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________________ पद्मपुराणे पतितान् सिकतापृष्ठे नालंकारान् पुनः स्त्रियः । आचकाङ्क्षुर्महाचित्ता निर्माल्यग्गुणानिव ॥८०॥ काचिच्चन्दनलेपेन चकार धवलं जलम् । अन्या कुङ्कुमपङ्केन द्रुतचामीकरप्रभम् ॥८१॥ धौतताम्बूलरागाणामधराणां सुयोषिताम् । चक्षुषां व्यज्जनानां च लक्ष्मीरभवदुत्तमा ॥८२॥ पुनश्च यन्त्रनिर्मुक्तेवारिमध्ये यथेप्सितम् । रेमे समं वरस्त्रीभिर्नरेशः स्मैरहेतुभिः ॥ ८३ ॥ क्रीडन्तीभिर्जले स्त्रीभिर्भूषणानां वरो वः । शकुन्तेष्विव विन्यस्तः कूलकीलालचारिषु ||८४|| रावणोऽपि सुखं स्नात्वा वसानो धौतवाससी । विधाय प्रयतो 'मौलिं शुक्लकर्पटसंयुतम् ||८५|| निर्युक्तैः सर्वदा पुम्भिरुह्यमानां प्रयत्नतः । प्रतिमामर्हतो रत्न हेमनिर्मितविग्रहाम् ॥ ८६ ॥ "तरङ्गिणीनवे रम्ये पुलिने शुभ्रभासुरे । सिकतारचितो तुङ्गपीठबन्धविराजिते ॥ ८७ ॥ वैडूर्यदण्डिकासक्तमुक्ताफलवितानके । सर्वोपकरणव्यग्रपरिवर्गसमावृते ॥८८॥ स्थापयित्वा घनामोदसमाकृष्टमधुव्रतैः । धूपैरालेपनैः पुष्पैर्मनोज्ञैर्बहुभक्तिभिः ॥८९॥ विधाय महतीं पूजां संनिविष्टः पुरोऽवनौ । 'सगर्भ वदनं चक्रे पूतैः स्तुत्यक्षरैश्चिरम् ||१०|| अकस्मादथ पूरेण हता पूजा समन्ततः । फेनबुबुदयुक्तेन कलुषेण तरस्विना ॥९१॥ २३० भरणसे ताड़ित कर, किसीका धोखेसे वस्त्र खींचकर किसीको मेखलासे बाँधकर, किसीके पाससे दूर हटकर, किसीको भारी डाँट दिखाकर, किसीके साथ सम्पर्क कर, किसीके स्तनोंमें कम्पन उत्पन्न कर, किसीके साथ हँसकर, किसीके आभूषण गिराकर, किसीको गुदगुदाकर, किसीके प्रति भौंह चलाकर किसी से छिपकर, किसीके समक्ष प्रकट होकर तथा किसीके साथ अन्य प्रकारके विभ्रम दिखाकर नर्मदा नदी में बड़े आनन्दसे उस तरह क्रीड़ा कर रहा था जिस प्रकार कि देवियोंके साथ इन्द्र क्रीड़ा किया करता है ||७६-७९ ॥ उदार हृदयको धारण करनेवाली उन स्त्रियोंके जो आभूषण बालूके ऊपर गिर गये थे उन्होंने निर्मात्यकी मालाके समान फिर उन्हें उठानेकी इच्छा नहीं की थी ||८०|| किसी स्त्रीने चन्दनके लेपसे पानीको सफेद कर दिया था तो किसीने केशरके द्रवसे उसे सुवर्णके समान पीला बना दिया था ||८१ || जिनकी पानकी लालिमा धुल गयी थी ऐसे स्त्रियोंके ओंठ तथा जिनका काजल छूट गया था ऐसे नेत्रोंकी कोई अद्भुत ही शोभा दृष्टि गोचर हो रही थी ॥ ८२॥ तदनन्तर यन्त्रके द्वारा छोड़े हुए जलके बीच में वह राजा, काम उत्पन्न करनेवाली अनेक उत्कृष्ट स्त्रियोंके साथ इच्छानुसार क्रीड़ा करने लगा ||८३ | उस समय तटके समीपवर्ती जलमें विचरण करनेवाले पक्षी मनोहर शब्द कर रहे थे सो ऐसा जान पड़ता था मानो जल के भीतर क्रीड़ा करनेवाली स्त्रियोंने अपने आभूषणोंका शब्द उनके पास धरोहर ही रख दिया हो ||८४|| उधर यह सब चल रहा था इधर रावणने भी सुखपूर्वक स्नान कर धुले हुए उत्तम वस्त्र पहने और अपने मस्तकको बड़ी सावधानी से सफेद वस्त्रसे युक्त किया || ८५ || जिसे नियुक्त मनुष्य सदा बड़ी सावधानी से साथ लिये रहते थे ऐसी स्वर्णं तथा रत्ननिर्मित अर्हन्त भगवान्‌की प्रतिमाको रावणने नदीके उस तीरपर स्थापित कराया जो कि नदीके बीच नया निकला था, मनोहर था, सफेद तथा देदीप्यमान था, बालूके द्वारा निर्मित ऊँचे चबूतरेसे सुशोभित था, जहाँ वैडूर्यमणिकी छड़ियोंपर चन्दोवा तानकर उसपर मोतियोंकी झालर लटकायी गयी थी, और जो सब प्रकारके उपकरण इकट्ठे करनेमें व्यग्र परिजनोंसे भरा था ।८६-८८|| प्रतिमा स्थापित कर उसने भारी सुगन्धिसे भ्रमको आकर्षित करनेवाले धूप, चन्दन, पुष्प तथा मनोहर नैवेद्यके द्वारा बड़ी पूजा और सामने बैठकर चिरकाल तक स्तुतिके पवित्र अक्षरोंसे अपने मुखको सहित किया ॥ ८९-९० । अथानन्तर रावण पूजामें निमग्न था कि अचानक ही उसकी पूजा सब ओरसे फेन तथा १. कज्जलरहितानाम् । २. निर्मुक्ति - क., ख. । निर्मुक्तं म । ३. सुरहेतुभि: क., ख. ब. । ४. मूलं म. । ५. तरङ्गिणीजवे म. । ६. सगर्भवदनं म. । स्तहेतुभि: म., Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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