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________________ २६४ पद्मपुराणे निश्चिक्षिपुश्च पुष्पाणि 'समेतानि मधुव्रतः । तुष्टाश्च विविधालापांश्चक्रुस्तद्वर्णनामिति ॥३३०॥ अयं स रावणो येन जितो मातृष्वसुः सुतः । यमश्च यश्च कैलासं समुत्क्षेप्तुं समुद्यतः ॥३३१॥ नीतः सहस्ररश्मिश्च राज्यमारविमुक्तताम् । मरुत्वस्य च विध्वस्तो वितानः शौर्यशालिना ॥३३२॥ अहो समागमः साधुः कृतोऽयं कर्ममिश्चिरात् । रूपस्य केकसीसूनौ गुणानां च जनोत्सवः ॥३३३॥ योषित्पुण्यवती सोऽयं तो गर्भे ययोत्तमः । पिताप्यसौ कृतार्थत्वं प्राप्तः कृत्वास्य संभवम् ॥३३४॥ इलाध्यः स बन्धुलोकोऽपि यस्यायं प्रेमगोचरः । अनेनोपयता यास्तु तासां स्त्रीणां किमुच्यते ॥३३५॥ आलापमिति कुर्वन्त्यस्तावदेक्षन्त ताः स्त्रियः । गोचरत्वमवापायं यावद्विततचक्षुषाम् ॥३३६॥ गते तस्मिन्मनश्चौरे चक्षुर्गोचरतात्ययम् । मुहूर्तमभवनार्यः पुस्तकर्मगता इव ॥३३७॥ 'तेनापहतचित्तानां वान्छन्तीनां मनोगतम । कर्तमन्यदभत्कर्म कियताचिदनेहसा ॥३३८॥ बभूवेति दशग्रीवे देशे तत्संगमोज्झिते । नारीणां पुरुषाणां च त्यक्तान्याशेषसंकथा ॥३३९॥ विषये नगरे ग्रामे घोषे वा ये प्रधानताम् । भजन्ते पुरुषास्ते तमुपायनभृतोऽगमन् ॥३४०॥ गत्वा जनपदाश्चैवमुपनीय यथोचितम् । रचिताञ्जलयो नत्वा परितुष्टा व्यजिज्ञपन् ॥३४१॥ नन्दनादिषु रम्याणि यानि द्रव्याणि पार्थिव । सुलभत्वं प्रपन्नानि तव तान्यपि चिन्तनात् ॥३४२।। महाविभवपात्रस्य किमपूत्रं भवेत्तव । उपनीय प्रमोदं ते यत्कुर्मो द्रविणं वयम् ॥३४३॥ चित्त हो जाती थीं। उत्तम वेषको धारण करनेवाली स्त्रियाँ परस्पर एक दूसरेको पीड़ा पहुँचाती हुई प्रारब्ध समस्त कार्योंको छोड़कर झरोखोंमें आ डटी थीं ॥३२२-३२९।। वे सन्तुष्ट होकर भौंरोंसे सहित फूल रावणपर फेंक रही थीं और विविध प्रकारके शब्दोंसे उसका इस प्रकार वर्णन कर रही थीं ॥३३०।। कोई कह रही थी कि देखो यह वही रावण है जिसने मौसीके लड़के वैश्रवण और यमको जीता था। जो कैलास पर्वतको उठानेके लिए उद्यत हुआ था। जिसने सहस्ररश्मिको राज्यभारसे विमुक्त किया था यह बड़ा पराक्रमी है ॥३३१-३३२॥ अहो, बड़े आश्चर्यकी बात है कि कर्मोंने चिरकाल बाद रावणमें रूप तथा अनेक गुणोंका लोकानन्दकारी समागम किया है। अर्थात् जैसा इसका सुन्दर रूप है वैसे ही इसमें गुण विद्यमान हैं ॥३३३॥ वह स्त्री पुण्यवती है जिसने इस उत्तम पुत्रको गर्भ में धारण किया है और वह पिता भी कृतकृत्यपनाको प्राप्त है जिसने इसे जन्म दिया है ॥३३४।। वे बन्धुजन प्रशंसनीय हैं जिनका कि यह प्रेमपात्र है, जो स्त्रियाँ इसके साथ विवाहित हैं उनका तो कहना ही क्या है ? ॥३३५॥ वार्तालाप करती हुई स्त्रियाँ उसे तबतक देखती रहीं जबतक कि वह उनके विस्तृत नेत्रोंका विषय रहा अर्थात् नेत्रोंके ओझल नहीं हो गया ॥३३६।। मनको चुरानेवाला रावण जब नेत्रोंसे अदृश्य हो गया तब मुहूर्त-भरके लिए स्त्रियाँ चित्रलिखितको तरह निश्चेष्ट हो गयीं ॥३३७|| रावणके द्वारा उन स्त्रियोंका चित्त हरा गया था इसलिए कुछ दिन तक तो उनका यह हाल रहा कि उनके मनमें कुछ कार्य था और वे कर बैठती थीं कोई दूसरा ही कार्य ॥३३८॥ रावण जिस देशका समागम छोड़ आगे बढ़ जाता था उस देशके स्त्री-पुरुषोंमें एक रावणकी ही कथा शेष रह जाती थी अन्य सबकी कथा छूट जाती थी ॥३३९।। देश, नगर, ग्राम अथवा अहीरोंकी बस्ती में जो पुरुष प्रधानताको प्राप्त थे वे उपहार ले-लेकर रावणके समीप गये ।।३४०।। जनपदोंमें रहनेवाले लोग यथायोग्य भेंट लेकर रावणके पास गये और हाथ जोड़ नमस्कार कर सन्तुष्ट होते हुए निम्न प्रकार निवेदन करने लगे ॥३४१।। उन्होंने कहा कि हे राजन् ! नन्दन आदि वनोंमें जो भी मनोहर द्रव्य हैं वे इच्छा करने मात्रसे ही आपको सुलभ हैं अर्थात् अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं ॥३४२।। चूंकि आप महावैभवके पात्र हैं इसलिए ऐसा १. समेधानि म. । २. विविधालापाश्चक्रु -म.। ३. वैश्रवणः । ४. मरुतस्य म. । ५. परिणीता विवाहिता इत्यर्थः । ६. -दैक्ष्यन्त म. । दैक्यं गताः स्त्रियः क., ख. । ७. दारुनिमिता ख.। ८. तेनोपहृत -म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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