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________________ दशमं पवं माहिष्मतीपुरेशोऽथ बलेन प्रथितो भुवि । सहस्ररश्मिरप्येतामवतीर्णोऽन्यया दिशा || ६५ || सहस्ररश्मिरेवैष सत्यं परमसुन्दरः । सहस्रं तस्य दाराणां यदत्यन्तसुतेजसाम् ॥६६॥ जलयन्त्राणि चित्राणि कृतानि वरशिल्पिभिः । समाश्रित्य स रेमेऽस्यामद्भुतानां विधायकः ||६७ ॥ सागरस्यापि संरोद्धुमम्भः शक्तैर्नरैर्वृतः । यन्त्रसंवाहनामिज्ञः स्वेच्छयास्यां चचार सः ॥६८॥ जले यन्त्रप्रयोगेण क्षणेन विष्टते सति । भ्रमन्ति पुलिने नार्यो नानाक्रीडनकोविदाः ॥ ६९ ॥ कलत्रनिविडाश्लिष्टसुसूक्ष्म विमलांशुकाः । बभूवुः सत्रपा दृष्टा रमणेन वराङ्गनाः ॥ ७० ॥ 'विगतालेपना काचित् कुचौ नखपदाङ्कितौ । दर्शयन्ती चकारेयां प्रतिपक्षस्य कामिनी ॥७१॥ काचिदृश्यसमस्ताङ्गा वरयोषित् त्रपावती । अभिप्रियं निचिक्षेप कराभ्यां जलमाकुला ॥७२॥ प्रतिपक्षस्य दृष्ट्वान्या जघने करजक्षतीः । लीलाकमलनालेन जघान प्रमदा प्रियम् ॥ ७३ ॥ काचित् कोपवती मौनं गृहीत्वा निश्चला स्थिता । पत्या पादप्रणामेन दयिता तोषमाहृता ॥७४ || यावत्प्रसादयस्येकां तावदेत्यपरा रुषम् । यथाकथंचिदानिन्ये तोषं सर्वाः पुनर्नृपः ॥७५ || दर्शनात् स्पर्शनात् कोपात् प्रसादाद्विविधोदितात् । प्रणामाद्वारिनिक्षेपादवतंसकताडनात् ॥७६॥ वञ्चनादंशुकाक्षेपान्मेखलादामबन्धनात् । पलायनान्महारावात् संपर्कात् कुचकम्पनात् ॥७७॥ हासाभूषण निक्षेपात् प्रेरणाद् भ्रूविलासतः । अन्तर्धानात् समुद्भूतेरन्यस्माच्च सुविभ्रमात् ॥ ७८ ॥ रेमे बहुरसं तस्यां स मनोहरदर्शनः । आवृतो वरनारीभिर्देवीभिरिव वासवः ॥ ७९ ॥ अथानन्तर जो अपने बलसे पृथिवीपर प्रसिद्ध था ऐसा माहिष्मतीका राजा सहस्ररश्मि भी उसी समय अन्य दिशासे नर्मदा में प्रविष्ट हुआ ||६५ || यह सहस्ररश्मि यथार्थ में परम सुन्दर था क्योंकि उत्कृष्ट कान्तिको धारण करनेवाली हजारों स्त्रियां उसके साथ थीं ||६६ || उसने उत्कृष्ट कलाकारोंके द्वारा नाना प्रकारके जलयन्त्र बनवाये थे सो उन सबका आश्रय कर आश्चर्यको उत्पन्न करनेवाला सहस्ररश्मि नर्मदा में उतरकर नाना प्रकारकी क्रीड़ा कर रहा था ||६७ | उसके साथ यन्त्र निर्माणको जाननेवाले ऐसे अनेक मनुष्य थे जो समुद्रका भी जल रोकने में समर्थ थे फिर नदीकी तो बात ही क्या थी । इस प्रकार अपनी इच्छानुसार वह नर्मदा में भ्रमण कर रहा था || ६८ ॥ यन्त्रों के प्रयोगसे नर्मदाका जल क्षण-भर में रुक गया था इसलिए नाना प्रकारकी क्रीड़ा में निपुण स्त्रियाँ उसके तटपर भ्रमण कर रही थीं ||६९ || उन स्त्रियोंके अत्यन्त पतले और उज्ज्वल वस्त्र जलका सम्बन्ध पाकर उनके नितम्ब स्थलोंसे एकदम श्लिष्ट हो गये थे इसलिए जब पति उनकी ओर आँख उठाकर देखता था तब वे लज्जासे गड़ जाती थीं || ७० || शरीरका लेप धुल जानेके कारण जो नखक्षतों से चिह्नित स्तन दिखला रही थी ऐसी कोई एक स्त्री अपनी सौतके लिए ईर्ष्या उत्पन्न कर रही थी || ७१ || जिसके समस्त अंग दिख रहे थे ऐसी कोई उत्तम स्त्री लजाती हुई दोनों हाथोंसे बड़ी आकुलता के साथ पतिकी ओर पानी उछाल रही थी || ७२ || कोई अन्य स्त्री सौत के नितम्ब स्थलपर नखक्षत देखकर क्रीड़ाकमलकी नालसे पतिपर प्रहार कर रही थी ||७३ || कोई एक स्वभावकी क्रोधिनी स्त्री मौन लेकर निश्चल खड़ी रह गयी थी तब पतिने चरणों में प्रणाम कर उसे किसी तरह सन्तुष्ट किया ||७४ || राजा सहस्ररश्मि जबतक एक स्त्रीको प्रसन्न करता था तबतक दूसरी स्त्री रोषको प्राप्त हो जाती थी । इस कारण वह समस्त स्त्रियोंको बड़ी कठिनाई सन्तुष्ट कर सका था || ७५ ॥ उत्तमोत्तम स्त्रियोंसे घिरा, मनोहर रूपका धारक वह राजा, किसी स्त्रीकी ओर देखकर, किसीका स्पर्श कर, किसीके प्रति कोप प्रकट कर, किसीके प्रति अनेक प्रकारकी प्रसन्नता प्रकट कर, किसीको प्रणाम कर, किसीके ऊपर पानी उछालकर, किसीको कर्णा २२९ १. भवन्ति क, ख । २. दृष्ट्वा म । ३. विगतालेखना म । ४ तावत् + एति + अपरा, तावदेत्य परा रुषम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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