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________________ २६३ एकादशं पर्व एकेऽवोचन् गृहे वासो न मनागपि शोभते । दृश्यतामस्य देशस्य पार्थवं चित्तहारिणः ॥३१६॥ समुद्रविपुलं सैन्यं पश्यतात्र कथं स्थितम् । मरुत्वमखभङ्गस्य यथाऽन्योऽन्यं न दृश्यते ॥३१७॥ अहो धैर्यमहोदारं लोकस्येक्षणहारिणः । एतस्य खेचराणां च प्रशस्तोऽयं निरूप्यते ॥३१८॥ मरुत्वमखविध्वंसो यं यं देशमुपागतः । रम्यं तस्याकरोल्लोकः पन्थानं तोरणादिभिः ॥३१९॥ शशाङ्कसौम्यवक्त्राभिनेत्रे सरसिजोपमे । बिभ्रतीमिः सुलावण्यपूर्णदेहाभिरादरात् ॥३२०॥ महीगोचरनारीभिर्विद्याधरकुतूहलात् । वीक्ष्यमाणा ययुर्भूम्यां खेचरास्तद्दिदृक्षया ॥३२१॥ नगरस्य समीपेन व्रजन्तं कैकसीसुतम् । निर्दीतसायकश्यामं पक्वबिम्बफलाधरम् ॥३२२॥ मुकुटन्यस्तमुक्तांशुसलिलक्षालितालिकम् । इन्द्रनीलप्रमोदारस्फुरत्कुन्तलभारकम् ॥३२३।। सहस्रपत्रनयनं शर्वरीतिलकाननम् । सैज्यचापानतस्निग्धनीलभ्रूयुगराजितम् ॥३२॥ कम्बुग्रीवं हरिस्कन्धं पीनविस्तीर्णवक्षसम् । दिग्नागनासिकाबाहुं वज्रवन्मध्यदुर्विधम् ॥३२५॥ नागभोगसमाकारप्रसृतं मग्नजानुकम् । सरोजचरणं न्याय्यप्रमाणस्थितविग्रहम् ॥३२६॥ श्रीवत्सप्रभृतिस्तुत्यद्वात्रिंशल्लक्षणाञ्चितम् । रत्नरश्मिज्वलन्मौलिं विचित्रमणिकुण्डलम् ॥३२७॥ केयूरकर दीप्तांसं हारराजितवक्षसम् । प्रत्यर्धचक्रभृद्भोगं द्रष्टुमुत्सुकमानसाः ॥३२८॥ आपूरयन् परित्यक्तसमस्तप्रस्तुतक्रियाः । वातायनानि सद्वेषाः स्त्रियोऽन्योऽन्यविपीडिता ॥३२९॥ देखकर लंका लौटेंगे इसमें अपने कुटुम्बका दर्शन ही मुख्य कारण होगा ।।३१५।। कुछ लोग कहते थे कि घरमें रहना तो कुछ भी शोभा नहीं देता। जरा इस मनोहर देशका विस्तार तो देखो ॥३१६॥ देखो, रावणकी समुद्र के समान विशाल सेना यहाँ किस प्रकार ठहर गयो कि परस्परमें दिखाई ही नहीं देती ॥३१७॥ नेत्रोंको हरण करनेवाले इस लोकके धैर्यकी महानता आश्चर्यकारी है । इस लोक तथा विद्याधरोंके लोकका जब विचार करते हैं तो यह लोक ही उत्तम मालूम होता है ॥३१८|| राजा मरुत्वके यज्ञको नष्ट करनेवाला रावण जिस-जिस देशमें जाता था वहींके निवासीजन तोरण आदिके द्वारा उसके मार्गको मनोहर बना देते थे.॥३१९|| जिनके मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर थे, जो कमलतुल्य नेत्र धारण कर रही थीं और जिनका शरीर सौन्दर्यसे परिपूर्ण था ऐसी भमिगोचरी स्त्रियां विद्याधरोंके कतहलसे जिन्हें बडे आदरसे देख रही थीं ऐसा विद्याधर भी रावणको देखनेकी इच्छासे पृथ्वीपर चल रहे थे ॥३२०-३२१॥ जो अत्यन्त धुले हुए बाणके अग्रभाग अथवा तलवारके समान श्यामवर्ण था, जिसके ओठ पके हुए बिम्ब फलके समान थे, मुकुटमें लगे हुए मोतियोंकी किरणोंरूपी जलसे जिसका ललाट धुला हुआ था, जिसके धुंघराले बालोंका समूह इन्द्रनीलमणिकी प्रभासे भी अधिक चमकीला था, जिसके नेत्र कमलके समान थे, मुख चन्द्रमाके समान था, जो प्रत्यंचा सहित धनुषके समान टेढ़ी, चिकनी एवं नीली-नीली भौंहोंके युगलसे सुशोभित था, जिसकी ग्रीवा शंखके समान थी, कन्धे सिंहके समान थे, जिसका वक्षःस्थल मोटा और चौड़ा था, जिसकी भुजाएँ दिग्गजकी सूंडके समान मोटी थीं, जिसकी कमर वज्रके समान मजबूत एवं पतली थी, जिसकी जंघाएँ साँपके फणके समान थीं, जिसके घुटने अपनी मांसपेशियोंमें निमग्न थे, पैर कमलके समान थे, जिसका शरीर योग्य ऊँचाईसे सहित था, जो श्रीवत्स आदि उत्तमोत्तम बत्तीस लक्षणोंसे युक्त था, जिसका मुकुट रत्नोंकी किरणोंसे जगमगा रहा था. जिसके कुण्डल चित्रविचित्र मणियोंसे निमित थे, जिसके कन्धे बाजुबन्दोंकी किरणोंसे देदीप्यमान थे जिसका वक्षःस्थल हारसे सशोभित था और जिसे अर्धचक्रीके भोग प्राप्त थे ऐसा रावण जब नगरके समीपमें गमन करता हुआ आगे जाता था तब उसे देखने के लिए स्त्रियां अत्यन्त उत्कण्ठित१. पृथुत्वं विस्तारम् । पार्थिवं म., ख., ब. । २. लोकस्य क्षणहारिणः म. । ३. रावणः । ४. तारकम् म. । ५. चन्द्रमुखम् । ६. सद्य म., ख. । ७. 'जङ्घा तु प्रसृता समे' इत्यमरः । ८. दीप्तांशं म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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