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________________ एकादशं पर्व २५१ राज्ञः पश्यत एवास्य नारदो बहुभिर्द्विजैः । एकाकी हन्यते क्रूरैः शलभैरिव पन्नगः ॥२६२॥ अशक्तस्तत्र राजानमहं दृष्ट्वा भयार्दितः । निवेदयितुमायातो वृत्तान्तमिति दारुणम् ॥२६३॥ तमुदन्तं ततः श्रुत्वा रावणः कोपमागतः । 'वितानधरणी गन्तुं प्रवृत्तो जविवाहनः ॥१६४॥ समीररंहसश्चास्य पुरः संप्रस्थिता नराः । परिवारविनिर्मुक्तखड्गाः सूत्कारमासिताः ॥२६५॥ निमेषेण मखक्षोणी प्राप्ता दर्शनमात्रतः । व्यमोचयन् दयायुक्ता नारदं शत्रुपञ्जरात ॥२६६॥ निस्त्रिंशनरवृन्दैश्च रक्षिता पशुसंहतिः । मोचिता तैः सहुंकारं चक्षुनिक्षेपमात्रतः ॥२६७॥ भज्यभानस्ततो यूपैस्ताड्यमानैजिातिभिः । पशुभिर्मुच्यमानश्च जातं सांराविणं महत् ॥२६८॥ अब्रह्मण्यकृतारावास्ताड्यन्ते तावदेकशः । यावन्निपतिता भूमौ विश्वे निस्पन्दविग्रहाः ॥२६९॥ भटैश्च ' 'पर्यचोद्यन्त यया' वो दुःखमप्रियम् । सुखं च दयितं तद्वत्पशूनामपि दृश्यताम् ॥२७॥ यथा हि जीवितं कान्तं त्रैलोक्यस्यापि भावतः। भवतात् सर्वजन्तूनामियमेव 'व्यवस्थितिः ॥२७१॥ मवतां ताड्यमानानां कष्टा तावदियं व्यथा । शस्त्रर्विशस्यमानानां पशूनां तु किमुच्यताम् ॥२७२॥ दुष्कृतस्याधुना पापाः सहध्वं फलमागतम् । येन नो पुनरप्येवं कुरुध्वं पुरुषाधमाः ॥२७३।। सुत्रामापि समं देवैर्यद्यायाति तथापि न । अस्मत्स्वामिनि वः ऋद्ध जायते परिरक्षणम् ॥२७४।। अश्वैर्मतङ्गजैस्तत्स्थै रथस्थैर्गगनस्थितैः । भूमिस्थैः पुरुषैरस्त्रैराहन्यन्ते द्विजातयः ॥२७५।। तरह मारा जा रहा है जिस प्रकार कि बहुत-से दुष्ट पतंगे किसी साँपको मारते हैं ।।२६१-२६२।। मैं शक्तिहीन था और राजाको वहाँ देख भयसे पीड़ित हो गया इसलिए यह दारुण वृत्तान्त आपसे कहनेके लिए दौड़ा आया हूँ ॥२६३।। यह समाचार सुनते ही रावण क्रोधको प्राप्त हुआ और वेगशाली वाहनपर सवार हो यज्ञभूमिमें जानेके लिए तत्पर हुआ ॥२६४॥ वायुके समान जिनका वेग था, जो म्यानोंसे निकली हुई नंगी तलवारें हाथमें लिये थे और सू-सू शब्दसे सुशोभित थे ऐसे रावणके सिपाही पहले ही चल दिये थे ॥२६५।। वे पल-भरमें यज्ञभूमिमें जा पहुँचे । वहाँ जाकर उन दयालु पुरुषोंने दृष्टिमात्रसे नारदको शत्रुरूपी पिंजड़ेसे मुक्त करा दिया ॥२६६।। क्रूर मनुष्य जिस पशुओंके झुण्डकी रक्षा कर रहे थे उसे उन्होंने आँखके इशारे मात्रसे छुड़वा दिया ।।२६७॥ यज्ञके खम्भे तोड डाले, ब्राह्मणोंको पिटाई लगायी और पशओंको बन्धनसे छोड़ दिया। इन सब कारणोंसे वहाँ बड़ा भारी कोलाहल मच गया ।।२६८॥ 'अब्रह्मण्यं' 'अब्रह्मण्यं' की रट लगानेवाले एक-एक ब्राह्मणको इतना पीटा कि जबतक वे निश्चेष्ट शरीर होकर भूमिपर गिर न पड़े तबतक पीटते ही गये ॥२६९|| रावणके योद्धाओंने उन ब्राह्मणोंसे पूछा कि जिस प्रकार आप लोगोंको दुःख अप्रिय लगता है और सुख प्रिय जान पड़ता है उसी तरह इन पशुओंको भी लगता होगा ।।२७०।। जिस प्रकार तीन लोकके समस्त जीवोंको हृदयसे अपना जीवन अच्छा लगता है उसी प्रकार इन समस्त जन्तुओंकी भी व्यवस्था जाननी चाहिए ॥२७१।। आप लोगोंको जो पिटाई लगी है उससे आप लोगोंकी यह कष्टकारी अवस्था हुई है फिर शस्त्रोंसे मारे गये पशुओंकी क्या दशा होती होगी सो आप हो कहाँ ।।२७२।। अर पापो नोच पुरुषी ! इस समय तुम्हारे पापका जा फल प्राप्त हुआ है उस सहन करो जिससे फिर ऐसा न करोगे ॥२७३।। देवोंके साथ इन्द्र भी यहाँ आ जाये तो भी हमारे स्वामीके कुपित रहते तुम लोगोंकी रक्षा नहीं हो सकती ॥२७४॥ हाथी, घोड़े, रथ, आकाश और पृथिवीपर जो भी जहाँ स्थित था वह वहींसे शस्त्रों द्वारा ब्राह्मणोंको मार रहा था ॥२७५।। १. पश्यतः सतः । २. यज्ञभूमिम् । ३. कोशबहिर्गतकृपाणाः । ४. ........भासिनः म.। ५. विमोचयन् म. । ६. दयायुक्तो म.। ७. वधाय धुता रक्षिताः पशुसंहतीः म.। ८. मोचितास्तैः म.। ९. कलकलम् । १०. विप्राः म., ब.। ११. पर्यवोच्यन्त क.। १२. युष्माकम् । १३. प्रियम् । १४. भवतां क., ख., ब, म.. १५ -जन्तूनां नियमे च व्यवस्थितिः ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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