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________________ नवमं पर्व २१९ 'ततो मन्दोदरी दीना ययाचेति मुनीश्वरम् । प्रणम्य भर्तृमिक्षां मे प्रयच्छाद्भुतविक्रम ।।१५८॥ ततोऽनुकम्पयाङ्गुष्ठं महामुनिरशश्लथत् । रावणोऽपि विमुच्याद्रिं क्लेशकान्तारतो निरैत् ।।१५९॥ गत्वा च प्रणतिं कृत्वा क्षमयित्वा पुनः पुनः । योगेशं स्तोतुमारब्धः परिज्ञाततपोबलः ॥१६॥ जिनेन्द्रचरणौ मुक्त्वा करोमि न नमस्कृतिम् । अन्यस्येति स्वयोक्तं यत्सामर्थ्यस्यास्य तत्फलम् ॥१६॥ अहो निश्चयसंपन्नं तपसस्ते महदबलम् । भगवन् येन शक्तोऽसि त्रैलोक्यं कर्तमन्यथा ॥१६॥ इन्द्राणामपि सामर्थ्यमीदृशं नाथ नेक्ष्यते । यादृक् तपःसमृद्धानां मुनीनामल्पयत्नजम् ॥१६३॥ अहो गुणा अहोरूपमहो कान्तिरहो बलम् । अहो दीप्तिरहो धैर्यमहो शीलमहो तपः ॥१६॥ त्रैलोक्यादथ निःशेषं वस्त्वाहृत्य मनोहरम् । कर्मभिः सुकृताधारं शरीरं तव निर्मितम् ॥१६५॥ युक्तस्त्यक्तवानसि यक्षितिम् । इदमत्यद्भुतं कर्म कृतं सुपुरुष त्वया ।।१६६॥ एवंविधस्य ते कतु यदसाधु मयेप्सितम् । तदशक्तस्य संजातं पापबन्धाय केवलम् ॥१६॥ धिकशरीरमिदं चेतो वचश्च मम पापिनः । वृत्तावमिमुखं जातं यदसत्यामलं पुरा ॥१६८॥ भवादृशां नृरत्नानां मद्विधानां च दुर्विशाम् । अन्तरं विगतद्वेष मेरुसर्षपयोरिव ।।१६९॥ मह्यं विपद्यमानाय दत्ताः प्राणास्त्वया मुने । अपकारिणि यस्येयं मतिस्तस्य किमुच्यताम् ॥१७॥ शृणोमि वेद्मि पश्यामि संसारं दुःखभावकम् । पापस्तथापि निर्वेदं विषयेभ्यो न याम्यहम् ।।१७१॥ पुण्यवन्तो महासत्त्वा मुक्तिलक्ष्मीसमीपगाः । तारुण्ये विषयांस्त्यक्त्वा स्थिता ये मुक्तिवर्मनि ।।१७२।। सामर्थ उठने लगी ॥१५७॥ तदनन्तर मन्दोदरीने दीन होकर मुनिराजको प्रणाम कर याचना की कि हे अद्भुत पराक्रमके धारी! मेरे लिए पतिभिक्षा दीजिए ॥१५८|| तब महामुनिने दयावश पैरका अंगूठा ढोला कर लिया और रावण भी पर्वतको जहांका तहाँ छोड़ क्लेशरूपी अटवीसे बाहर निकला ।।१५९।। तदनन्तर जिसने तपका बल जान लिया था ऐसे रावणने जाकर मुनिराजको प्रणाम कर बार-बार क्षमा माँगी और इस प्रकार स्तुति करना प्रारम्भ किया॥१६०॥ कि हे पूज्य ! आपने जो प्रतिज्ञा की थी कि मैं जिनेन्द्रदेवके चरणोंको छोड़कर अन्यके लिए नमस्कार नहीं करूँगा यह उसीकी सामर्थ्यका फल है ।।१६१।। हे भगवन् ! आपके तपका महाफल निश्चयसे सम्पन्न है इसीलिए तो आप तीन लोकको अन्यथा करने में समर्थ हैं ॥१६२॥ तपसे समृद्ध मुनियोंको थोड़े हो प्रयत्नसे उत्पन्न जैसी सामर्थ्य देखो जाती है हे नाथ! वैसो सामर्थ्य इन्द्रोंकी भी नहीं देखी जाती है ।।१६३।। आपके गुण, आपका रूप, आपकी कान्ति, आपका बल, आपकी दीप्ति, आपका धैर्य, आपका शोल और आपका तप सभी आश्चर्यकारी हैं ॥१६४॥ ऐसा जान पड़ता है मानो कर्मोंने तीनों लोकोंसे समस्त सुन्दर पदार्थ ला-लाकर पुण्यके आधारभूत आपके शरीरकी रचना की है ॥१६५।। हे सत्पुरुष ! इस लोकोत्तर सामर्थ्यसे युक्त होकर भी जो आपने पृथिवीका त्याग किया है यह अत्यन्त आश्चर्यजनक कार्य है ।।१६६।। ऐसी सामर्थ्यसे युक्त आपके विषयमें जो मैंने अनुचित कार्य करना चाहा था वह मुझ असमर्थके लिए केवल पाप-बन्धका ही कारण हुआ ॥१६७।। मुझ पापीके इस शरीरको, हृदयको और वचनको धिक्कार है कि जो अयोग्य कार्य करनेके सम्मुख हुए ॥१६८|| हे द्वेषरहित ! आप-जैसे नर-रत्नों और मुझ-जैसे दुष्ट पुरुषोंके बीच उतना हो अन्तर है जितना कि मेरु और सरसोंके बीच होता है ॥१६९|| हे मुनिराज! मुझ मरते हुएके लिए आपने प्राण प्रदान किये हैं सो अपकार करनेवालेपर जिसकी ऐसी बुद्धि है उसके विषयमें क्या कहा जावे ? ॥१७०।। मैं सुनता हूँ, जानता हूँ और देखता हूँ कि संसार केवल दुःखका अनुभव करानेवाला है फिर भी मैं इतना पापी हूँ कि विषयोंसे वैराग्यको प्राप्त नहीं होता ॥१७१।। जो तरुण १. एष श्लोकः क. ख. पुस्तकयो स्ति । २. भर्तृभिक्षं म. । ३. -रशश्लथन् म.। ४. दुःखाटवीतः । ५. वृत्तान्ताभिमुखं जातं यदसत्यमलं पुरा क. । ६. दुष्टप्रजानाम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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