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________________ नवमं पर्व २२३ मासमात्र दशास्योऽपि स्थित्वा कैलासमूर्धनि । प्रेणिपत्य जिनं देशं प्रययावभिवाञ्छितम् ॥२१६॥ विज्ञाय मनसः क्षोभादात्मानं बद्धदुष्कृतम् । प्रायश्चित्तं गुरोर्देशं गत्वा बालिरशिश्रियत् ॥२१७॥ निर्गतस्वान्तशल्यश्चे बभूव सुखितः पुनः । बालिनियमनं कृत्वा यथा विष्णुमहामुनिः ॥२१८॥ चारित्राद् गुप्तितो धर्मादनुप्रेक्षणतः सदा । समितिभ्यः पराभूतेः परीषहगणस्य च ॥२१९॥ महासंवरमासाद्य कर्मापूर्वमनर्जयन् । नाशयंस्तपसा चात्तं प्राप्तः केवलसंगतम् ॥२२०॥ कर्माष्टकविनिर्मुक्तो ययौ त्रैलोक्यमस्तकम् । सुखं निरुपम यस्मिन्नवसान विवर्जितम् ॥२२१॥ इन्द्रियाणां जये शक्तो यस्तेनास्मि पराजितः । इति विज्ञाय लङ्कशः साधूनां प्रणतोऽभवत् ॥२२२॥ सम्यग्दर्शनसंपन्नो दृढभक्तिर्जिनेश्वरे । अतृप्तः परमैनॊगैरतिष्ठत् स यथेप्सितम् ॥२२३।। रथोद्धतावृत्तम् बालिचेष्टितमिदं शृणोति यो भावतत्परमतिः शुभो जनः । नैष याति परतः परामवं प्राप्नुते च रविमासुरं पदम् ॥२२४॥ इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्त पद्मचरिते बालिनिर्वाणाभिधानं नाम नवमं पर्व ॥९॥ वार्तालाप करता हुआ नागराज बड़े हर्षसे अपने स्थानपर चला गया ॥२१५॥ रावण भी एक माह तक कैलास पर्वतपर रहकर तथा जिनेन्द्रदेवको नमस्कार कर इच्छित स्थलको चला गया ।।२१६|| मुनिराज बालीने मनमें क्षोभ उत्पन्न होनेसे अपने आपको पाप कर्मका बन्ध करनेवाला समझ गरुके पास जाकर प्रायश्चित्त ग्रहण किया ॥२१७|| जिस प्रकार विष्णकुमार महामुनि प्रायश्चित्त कर सुखी हए थे उसी प्रकार बाली मनिराज भी प्रायश्चित्त द्वारा हृदयकी शल्य निकल जानेसे सुखी हुए ।।२१८।। चारित्र, गुप्ति, धर्म, अनुप्रेक्षा, समिति और परीषह सहन करनेसे बाली मुनिराज महासंवरको प्राप्त हुए । नवीन कर्मोका अजंन उन्होंने बन्द कर दिया और पहलेके संचित कर्मोका तपके द्वारा नाश करना शुरू किया। इस तरह संवर और निर्जराके द्वारा वे केवलज्ञानको प्राप्त हुए ॥२१९-२२०।। अन्त में आठ कर्मोको नष्ट कर वे तीन लोकके उस शिखरपर जा पहुंचे जहां अनन्त सुख प्राप्त होता है ।।२२१॥ जो इन्द्रियोंको जीतने में समर्थ है मैं उससे हारा हूँ यह जानकर अब रावण साधुओंके समक्ष नम्र रहने लगा ॥२२२॥ जो सम्यग्दर्शनसे सम्पन्न था, और जिनेन्द्र देवमें जिसकी दृढ़ भक्ति थी ऐसा रावण परम भोगोंसे तृप्त न होता हुआ इच्छानुसार रहने लगा ॥२२३।। गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जो उत्तम मनुष्य शुभभावोंमें तत्पर होता हुआ बाली मुनिके इस चरित्रको सुनता है वह कभी परसे पराभवको प्राप्त नहीं होता और सूर्यके समान देदीप्यमान पदको प्राप्त होता है ॥२२४।। इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य विरचित पद्मचरितमें बालि निर्वाणका कथन करनेवाला नवम पर्व पूर्ण हुआ ॥९॥ ४. -मनिर्जयन म.। ५. चात्तप्राप्त: केवल. १. प्रतिपत्य म. । २. शल्यस्य म.। ३. -दनुप्रेषणतः म., ख.। संगमम् म. | चान्तमन्ते केवलसंगमः क.। For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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