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________________ एकादशं पर्व २६५ तथापि शून्यहस्तानामस्माकं तव दर्शनम् । न युक्तमिति यत्किचिदुपादाय समागताः ॥३४४॥ जिनेन्द्रः प्रापितः पूजाममरैः कनकाम्बुजैः । दुमपुष्पादिभिः किन्न पूज्यतेऽस्मद्विधैर्जनैः ॥३४५॥ नानाजनपदैरवं सामन्तैश्च महर्द्धिमिः । पूजितः प्रतिसंमानं तेषां चक्रे प्रियोदितैः ॥३४६॥ परां प्रीतिमवापासौ पश्यन रम्यां वसुन्धराम् । कान्तामिव निजां नानारत्नलकारशालिनीम् ॥३४७॥ संगं देशेन येनासौ ययौ मार्गवशाद्विभुः । अकृष्टपच्यसस्याढ्यं तत्रासीद् वसुधातलम् ॥३४८॥ प्रमोदं परमं बिभ्रजनोऽस्य धरणीतलम् । अनुरागाम्भसा कीर्तिमभ्यसिञ्चत् सुनिर्मलाम् ॥३४९॥ कृषीबलजनाश्चैवमूचुः पुण्यजुषो वयम् । येन देशमिमं प्राप्तो देवो रत्नश्रवःसुतः ॥३५०॥ अन्यदा कृषिसतानां रूक्षाङ्गानां कुवाससाम् । वहतां कर्कशस्पर्श पाणिपादं सवेदनम् ॥३५१॥ क्लेशात् कालो गतोऽस्माकं सुखस्वादविवर्जितः । प्रभावादस्य मव्यस्य सांप्रतं वयमीश्वराः ॥३५२॥ पुण्येनानुगृहीतास्ते देशाः संपरसमाश्रिताः । येषु कल्याणसंभारो विचरत्येष रावणः ॥३५३।। कृत्यं किं बान्धवैये न समर्था दुःखनोदने । अयमेव महाबन्धुः सर्वेषां प्राणिनामभूत् ॥३५४॥ अनुरागं गुणरेवं स लोकस्य प्रवर्धयन् । चकार तस्य हेमन्तं निदाघं च सुखप्रदम् ॥३५५॥ आसतां चेतनास्तावद्येऽपि भावा विचेतनाः। तेऽपि भीता इवामुष्माद् बभूवुर्लोकसौख्यदाः ॥३५६॥ तावच्च व्रजनस्तस्य प्रादुरासीद्धनागमः । अभ्युत्थानं दशास्यस्य कुर्वन्निव ससंभ्रमः ॥३५७॥ बलाकाविद्युदिन्द्रास्त्रकृतभूषा घनाघनाः । महानीलगिरिच्छायाः कुर्वन्तः पटुनिस्वनम् ॥३५८॥ कौन-सा अपूर्व धन है जिसे भेंट देकर हम आपको प्रसन्न कर सकते हैं।।३४३।। फिर भी हम लोगोंको खाली हाथ आपका दर्शन करना उचित नहीं है इसलिए कुछ तो भी लेकर समीप आये हैं ॥३४४।। देवोंने जिनेन्द्र भगवान्की सुवर्ण कमलोंसे पूजा की थी तो क्या हमारे जैसे लोग उनकी साधारण वृक्षोंके फूलोंसे पूजा नहीं करते ? अर्थात् अवश्य करते हैं ॥३४५॥ इस प्रकार नाना जनपदवासी और बड़ी-बड़ी सम्पदाओंको धारण करनेवाले सामन्तोंने रावणकी पूजा की तथा रावणने भी प्रिय वचन कहकर बदले में उनका सम्मान किया ॥३४६|| नाना रत्नमयो, अलंकारोंसे सुशोभित अपनी स्त्रीके समान सुन्दर पृथिवीको देखता हुआ रावण परम प्रीतिको प्राप्त हुआ १३४७।। रावण मार्गके कारण जिस-जिस देशके साथ समागमको प्राप्त हुआ था वहांकी पृथिवी अकृष्टपच्य धान्यसे युक्त हो गयी थी॥३४८॥ परम वर्षको धारण करनेवाले लोग रावणके द्वारा छोडे हए पथिवीतल तलको तथा उसकी अत्यन्त निमंल कीर्तिको अनुरागरूपी जलसे सींचते थे ॥३४९।। किसान लोग इस प्रकार कह रहे थे कि हम लोग बड़े पुण्यात्मा हैं जिससे कि रावण इस देशमें आया ॥३५०।। हम लोग अब तक खेतीमें लगे रहे, हम लोगोंका सारा शरीर रूखा हो गया। हमें फटे-पुराने वस्त्र पहननेको मिले, हम कठोर स्पर्श और तीव्र वेदनासे युक्त हाथ-पैरोंको धारण करते रहे और आज तक कभी सुखसे अच्छा भोजन हमें प्राप्त नहीं हुआ। इस तरह हम लोगोंका काल बड़े क्लेशसे व्यतीत हुआ परन्तु इस भव्य जीवके प्रभावसे हम लोग इस समय सर्व प्रकारसे सम्पन्न हो गये हैं ॥३५१-३५२॥ जिन देशोंमें यह कल्याणकारी रावण विचरण करता है वे देश पुण्यसे अनुगृहीत तथा सम्पत्तिसे सुशोभित हैं ॥३५३।। मुझे उन भाइयोंसे क्या प्रयोजन जो कि दुःख दूर करने में समर्थ नहीं हैं। यह रावण ही हम सब प्राणियोंका बड़ा भाई है ॥३५४॥ इस प्रकार गुणोंके द्वारा लोगोंके अनुरागको बढ़ाते हुए रावणने हेमन्त और ग्रीष्म ऋतुको भी लोगोंके लिए सुखदायी बना दिया था ॥३५५।। चेतन पदार्थ तो दूर रहे जो अचेतन पदार्थ थे वे भी मानो रावणसे भयभीत होकर ही लोगोंके लिए सुखदायी हो गये थे॥३५६|| रावणका प्रयाण जारी था कि इतने में वर्षा ऋतु आ गयी जो ऐसी जान पड़ती थी मानो हर्षके साथ रावणकी अगवानी करनेके लिए ही आयी थी ॥३५७॥ बलाका १. जनपदरेव म. । २. सुनिर्मलम् ख., ब., म. । ३४ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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