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________________ २१८ पद्मपुराणे ततः संवर्तकाभिख्यवायुनेवाकुलीकृते । भुवने भगवान् बालिरवधिज्ञातराक्षसः ॥१४५॥ अप्राप्तः पोडनं स्वस्य धीरः कोपविवर्जितः । तथावस्थितसर्वाङ्गश्चेतसीदं न्यवेशयत् ॥१४६॥ कारितं भरतेनेदं जिनायतनमुत्तमम् । सर्वरत्नमयं तुङ्गं बहुरूपविराजितम् ।।१४७॥ प्रत्यहं भक्तिसंयुक्तैः कृतपूर्ज सुरासुरैः । मा विनाशि चलस्यस्मिन् पर्वते मिनपर्वणि ॥१४॥ ध्यात्वेति चरणागुष्ठपीडितं गिरिमस्तकम् । चकार शोभनध्यानाददूरीकृतचेतनः ॥१४९॥ ततो महाभराक्रान्तभग्नबाहुवनो भृशम् । दुःखाकुलश्चलद्रक्तस्पष्टमञ्जुललोचनः ।।१५०॥ भग्नमौलिशिरोगाढेनिविष्टधरणीधरः । निमजद्भूतलन्यस्तजानुर्निर्भुग्नजङकः ॥१५॥ सद्यः प्रगलितस्वेदधाराधौतरसातलः । बभूव संकुचद्गात्रः कूर्माकारो दशाननः ॥१५२।। रवं च सर्वयत्नेन कृत्वा रावितवान् जगत् । यतस्ततो गतः पश्चाद्रावणाख्यां समस्तगाम् ॥१५३॥ श्रुत्वा तं दीनभारावं स्वामिनः पूर्वमश्रुतम् । विद्याधरवधूलोको विललाप समाकुलः ॥१५॥ मूढाः संनद्धमारब्धाः संभ्रान्ताः सचिवा वृथा । पुनः पुनः स्खलद्वाचो गृहीतगलदायुधाः ॥१५५।। मुनिवीर्यप्रभावेण सुरदुन्दुभयोऽनदन् । पपात सुमनोवृष्टिः खमाच्छाद्य सषट्पदा ॥१५६॥ ननृतुर्गगने क्रीडाशीला देवकुमारकाः । गीतध्वनिः सुरस्त्रीणां वंशानुगतमुघयौ ॥१५७॥ तदनन्तर जब समस्त संसार संवतंक नामक वायुसे ही मानो आकुलित हो गया था तब भगवान् बालो मुनिराजने अवधिज्ञानसे दशानन नामक राक्षसको जान लिया ॥१४५॥ यद्यपि उन्हें स्वयं कुछ भी पीड़ा नहीं हुई थी और पहलेकी तरह उनका समस्त शरीर निश्चल रूपसे अवस्थित था तथापि वे धीरवीर और क्रोधसे रहित हो अपने चित्तमें इस प्रकार विचार करने लगे कि ॥१४६।। चक्रवर्ती भरतने ये नाना प्रकारके सर्वरत्नमयी ऊंचे-ऊँचे जिन-मन्दिर बनवाये हैं। भक्तिसे भरे सुर और असुर प्रतिदिन इनकी पूजा करते हैं सो इस पर्वतके विचलित हो जानेपर कहीं ये जिन मन्दिर नष्ट न हो जावें ॥१४७॥ ऐसा विचारकर शुभध्यानके निकट ही जिनकी चेतना थी ऐसे मुनिराज बालीने पर्वतके मस्तकको अपने पैरके अँगूठेसे दबा दिया ॥१४८-१४९।। तदनन्तर जिसकी भुजाओंका वन बहुत भारी बोझसे आक्रान्त होनेके कारण अत्यधिक टूट रहा था, जो दुखसे आकुल था, जिसकी लाल-लाल मनोहर आँखें चंचल हो रही थीं ऐसा दशानन अत्यन्त व्याकुल हो गया। उसके सिरका मुकुट टूटकर नीचे गिर गया और उस नंगे सिरपर पर्वतका भार आ पड़ा। नीचे धंसती हुई पृथिवीपर उसने घुटने टेक दिये । स्थूल होनेके कारण उसकी जंघाएँ मांसपेशियोंमें निमग्न हो गयीं ॥१५०-१५१। उसके शरीरसे शीघ्र ही पसीनाकी धारा बह निकली और उससे उसने रसातलको धो दिया। उसका सारा शरीर कछुएके समान संकुचित हो गया ॥१५२।। उस समय चूँकि उसने सर्व प्रयत्नसे चिल्लाकर समस्त संसारको शब्दायमान कर दिया था इसलिए वह पीछे चलकर सर्वत्र प्रचलित 'रावण' इस नामको प्राप्त हुआ ॥१५३।। रावणको स्त्रियोंका समूह अपने स्वामीके उस अश्रुतपूर्व दीन-हीन शब्दको सुनकर व्याकुल हो विलाप करने लगा ॥१५४॥ मन्त्री लोग किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये। वे युद्ध के लिए तैयार हो व्यर्थ ही इधर-उधर फिरने लगे। उनके वचन बार-बार बीचमें ही स्खलित हो जाते थे और हथियार उनके हाथसे छूट जाते थे ॥१५५॥ मुनिराजके वीर्यके प्रभावसे देवोंके दुन्दुभि बजने लगे और भ्रमरसहित फूलोंकी वृष्टि आकाशको आच्छादित कर पड़ने लगी ॥१५६|| क्रीड़ा करना जिनका स्वभाव था ऐसे देवकुमार आकाशमें नृत्य करने लगे और देवियोंकी संगीत ध्वनि वंशीकी मधुर ध्वनिके साथ सर्वत्र १. एष श्लोकः म. पुस्तके नास्ति । २. शिरोगाढं ब. । ३. संनद्ध- म. । ४. सुदुन्दुभयो म. । ५. सषट्पदा: म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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