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________________ २२२ पद्मपुराणे जिनवन्दनया तुल्यं किमन्यद्विद्यते शुभम् । वस्तु यस्पार्थयिष्येऽहं भवन्तं दातुमुद्यतम् ॥२०१॥ ततो निगदितं नागपतिना शृणु रावण । जिनेन्द्रवन्दनात्तुल्यं कल्याणं नैव विद्यते ॥२०२॥ ददाति परिनिर्वाणसुखं या समुपासिता । 'जिननत्या तया तुल्यं न भूतं न भविष्यति ॥२०३॥ ततो दशमखेनोक्तं नास्ति चेजिनवन्दनात् । अधिकं किंवतः प्राप्त तस्मिन् याचे महामते ॥२०॥ उक्तं च नागपतिना सत्यमेतत्सुचेष्टितम् । असाध्यं जिनमक्तेर्यत्साधु तत्रैव विद्यते ॥२०५॥ त्वादृशा मादृशा ये च वासवाद्यैश्च संनिमाः। संपटान्ते सुखाधारा सर्वे ते जिनभक्तितः ॥२०६॥ आस्तां तावदिदं स्वल्पं व्याघाति मवर्ज सुखम् । मोक्षजं लभ्यते मक्त्या जिनानामुत्तमं सुखम् ॥२०७॥ नितान्तं यद्यपि त्यागी महाविनयसंगतः । वीर्यवानुत्तमैश्वर्यो भवान् गुणविभूषितः ॥२०८॥ मदर्शनं तथाप्येतत्तव मा भूदनर्थकम् । अमोघमिति याचेऽहं भवन्तं ग्रहणं प्रति ॥२०९॥ अमोघविजया नाम शक्ति रूपविकारिणीम् । विद्यां गृहाण लकेश मा वधीः प्रणयं मम ॥२१०॥ एकया दशया कस्य कालो गच्छति सजने । विपदोऽनन्तरा संपत् संपदोऽनन्तरा विपत् ॥२११॥ अतो विपदि जातायामासन्नायां कुतोऽपि ते । कुर्वती परसंबाधं पालिकेयं भविष्यति ॥२२॥ आसतां मानुषास्तावद्विभ्यत्यस्याः सुरा अपि । वह्निज्वालापरीतायाः शक्तेर्विपुलशक्तयः ॥२१३॥ अशक्नुवंस्ततः कतु प्रणयस्यास्य मैञ्जनम् । गृहीतृलाघवं लेभे कृच्छात् कैलासकम्पन ॥२१॥ कृत्वाञ्जलिं नमस्यां च संभाषितदशाननः । जगाम धरणः स्थानं निजं प्रकटसंमदः ॥२१५॥ कैलासको कम्पित करनेवाले रावणने कहा कि मुझे मालूम है-आप नागराज धरणेन्द्र हैं। सो मैं आपसे ही पूछता हूँ भला आप ही बतलाइए ।।२००॥ कि जिन-वन्दनाके समान और कौन-सी शुभ वस्तु है जिसे देने के लिए उद्यत हुए आपसे मैं माँगू ॥२०१।। तब नागराजने कहा कि हे रावण! सुन, जिनेन्द्र-वन्दनाके समान और दूसरी वस्तु कल्याणकारी नहीं है ॥२०२॥ जो जिन-भक्ति अच्छी तरह उपासना करनेपर निर्वाण सुख प्रदान करती है उसके तुल्य दूसरी वस्तु न तो हुई है और न होगी ॥२०३|| यह सन रावणने कहा कि जब जिनेन्द्र-वन्दनासे बढकर और कुछ नहीं है और वह मुझे प्राप्त है तब हे महाबुद्धिमान् ! तुम्हीं कहो इससे अधिक और किस वस्तुकी याचना तुमसे करूं ॥२०४॥ नागराजने फिर कहा कि तुम्हारा यह कहना सच है। वास्तवमें जो वस्तु जिन-भक्तिसे असाध्य हो वह है ही नहीं ॥२०५॥ तुम्हारे समान, हमारे समान और इन्द्र आदिके समान जो भी सुखके आधार हैं वे सब जिन-भक्तिसे ही हुए हैं ॥२०६॥ यह संसारका सुख तो अत्यन्त अल्प तथा बाधासे सहित है अतः इसे रहने दो, जिन-भक्तिसे तो मोक्षका भी उत्तम सुख प्राप्त हो जाता है ।।२०७।। यद्यपि तू त्यागी है, महाविनयसे युक्त है, वीर्यवान् है, उत्तम ऐश्वर्यसे सहित है और गुणोंसे विभूषित है तथापि तेरे लिए मेरा जो अमोघ दर्शन हुआ है वह व्यर्थ न हो इसलिए मैं तुझसे कुछ ग्रहण करनेकी याचना करता हूँ ॥२०८२०९॥ हे लंकेश ! जिससे मनचाहे रूप बनाये जा सकते हैं ऐसी अमोघविजया शक्ति नामकी विद्या मैं तुझे देता हूँ सो ग्रहण कर, मेरा स्नेह खण्डित मत कर ॥२१०॥ हे भलेमानुष ! एक ही दशामें किसका काल बीतता है ? विपत्तिके बाद सम्पत्ति और सम्पत्तिके बाद विपत्ति सभीको प्राप्त होती है ।।२११॥ इसलिए यदि कदाचित् किसी कारणवश विपत्ति तेरे समीप आयेगी तो यह विद्या शत्रुको बाधा पहुँचाती हुई तेरी रक्षक होगी ।।२१२।। मनुष्य तो दूर रहें अग्निकी ज्वालाओंसे व्याप्त इस शक्तिसे विपुल शक्तिके धारक देव भी भयभीत रहते हैं ॥२१३।। आखिर, रावण नागराजके इस स्नेहको भंग नहीं कर सका और उसने बड़ी कठिनाईसे ग्रहण करनेवालेको लघुता प्राप्त की ॥२१४॥ तदनन्तर हाथ जोड़कर और पूजा कर रावणसे १. जिनेन्द्राज्ञा ब. । २. सज्जनः म. । ३. भाजनम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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