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________________ प्रस्तावना २५ 'दिगम्बर' – 'श्वेताम्बर' शब्दोंका स्पष्ट प्रयोग कहीं भी नहीं देखा जाता। ऐसी स्थिति होते हुए यदि इस ग्रन्थ में किसी जैनसाधुके लिए श्वेताम्बर ( सियंबर) शब्दका स्पष्ट प्रयोग पाया जाता है तो वह इस बातको सूचित करता है कि यह ग्रन्थ वि. संवत् १३६ से पहलेका बना हुआ नहीं है जिस वक्त तक दिगम्बर श्वेताम्बर के सम्प्रदाय भेदको कल्पना रूढ़ नहीं हुई थी । ग्रन्थके २२वें उद्देशमें एक स्थलपर ऐसा प्रयोग स्पष्ट है । यथा पेच्छs परिभमंतो दाहिणदेसे सियंवरं पणओ । तस्स सगासे धम्मं सुणिऊण तओ समाढत्तो ॥७८॥ अह भइ मुणिवरदो शिसुण सुधम्मं जिणेहि परिकहियं । जेठो य समणधम्मो सावयधम्मो य अणुजेठो ॥ ७९ ॥ इसमें राजच्युत सौदास राजाको दक्षिण देशमें भ्रमण करते हुए जिस जैन मुनिका दर्शन हुआ था और जिसके पाससे उसने श्रावकके व्रत लिये थे उसे श्वेताम्बर मुनि लिखा गया है । अतः यह ग्रन्थ वि. संवत् १३६ से पहलेकी रचना नहीं हो सकता । यहाँ पर मैं इतना और भी बतला देना चाहता हूँ कि श्वेताम्बरीय विद्वान् मुनि कल्याणविजयजी तो अपनी 'श्रमण भगवान् महावीर' पुस्तकमें यहाँ तक लिखते हैं कि--विक्रमकी सातवीं शताब्दी से पहले दिगम्बर श्वेताम्बर दोनों स्थविर परम्पराओं में एक दूसरेको दिगम्बर श्वेताम्बर कहने का प्रारम्भ नहीं हुआ था । जैसा कि उनके निम्न वाक्यसे प्रकट है "इसी समय (विक्रमकी सातवीं शताब्दी के प्रारम्भसे दसवीं के अन्त तक ) से एक दूसरेको दिगम्बरश्वेताम्बर कहने का भी प्रारम्भ हुआ" ।। पृष्ठ ३०७ मुनि कल्याणविजयजीका यह अनुसन्धान यदि ठीक है तो पउमचरियका रचनाकाल विक्रम संवत् १३६ से ही नहीं किन्तु विक्रमकी सातवीं शताब्दी से भी पहलेका नहीं हो सकता । इस ग्रन्थका सबसे प्राचीन उल्लेख भी अभी तक 'कुवलयमाला' नामके ग्रन्थमें ही उपलब्ध हुआ है जो शक संवत् ७०० अर्थात् विक्रम संवत् ८३५ का बना हुआ है। ( २ ) श्री कुन्दकुन्द दिगम्बर सम्प्रदाय के प्रधान आचार्य हैं । आपने चारितपाहुडमें सागार धर्मका वर्णन करते हुए सल्लेखनाको चतुर्थ शिक्षाव्रत बतलाया है । आपसे पूर्वके और किसी भी ग्रन्थ में इस मान्यताका उल्लेख नहीं है और इसीलिए यह खास आपकी मान्यता समझी जाती है । आपकी इस मान्यता को 'पउमचरिय' के कर्ता विमलसूरिने अपनाया है। श्वेताम्बरीय आगम सूत्रोंमें इस मान्यताका कहीं भी उल्लेख नहीं है । मुख्तार साहब को प्राप्त हुए मुनिश्री पुण्यविजयजी के पत्रके निम्न वाक्यसे भी ऐसा ही प्रकट है— 'श्वेताम्बर आगमोंमें कहीं भी बारह व्रतों में सल्लेखनाका समावेश शिक्षाव्रत के रूपमें नहीं किया गया है । चारित पाहुडके इस सागार धर्मवाले पद्योंका और भी कितना ही सादृश्य इस पउमचरियमें पाया जाता है, जैसा कि नीचे की तुलनापर से प्रकट है ― [४] Jain Education International पंचेणुव्वया गुणव्वयाई हवंति तह तिष्णि । सिक्खावय चत्तारिय संजमचरणं च सायारं ॥२३॥ तसकाय हे थूले मोसे अदत्तले य । परिहारो पर महिला परिग्गहारंभ परिमाणं ॥ २४ ॥ दिसविदिसमाणपढमं अणत्य इण्डस्स वज्जणं विदियं । भोगोपभोगपरिमा इयमेव गुणव्वया तिष्णि ॥ २५ ॥ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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