्‌का समवसरण आने और उसमें इन्द्रभूति - गौतम द्वारा राजा श्रेणिकको — उसके प्रश्नपर कथाके कहे जानेका उल्लेख करते हैं; जब कि श्वेताम्बरीय कथाग्रन्थोंकी पद्धति इससे भिन्न है - वे सुधमं स्वामी द्वारा जम्बू स्वामीके प्रति कथाके अवतारका प्रसंग बतलाते हैं, जैसा कि संघदास गणीकी वसुदेवहिण्डीके निम्न वाक्यसे प्रकट है— " तत्थ तात्र सुहम्मसामिणा जंबूनामस्स पढमाणुयोगे तित्थयरचक्कवट्टि दशारवंशपरूवणगयं वसुदेवचरियं कहियं त्ति तस्सेव........त्ति ।" श्वेताम्बरोंके यहाँ मूल आगम ग्रन्थोंकी रचना भी सुधर्मा स्वामीके द्वारा हुई बतलायी जाती है जब कि दिगम्बर परम्परामें उनकी रचनाका सम्बन्ध गौतम गणधर - इन्द्रभूतिके साथ निर्दिष्ट है । [२] ग्रन्थ के द्वितीय उद्देश में शिक्षाव्रतों का वर्णन करते हुए समाधिमरण नामक सल्लेखना व्रतको चतुर्थ शिक्षाव्रत बतलाया है । यथा सामाध्यं च उपवासपोसहो अतिहिसंविभागो य । अंते समाहिमरणं सिक्खा सुवयाई चत्तारि ॥ ११५ ॥ समाधिमरण रूप सल्लेखना व्रतको शिक्षाव्रतों में परिगणित करने की यह मान्यता दिगम्बर सम्प्रदायकी है - आचार्य कुन्दकुन्दके चारितपाहुड में, जिनसेनके आदिपुराण में शिवकोटिकी रत्नमाला में, देवसेन के भावसंग्रहमें और वसुनन्दी के श्रावकाचार जैसे ग्रन्थों में इसका स्पष्ट विधान पाया जाता है । जयसिंहनन्दी के वरांग चरितमें भी यह उल्लिखित है । श्वेताम्बरीय आगम सूत्रोंमें इसको कहीं भी शिक्षाव्रतोंके रूपमें वर्णित नहीं किया है, जैसा कि मुख्तार श्री जुगलकिशोरको लिखे गये मुनि श्री पुण्यविजयजी के एक पत्रके निम्न वाक्य से भी प्रकट है - 'श्वेताम्बर आगममें कहीं भी १२ व्रतों में सल्लेखनाका समावेश शिक्षाव्रतके रूपमें नहीं किया गया है' । अतः यह मान्यता खास तौरपर दिगम्बर सम्प्रदाय के साथ सम्बन्ध रखती है । [ख] श्वेताम्बर सम्प्रदाय सम्बन्धी [१] इस ग्रन्थके दूसरे उद्देश्यकी ८२वीं गाथामें तीर्थंकर प्रकृतिके बन्धके बीस कारण बतलाये हैं रे । यद्यपि इनके नाम ग्रन्थ में कहीं भी प्रकट नहीं किये, फिर भी २० कारणोंकी यह मान्यता श्वेताम्बर सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखती है क्योंकि उनके ज्ञाता धर्मकथादि ग्रन्थोंमें २० कारण गिनाये | दिगम्बर सम्प्रदाय के षट्खण्डादि ग्रन्थों में सर्वत्र १६ कारण हो बतलाये गये हैं । [२] ग्रन्थ में चतुर्थ उद्देशकी ५८वीं गाथामें भरत चक्रवर्तीको ६४ हजार रानियोंका उल्लेख है। रानियोंकी यह संख्या भी श्वेताम्बर सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखती है । दिगम्बर सम्प्रदाय में ९६ हजार रानियों का उल्लेख है । [३] ग्रन्थके ७३वें उद्देशकी ३४वीं गाथामें रावणकी मृत्यु ज्येष्ठ कृष्ण एकादशीको लिखी है । यह मान्यता श्वेताम्बर सम्प्रदायसम्मत जान पड़ती है, क्योंकि हेमचन्द्र आचार्यने भी अपने 'त्रिषष्टिशलाका १. देखो, मुख्तार श्री जुगलकिशोर विरचित 'जैनाचार्यों का शासन भेद' नामक पुस्तकका 'गुणव्रत और शिक्षाव्रत' प्रकरण । २. 'वीसं जिण कारणाहं भावेओ' । ३. 'चउसट्ठि सहस्साई जुवईणं परमरूवधारीणं' । ४. 'जेट्टस्स बहुलपक्खे दिवसस्स चउत्थभागम्मि । एगरिसि दिवसे रावणमरणं वियाणाहि ।।' Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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